तारकेश कुमार ओझा, खड़गपुर। पश्चिम मेदिनीपुर जिला अंतर्गत मेदिनीपुर की धरा पर ज्ञान और संघर्ष की ज्वाला फिर एक बार प्रज्वलित हुई। प्रगतिशील होम्योपैथिक चिकित्सक समिति का सोलहवां राज्य सम्मेलन दो दिनों तक शहर को विचारों और संकल्पों की ऊर्जा से पुलकित करता रहा।
सम्मेलन का स्वर था- “स्वास्थ्य के लोकपथ पर होम्योपैथी का दीप फिर से जलाओ। ”चिकित्सकों ने तीखा आक्रोश प्रकट किया कि राज्य सरकार होम्योपैथी जैसी जनमुखी चिकित्सा पद्धति को अपने बजट की अंधेरी गलियों में भुला रही है।
चार बड़े सरकारी होम्योपैथिक कॉलेज सिर्फ नाम मात्र पर अस्तित्व बचाए हैं जैसे किसी सूखे वृक्ष की डालियों पर अंतिम पत्ते संघर्षरत हों। शिक्षकों की कमी, कर्मियों की रिक्तियाँ और स्वास्थ्य सेवा के ढांचे का जीर्ण रूप सम्मेलन में बार-बार उठाया गया।

उद्घाटन किया डॉ. तमोनाश चौधुरी ने, जिन्होंने मंच से चेतावनी दी कि “जब अस्पतालों के भीतर डॉक्टर असुरक्षा में हों, जब शिक्षा और स्वास्थ्य के मंदिर ध्वंस की कगार पर हों, तब मौन रहना पाप है। इतिहास उन लोगों को क्षमा नहीं करता जो अन्याय के समय चुप रहते हैं।”
सम्मेलन की अध्यक्षता डॉ. देबव्रत चट्टोपाध्याय ने की। विचार-विमर्श की लहरों में डॉ. बिप्लव दास, डॉ. बिमल गुड़िया और डॉ. गौतम नाग ने अपनी बात रखी।
प्रतिनिधियों ने कॉलेजों की दयनीय स्थिति पर चर्चा करते हुए कहा कि केंद्र की नियामक संस्था (एनएचसी) को कई कॉलेजों की सीटें घटानी पड़ीं, क्योंकि शिक्षकों की संख्या आवश्यकता से बहुत कम है।
कुछ निजी कॉलेजों पर तो छात्र प्रवेश पर रोक तक लगी हुई है, मानो शिक्षा का दीपक हवा में कांपता हुआ आखिरी बार टिमटिमा रहा हो। आख़िर में समिति की नई 55 सदस्यीय राज्य कमेटी गठित की गई।
डॉ. देबव्रत चट्टोपाध्याय फिर से अध्यक्ष चुने गए, डॉ. गौतम नाग को राज्य सचिव और डॉ. अरिंदम मुखर्जी को कोषाध्यक्ष बनाया गया। सम्मेलन का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि “स्वास्थ्य का अधिकार सबका है और होम्योपैथी उसकी सरलतम राह। चलो, इस राह पर फिर से प्रकाश फैलाएँ।”
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