– आधुनिक विकास आवश्यक है, इसे लेकिन हमारी सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ चलना चाहिए- भारती गोसाई
– दस दिवसीय कला कार्यशाला में कला विशेषज्ञों से प्रतिभागी बच्चे सीख रहे हैं पेपर मेशी में मुखौटा बनाना।
लखनऊ। लखनऊ स्थित फ्लोरेसेंस आर्ट गैलरी की पहल से लखनऊ पब्लिक स्कूल के साथ दस दिवसीय कार्यशाला का आयोजन लखनऊ के चार स्कूल ब्रांचों पर किया है। यह कार्यशाला बुधवार से प्रारम्भ है। इस वर्कशॉप में किसी भी उम्र के लोग भाग ले सकते हैं। इसी कार्यशाला शृंखला में राजाजीपुरम ब्रांच पर प्रतिभागी कला विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में पेपर मेशी माध्यम में पारंपरिक मुखौटा बनाना सीख रहे हैं। इस कार्यशाला में विशेषज्ञ के रूप में दो महिला कलाकार सुचिता सिंह और संध्या यादव हैं।
कला विभागाध्यक्ष राजेश कुमार ने बताया कि गुरुवार को फ्लोरेसेंस आर्ट गैलरी के क्यूरेटर भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने कार्यशाला का अवलोकन किया साथ ही प्रतिभागियों को मुखौटे से जुड़ी कई महत्त्वपूर्ण जानकारीयाँ साझा की। अस्थाना ने बताया कि मुखौटा एक मज़ेदार और रचनात्मक शिल्प है। इसका बहुत पुराना इतिहास रहा है। पेपर मेशी की तकनीक का उपयोग प्राचीन समय से ही किया जा रहा है।

बच्चे खिलौने के रूप में, नाटक रंगमंच में, नृत्य में जैसे कई तरीकों से मुखौटों का प्रयोग किया जाता रहा है। पुराने दिनों में हमारे घरों मे बहुत से बर्तन, और सजावटी वस्तुए महिलाएं और पुरुष बनाते रहे हैं हालांकि अब बहुत कम है । इसे भारत में विशेष रूप से कश्मीर और मिथिला में प्राचीन समय से ही जाना जाता है। पेपर मेशी माध्यम में मुखौटे बच्चों और वयस्कों दोनों के लिए उपयुक्त और आसान माध्यम है।
यह एक सस्ता और आसान तरीका है। इस माध्यम में अनेकों कलात्मक और सजावटी वस्तुएं बनाया जा सकता है। पेपर मेशी (Papier mache) अर्थात “मैश पेपर” या “गला हुआ कागज”. यह एक कला तकनीक है जिसमें पुराने पेपर को पानी में भिगोकर, अच्छी तरह से मसलकर लुगदी बना ली जाती है। और इसी लुगदी का उपयोग करके विभिन्न वस्तुओं और कलाकृतियों को बनाया जाता है।
मुखौटा बनाने के लिए, सबसे पहले एक आधार बनाने की आवश्यकता होती है।अखबार, कागज, या अन्य सामग्री का उपयोग कर सकते हैं। पेपर मेशी की पूरी तकनीक विधि दोनों विशेषज्ञ कलाकार प्रतिभागियों को बखूबी बता रही हैं साथ ही सभी प्रतिभागी एक एक पेपर मेशी में मुखौटा बनाना सीख रहे हैं।
ए ब्लॉक राजाजीपुरम की प्रिंसिपल भारती गोसाई ने कला के महत्व और पारंपरिक मूल्यों के साथ इसके गहरे संबंध पर जोर दिया। छात्रों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए, उन्होंने सभी को याद दिलाया कि आधुनिक विकास आवश्यक है, लेकिन इसे हमारी सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ चलना चाहिए।
उन्होंने कहा, “परंपराएँ हमारी पहचान की आत्मा हैं। जब हम उन्हें आधुनिक शिक्षा के साथ मिलाते हैं, तो हम वास्तव में सार्थक और समग्र जीवन बनाते हैं।” उन्होंने आगे बताया कि परंपराओं को समझना और उनका सम्मान करना न केवल व्यक्ति के चरित्र को समृद्ध करता है, बल्कि गर्व और अपनेपन की भावना भी पैदा करता है।
छात्रों में इस तरह की जागरूकता को प्रोत्साहित करते हुए, प्रिंसिपल ने फ्लोरेसेंस आर्ट गैलरी की संस्थापक और निदेशक नेहा सिंह की सराहना की, जिन्होंने कलात्मक और सांस्कृतिक विकास पर केंद्रित एक अभिनव समर कैंप शुरू किया। स्कूल परिसरों में आयोजित की जा रही इस पहल का उद्देश्य परंपरा के प्रति सम्मान को बढ़ावा देते हुए रचनात्मकता को बढ़ावा देना है।
प्रिंसिपल ने छात्रों को इस तरह का ज्ञान देने में अपने विश्वास की पुष्टि की, जिसे वह उनके समग्र विकास और भावनात्मक बुद्धिमत्ता के लिए आवश्यक मानती हैं।
उन्होंने समर कैंप की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह युवा दिमागों के लिए कला के माध्यम से अपनी जड़ों से जुड़ने का एक मूल्यवान अवसर है, और फ्लोरेसेंस आर्ट गैलरी को इसके दूरदर्शी प्रयासों के लिए धन्यवाद दिया। यह कार्यक्रम शिक्षा, परंपरा और रचनात्मकता का एक जीवंत मिश्रण होने का वादा करता है।
ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च कर, फॉलो करें।



