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नैहाटी : ‘महादेवी वर्मा स्मृति सभागार’ में हिन्दी दिवस और सर्वेश्वर सक्सेना जयंती पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन संपन्न

भारतीय भाषाओं, लोक भाषाओं व बोलियां के सहयोग से हिंदी को राष्ट्रभाषा के लिए गढ़ा गया था

नैहाटी। 13 सितंबर 2026, रविवार को शिक्षा निकेतन स्कूल गरीफा, नैहाटी के ‘महादेवी वर्मा स्मृति सभागार’ में हिन्दी दिवस और सर्वेश्वर सक्सेना जयंती- 2026 के उपलक्ष्य में गरीफा मैत्रेय ग्रंथागार, ‘पड़ाव’ साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था व दिशा पुस्तकालय के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन संपन्न हुआ।

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय था “सर्वेश्वर साहित्य के बहाने हिन्दी के लोकतंत्र की पड़ताल” जिसकी अध्यक्षता कर रही थीं कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्रचार्या प्रोफेसर (डॉ.) सत्या उपाध्याय।

संगोष्ठी में वक्ता स्वरूप बैरकपुर राष्ट्रगुरु सुरेंद्रनाथ कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. बिक्रम कुमार साव, बीरभूम, मंडल कार्यालय, भारतीय खाद्य निगम, राजभाषा विभाग के जयप्रकाश यादव, रामकृष्ण मिशन आवासीय महाविद्यालय, नरेन्द्रपुर के डॉ. अमरदीप साव, आइसेक्ट विश्वविद्यालय हजारीबाग, झारखंड के डॉ. ओम प्रकाश दास उपस्थित थें। कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के छायाचित्र पर पुष्प अर्पित व दीप प्रज्ज्वलित कर हुआ। तत्पश्चात अतिथियों को पुष्पगुच्छ, उपहार और भारतीय मनीषियों व साहित्यकारों का छायाचित्र देकर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम के वक्तव्य सत्र का आरंभ ऋषि बंकिमचंद्र सांध्य कॉलेज के डॉ. जयप्रकाश साव ने स्वागत वक्तव्य व विषय प्रवर्तन के माध्यम से किया। सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि आज हम सर्वेश्वर साहित्य के बहाने हिंदी भाषा की पड़ताल करने के लिए उपस्थित हुए हैं। हिंदी अभी इस प्रकार उपेक्षित है जैसे “साल में एक बार हिंदी के माथे पर बिंदी और सालों भर अंग्रेजी को फूल चंदन।” हिंदी की यह दशा दुखित करती है। हमें इस पर विचार करना चाहिए। सर्वेश्वर इसी विचार विमर्श के कवि हैं वे लोकतंत्र की बात करते हैं भारत में तमाम भारतीय भाषा भी लोकतंत्र का ही आईना है।

डॉ. बिक्रम कुमार साव ने कहा कि “हिंदी दिवस जैसे ही आता है वैसे ही हिंदी दिवस पर आयोजनों की बाढ़ सी आ जाती है फिर सभी ओर सन्नाटा! यह चिंताजनक है। सर्वेश्वर की कविता “घंत मंत दोऊ कौड़ी पावा” के बहाने उन्होंने भारतीय लोकतंत्र के विसंगतियों की बात की। इसी क्रम में उन्होंने कहा कि- “हिंदी अब सत्ता की भाषा बन गई है। परंतु हिंदी का संपर्क भाषा स्वरूप ही उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देती है। हिंदी के राष्ट्रभाषा स्वरूप को सुरक्षित रखने के लिए राजभाषा के कंधे की जितनी आवश्यकता है उससे कहीं ज्यादा आवश्यकता उसको संपर्क भाषा के गोद में बैठे रहने की है।”

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50-60 के दशक में जब विद्वान हिंदी को संस्कृत की बेटी बनाने में लगे थे उस समय सर्वेश्वर उसे लोक की बेटी बनाने में लगे थे। हिंदी के राष्ट्रभाषा स्वरूप की स्वीकार्यता संपूर्ण भारत के विविध भाषा भाषियों में होनी चाहिए।

जयप्रकाश यादव ने हिंदी भाषा के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए उसके अधिकारों पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार किसी राष्ट्र के लिए एक झंडा का होना जरूरी है ठीक उसी प्रकार एक भाषा का होना भी आवश्यक है। संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों की चर्चा करते हुए हिंदी के अधिकार और संरक्षण पर श्रोताओं का ध्यान आकर्षित किया। साथ ही विजय लक्ष्मी पंडित, जोसेफ स्टालिन और लॉर्ड मैकाले आदि के प्रसंगों को याद दिलाते हुए हिंदी के प्रति मन से सचेत होने की बात कही।

वक्ता अमरदीप साव ने कहा कि सर्वेश्वर लोकतंत्र के हिमायती हैं। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से ऐसे समाज की परिकल्पना की है जो लोकतंत्र के उसूलों पर खरा उतरे। लोकतंत्र में असहमति , विविधता, विमर्श का होना अनिवार्य माना जाता है। असहमत होना और उसका सम्मान होना ही लोकतंत्र को बचाए रखता है। अगर समाज में सहमति – असहमति, बात-विवाद नहीं रहेगी तो लोकतंत्र कैसे बचेगा। सर्वेश्वर इसे अपने साहित्य का मुख्य बिंदु मानते हैं।

