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स्वरों की गंगा में डूबा मेदिनीपुर : ‘सलिल दा ‘ के शताब्दी सुरोत्सव की गूँज

तारकेश कुमार ओझा, खड़गपुर : मेदिनीपुर की सांझ उस दिन मानो सृजन के सुरों में नहाई हुई थी। शहर का हर कोना गुनगुना रहा था सुमधुर रागों की वह स्वरलहरी, जो समर्पित थी संगीत-साधक ‘आलोर पथयात्री’ सलिल चौधरी को। उनके जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर, सांस्कृतिक संस्था ‘कल्लोल’ ने आयोजित किया था एक अनुपम संध्या—“एक शाम, केवल सलिल चौधरी के नाम।”

शहीद प्रद्योत स्मृति सदन के मंच पर जब सौ से अधिक स्वर एक साथ गूँज उठे, तो वातावरण का हर कण सलिल के अमर गीत “विश्वपिता तुमी हे प्रभु” की ध्वनि से कंपन करने लगा। यह था मानो संगीत का एक यज्ञ, जहाँ स्वरों ने ज्वालाएँ धारण कीं और सुरों ने आकाश में दीपक बनकर चमक बिखेरी।

कार्यक्रम का संचालन किया लोकप्रिय गायक आलोक बरण मइती ने, जिन्होंने अपने स्वागत भाषण से समूचे सभागार को मानो एक ह्रदय बना दिया। कोलकाता से पधारे सुप्रसिद्ध कलाकार अग्निभ बंद्योपाध्याय ने जब अपनी प्रस्तुति दी, तो सुरों की वह धार श्रोताओं के मन में उतरती चली गई। उनके साथ मेदिनीपुर के कई चर्चित कलाकारों ने भी अपनी आवाज़ से इस सुरमयी यात्रा को और गहराई दी।

नृत्य ने भी उस रात संगीत का रूप धारण किया। मेदिनीपुर की श्रेष्ठ नृत्य संस्थाओं के कलाकारों ने जब ताल और भाव को मिलाकर नर्तन किया, तो लगा मानो राग और रसानुभूति का मिलन हो गया हो।

कार्यक्रम में अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे – मंत्री मानस रंजन भुइंया, जिला परिषद की सभाधिपति प्रतिभा रानी माइती, डॉ. सौम्य शंकर षाड़ंगी, नगर पालिका अध्यक्ष सौमेन खान, और अन्य अनेक गणमान्य व्यक्ति। सबके सानिध्य में वह संध्या बन गई एक संगीत-गाथा, जिसकी गूँज लंबे समय तक दिलों में रह जाएगी।

अंत में, आयोजक आलोक बरण माइती ने सभी उपस्थित जनों को धन्यवाद ज्ञापित किया और कहा – “आज मेदिनीपुर ने इतिहास रच दिया है; सलिल दा के सुर फिर से युगों तक जीवित रहेंगे।”

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