पुनर्मूषको भव!

विनय सिंह वैस, नई दिल्ली। ज्यादातर छात्र चाहते हैं कि वह अपने शिक्षकों की ‘गुड बुक’ में रहें। गुरु जी उसे पहचाने, हर काम के लिए उसे याद करें। रजिस्टर लेकर आने को कहें, किताब/कापियां स्टाफ रूम में रखने को कहें। उसे क्लास का मॉनिटर बना दें या कोई और धौंस वाली जिम्मेदारी दे दें। लेकिन मेरे साथ हमेशा इसका उल्टा रहा। पांचवी क्लास तक मेरी पढ़ाई प्राइमरी पाठशाला बरी में हुई। श्री अवधेश सिंह, श्री बृजमोहन सिंह, स्वर्गीय देवनारायण सिंह मेरे गुरु थे। तीनों लोग पड़ोस के गांव एकौनी के थे। यह तीनों मुझे क्या, मेरे पूरे परिवार, खानदान को जानते थे। खैर उस समय तक मुझे शिक्षक की ‘गुड बुक’ में रहने के फायदे और नुकसान भी नहीं पता थे।

छठवीं क्लास में बमुश्किल दो महीने जूनियर हाई स्कूल मे रुई में पढ़े होंगे कि पापा गांव से लालगंज में शिफ्ट हो गए। 1988 में हम बरी से लालगंज आ गए और आचार्य नगर में किराए के मकान में रहने लगे।

लालगंज आये तो मेरा एडमिशन बैसवारा इंटर कॉलेज, लालगंज के कक्षा 6 में हो गया। बैसवारा इंटर कॉलेज यानि वह विद्यालय जहां पापा जहां पहले शिक्षक रहे थे और बाद में इंटर कॉलेज विष्णुखेड़ा चले गए थे। इसलिए मेरे साथ यहां भी शिक्षकों की ‘गुड बुक’ में आने के लिए कोई प्रयास ही नहीं करना पड़ा। छठवीं से आठवीं तक सिर्फ एक ही सेक्शन था और पापा एक बार विद्यालय आये और मुझे स्टाफ रूम ले जाकर जूनियर हाईस्कूल के सभी शिक्षकों से मेरा ‘ध्यान’ रखने को कह गए।

ध्यान रखने का मतलब यह कि मुझे आगे वाली सीट पर बैठना था, कोई बदमाशी नहीं करनी थी और शिक्षक के पुत्र की तरह व्यवहार करना था। मुझे अपने नाम के अनुरूप ‘विनय’ शील ही रहना था। इसलिए छठवीं से आठवीं तक मेरा जीवन बड़े अनुशासन में गुजरा।

आठवीं उत्तीर्ण करके जब नवीं में पहुंचे तो थोड़ी सीनियरिटी वाली फीलिंग आने लगी थी कि अब हम बड़े क्लास में पहुंच गए हैं। नवीं कक्षा से साइंस, आर्ट, कॉमर्स साइड शुरू हो चुके थे। दूर-दूर के विद्यालयों के छात्र प्रवेश लेने बैसवारा इंटर कॉलेज लालगंज आते थे। क्योंकि इस कॉलेज की बैसवारा क्षेत्र में ख्याति थी। विज्ञान वर्ग के शिक्षक तो पूरे जिले में प्रसिद्ध थे। इसलिए नवीं के बाद सेक्शन भी कई थे। छात्रों और शिक्षकों की संख्या भी उसी अनुपात में अधिक थी।

मैंने विज्ञान वर्ग में प्रवेश लिया था। इस बार पापा शिक्षकों से मेरा ‘ध्यान’ रखने को कहने नहीं आये थे। इसलिए मेरे दिमाग में कुछ और ही पकने लगा था। लीक-लीक चलते मैं बोर हो चुका था। सिर्फ पढ़ाई, कोई मस्ती नहीं, कोई क्लास बंक नहीं। चोरी छिपे गुटका, बीड़ी भी नहीं। यह भी कोई जीवन था?? मैं अब थोड़ा ‘मुन्ना भाई’ टाइप जिंदगी जीना चाहता था।

नवीं की क्लास 01 जुलाई से शुरू होनी थी। पिछले लगभग 40 दिन मैंने खूब मौज मस्ती की थी। पहली बार क्लास में पहुंचे तो जानबूझकर चौथी-पांचवी सीट पर बैठे कि आगे वाली सीट पर बैठकर बहुत अनुशासित जीवन जी लिया, अब पीछे वाली सीट पर बैठकर कुछ ‘मस्ती’ भी की जाए।

एक-दो दिन कक्षा में कोई पढ़ाई नहीं हुई। नए छात्र प्रवेश के लिए आते रहे, रजिस्टर मेंटेन होते रहे। इसलिए हम लोग भी गोविंद हाल के सामने वाले मैदान में फुल मस्ती करते रहे, सिरिपाल की 25 पैसे की गरी वाली बरफ का स्वाद लेते रहे, जूनियर हाईस्कूल वाले मैदान में गेंदतड़ी खेलते रहे।