हिंदी भाषा और बलियों के संदर्भ में बात करते हुए उन्होंने कहा कि जो अपनापन मां, अम्मा, माई शब्दों में है वह मम्मी-डैडी में नहीं है और यही हमारी पहचान भी है। हमें अपनी पहचान बचाए रखने की आवश्यकता है। सर्वेश्वर भी इसी पहचान के अस्तित्व की चिंता करते हैं। उनका कहना है की पंक्ति मैं खड़े पहले व्यक्ति का जो महत्व है वही महत्व पंक्ति के आखिरी व्यक्ति को भी मिलना चाहिए। मौजूदा लोकतंत्र चिंताजनक है। जनता और नेताओं के बीच एक खाई बनती जा रही है।

वक्ता ओम प्रकाश दास ने सर्वेश्वर के ‘बकरी’ नाटक का विश्लेषण करते हुए देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को उजागर किया एवं सर्वेश्वर साहित्य के लोकतांत्रिक पक्ष को श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करते हुए हिंदी के लोकतांत्रिक स्वरूप के गठन पर बोल दिया।

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अध्यक्षीय वक्तव्य रखते हुए प्रोफेसर (डॉ.) सत्या उपाध्याय ने कहां की सर्वेश्वर ने अपने निबंधों में और खास कर दिनमान पत्रिका में जो विचार उनके छपे हैं उसमें हिंदी के लोकतांत्रिक स्वरूप के संदर्भ में बहुत सी चिंताएं व्यक्त की हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी को अपने राजभाषा स्वरूप की चिंता के साथ-साथ लोक की चिंता करनी होगी।

राजभाषा बन कर वह सत्ता से मिल सकती है पर लोकभाषा होने से उसे जनता मिलेगी और लोकतंत्र में जनता सत्ता से बड़ी होती है। लोकगीतों का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने हिंदी के लोकतांत्रिक स्वरूप के समृद्ध होने पर उसके राष्ट्रभाषा स्वरूप के सुरक्षित रहने की आशा जताई। इस अवसर पर सर्वसम्मति से उन्होंने शिक्षा निकेतन स्कूल के इस सभागार का नामकरण ‘महादेवी वर्मा स्मृति सभागार’के नाम से किया।

प्रसिद्ध साहित्यकार व समाजसेवी एवं गरीफा मैत्रेय ग्रंथागार की सचिव डॉ. इंदु सिंह ने कहा की – “हिंदी को राष्ट्रभाषा के लिए गढ़ा गया था। भारत के तमाम मनीषियों द्वारा, राजनीतिज्ञों द्वारा, साहित्यकारों द्वारा हिंदी भाषा के गढ़ने का एकमात्र लक्ष्य उसे राष्ट्रभाषा बनाना था।

कार्यक्रम में पड़ाव’ साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, नैहाटी के कोषाध्यक्ष व इस कार्यक्रम के संयोजक सुभाष कुमार साव, दिशा पुस्तकालय के सचिव व कार्यक्रम के सह-संयोजक डॉ. कार्तिक कुमार साव, डॉ. अजय चौधरी, प्रसिद्ध यात्रा वृतांत लेखिका माला वर्मा, कंचरापाड़ा कॉलेज के अध्यापिका डॉ. सुनीता मंडल, अध्यापक विकास साव, अध्यापिका सुमन सोनी, सुरेश प्रजापति, कविता पासवान,

सुहानी, अशरफ शेख, सुमित दास, स्वीटी साव, नेहा गोंड, सरस्वती पंडित, स्नेहा साव, स्नेहा सिन्हा, माधवी साव, अंशिका साव, रिया यादव, स्नेहा कुमारी यादव, कुमकुम कुमारी, नंदिनी सिंह, पलक प्रसाद, सुकन्या कुमारी साव, मनीष यादव सहित विविध महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं जैसे – नीतीश भगत, शक्तिमान ठाकुर, रोहित चौधरी, अभिषेक साव, रोहित प्रसाद, स्नेहा साव आदि उपस्थित रहें।

इस अवसर पर लेखिका माला वर्मा रचित यात्रा वृतांत ‘न्यूजीलैंड’ एवं डॉ. अजय कुमार चौधरी द्वारा संपादित पुस्तक ‘आंचल की छांव’ का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम में राशि कुमारी ने काव्य आवृत्ति एवं सुमन कुमारी राम और रानी कुमारी महतो ने आलेख पाठ प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन ऋषि बंकिमचंद्र कॉलेज फॉर विमेन, हिंदी विभाग के विशाल कुमार साव द्वारा किया गया। धन्यवाद ज्ञापन कंचरापारा कॉलेज के हिंदी विभाग के रूद्रकांत ने किया।

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राज कुमार गुप्त पिछले 12+ वर्षों से सब-एडिटिंग और न्यूज़ प्रोडक्शन में काम कर रहे हैं। वे खबरों को सटीक और संतुलित रूप देने में विशेषज्ञ हैं। कोलकाता के स्थानीय मुद्दों पर उनकी गहरी समझ है।

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