कोलकाता हिन्दी न्यूज | 03 अक्टूबर 2026: परिवार में मिट्टी की मूर्तियां बनाने की कोई परंपरा नहीं थी। पिता किसान हैं और मां गृहिणी। इसके बावजूद बचपन से ही मिट्टी से खेलने और उससे आकृतियां गढ़ने का शौक नदिया के बादकुल्ला निवासी कृतिशानु राय को इस मुकाम तक ले आया कि आज उनकी बनाई छोटी-छोटी प्रतिमाओं की मांग बंगाल से बाहर तक है।
उनकी खास पहचान है—मिनिएचर यानी बेहद छोटे आकार की देवी-देवताओं की प्रतिमाएं।
कृतिशानु ने पहली बार वर्ष 2018 में, जब वह सातवीं कक्षा में पढ़ते थे, अपने हाथों से आठ इंच की दुर्गा प्रतिमा बनाई थी। स्थानीय लोगों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और दुर्गापूजा के दौरान इलाके के एक क्लब में बड़ी प्रतिमा के साथ उनकी बनाई छोटी प्रतिमा भी स्थापित की गई। उसकी पूजा भी हुई।
बिना प्रशिक्षण के सीखी मूर्तिकला
कृतिशानु के पिता श्यामगोपाल राय किसान हैं, जबकि मां डॉली राय गृहिणी हैं। परिवार में मूर्तिकला की कोई पृष्ठभूमि नहीं है। बचपन में बादकुल्ला की दुर्गापूजा की रौनक और कृष्णनगर के मूर्तिकारों के काम को देखकर उनके मन में प्रतिमाएं बनाने की इच्छा जगी।
उन्होंने बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के खुद ही मिट्टी से देवी-देवताओं की आकृतियां बनाना सीखा।
आठ इंच की पहली दुर्गा प्रतिमा के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। रानाघाट कॉलेज में बांग्ला ऑनर्स की पढ़ाई कर रहे कृतिशानु मुख्य रूप से छोटी प्रतिमाएं बनाने पर ध्यान देते हैं। उनके हाथों से दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती और गणेश सहित विभिन्न देवी-देवताओं की मिनिएचर प्रतिमाएं आकार लेती हैं।
सोशल मीडिया से बढ़ी पहचान, बेंगलुरु तक पहुंचे ऑर्डर
पिछले तीन वर्षों से कृतिशानु पेशेवर रूप से प्रतिमाएं बना रहे हैं। सोशल मीडिया पर उनकी कलाकृतियों की तस्वीरें और वीडियो साझा होने के बाद उन्हें पहचान मिलने लगी। दमदम, दक्षिण कोलकाता और रानाघाट के अलावा बेंगलुरु से भी उन्हें प्रतिमाओं के ऑर्डर मिले हैं।
अमेरिका से भी एक ऑर्डर आया था, लेकिन इस वर्ष समय की कमी के कारण वह उसे पूरा नहीं कर सके। उनकी छोटी प्रतिमाओं की मांग लगातार बढ़ रही है और सोशल मीडिया के माध्यम से उनका काम दूर-दराज के लोगों तक पहुंच रहा है।
आर्थिक तंगी के कारण छूटा आर्ट कॉलेज का सपना
कृतिशानु की इच्छा आर्ट कॉलेज में दाखिला लेकर मूर्तिकला की औपचारिक शिक्षा हासिल करने की थी, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह सपना पूरा नहीं हो सका। बेटे की इच्छा पूरी न कर पाने का मलाल उनकी मां डॉली राय को भी है।
हालांकि, औपचारिक शिक्षा का अवसर न मिलने के बावजूद कृतिशानु ने अपनी कला-साधना जारी रखी। अब वह प्रतिमाओं के लिए मिलने वाली अग्रिम राशि से अगले काम की तैयारी करते हैं। अपनी कमाई के दम पर आत्मनिर्भर बनकर बाकी सपने पूरे करना चाहते हैं।
दुर्गापूजा में अब कुछ ही दिन शेष हैं। पढ़ाई के साथ-साथ कृतिशानु प्रतिमाएं बनाने में जुटे हैं।
जिस कला की कोई पारिवारिक विरासत उन्हें नहीं मिली, उसी मिट्टी को अपने हाथों से नया रूप देकर उन्होंने अपनी पहचान बनाई है। बचपन में शुरू हुआ आठ इंच की प्रतिमा बनाने का शौक आज उनके लिए पेशा और सपनों की राह बन चुका है।
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