लगभग एक हफ्ते बाद एक लंबे-चौड़े, गोरे से मास्टर साहब विज्ञान पढ़ाने आए। पता चला कि यह फतेह बहादुर सिंह मास्साब हैं। उन्होंने अटेंडेंस ली, थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करते रहे और फिर बोले। नए क्लास की पढ़ाई करने से पहले मैं यह देखना चाहता हूं कि तुम लोगों ने आठवीं तक जो पढ़ाई की है, वह तुम्हें याद भी है कि नहीं? ठीक है तैयार हो जाओ बच्चों और बताओ आर्किमिडीज का सिद्धांत क्या है?

ज्यादातर छात्र अभी भी हॉलीडे मॉड में ही थे। उन्हें गर्मी के दौरान खाये गए अचार, अमावट, आम तो याद थे बस आर्किमिडीज नहीं याद थे। मुझे भी यह तो याद आ रहा था कि आर्किमिडीज का सिद्धांत कुछ पानी से संबंधित है लेकिन ठीक से कुछ याद नहीं आ रहा था। सच पूछो तो याद तो बस यह आ रहा था कि -“यदि संवलिया बैल को ठीक से नहर में खरहरा से खूब अच्छी तरह रगड़-रगड़ कर धो दिया जाए तो उसका रंग भी गोरे जैसा हो जाता है।”

अपवाद हर जगह होते हैं। कक्षा के दो लड़कों ने हाथ उठा दिए कि मास्साब हम बताएं। लेकिन गुरुजी ने उनसे कुछ नहीं पूछा। उन्होंने पूरे क्लास में एक सरसरी नजर घुमाई, जैसे किसी को ढूंढ रहे हो। फिर बोले -” ‘बाबा’ मेरा मतलब शंभू सिंह मास्टर साहब का लड़का कौन है? वह खड़ा होकर इस प्रश्न का उत्तर दे।”

गुरुजी की आवाज इतनी बुलंद थी कि बगल वाली क्लास के छात्र भी स्पष्ट सुन लें। लेकिन मैंने ऐसे नाटक किया जैसे कि मुझे सुनाई न पड़ा हो, या प्रश्न समझ में न आया हो। गुरुजी ने कुछ देर बाद फिर वही प्रश्न दोहराया। अब मेरे लिए अनसुना करना असंभव हो गया था, मुझे मजबूरी में उठना ही पड़ा।

गुरुजी जी ने मुझे देखकर कहा-” अच्छा, तुम हो ‘बाबा’ के लड़के। लेकिन तुम पीछे क्यों बैठे हो? खैर छोड़ो, यह बताओ कि आर्किमिडीज का सिद्धांत क्या है?

“सआआरररर, आर्किमिडीज का सिद्धांत कुछ पानी में डूबने से संबंधित है लेकिन मुझे ठीक से परिभाषा याद नहीं है।” मैं डरते हुए बोला
“कोई बात नहीं। तुमने आधा सही बताया है। ऐसा करो, कल से तुम आगे बैठना और जो भी समझ न आये, मुझसे और सभी शिक्षकों से निःसंकोच पूछना।” गुरुजी बड़े प्यार से बोले।
फिर खुद ही बताने लगे कि ‘बाबा’ आज रवींद्र बुक डिपो पर मिले थे और तुम्हारा ‘ध्यान’ रखने को कहा है।

अगले ही दिन से मेरी सीट बदल गई, हालात बदल गए, जज्बात बदल गए। जो भी शिक्षक आता, ‘बाबा’ के लड़के यानि मुझसे ही सबसे पहले प्रश्न पूछता। बिना किसी कार्य के कक्षा के बाहर कहीं दिख जाता तो प्रश्नों की बौछार कर दी जाती।

मैं खुशफहमी में था कि पापा छठवीं क्लास की तरह कॉलेज नहीं आये हैं, स्टाफ रूम में मुझे ले जाकर शिक्षकों से मेरा परिचय नहीं कराया है। इसलिए अब मुझे कोई पहचानेगा नहीं, जानेगा नहीं। मैं अन्य छात्रों की तरह खूब मस्ती कर करूंगा, क्लास भी बंक कर सकूंगा। लेकिन मेरी सारी कल्पनायें क्षण भर में चकनाचूर हो गईं, मेरे दिल के सारे अरमान आंसुओ में बह गए।
‘मुन्नाभाई’ बनने का मेरा ख्वाब अधूरा ही रह गया और मैं पुनः ‘विनय’ बन गया।

(विनय सिंह बैस ‘मुन्ना’)
जो ‘मुन्नाभाई’ बनते बनते रह गए

विनय सिंह बैस, लेखक/अनुवाद अधिकारी

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