IMG 20250831 WA0011

विवाह समारोह- पवित्र संस्कार, आधुनिकता का दंश और समाज की चुनौती

शादी समारोहों में शराब, डीजे, नाइट पार्टी और वेस्टर्न कल्चर की नकल आम हो गई है।
विवाह एक पवित्र संस्कार, आध्यात्मिक और सामाजिक आयाम हैँ- बढ़ती आधुनिकता का दंश और बदलती शादी की परंपओं को रेखांकित करना जरूरी

अधिवक्ता किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में शादी केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं बल्कि एक पवित्र संस्कार मानी जाती है। वेदों से लेकर पुराणों तक, गृहस्थ जीवन को धर्म का महत्वपूर्ण आधार बताया गया है। विवाह को केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि दो परिवारों और दो कुलों का मिलन माना जाता है। इसीलिए इसे सात फेरे, सप्तपदी मंत्र, कन्यादान, होम, आशीर्वाद और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सम्पन्न कराया जाता है। किंतु आज बदलते समय में विवाह के स्वरूप में गहरा बदलाव दिखाई दे रहा है। शादी समारोह, जो कभी अध्यात्म, त्याग, संस्कार और सामाजिक सामंजस्य का प्रतीक था, अब धीरे-धीरे दिखावे, पैसे की होड़, दहेज, शराब और भव्यता की दौड़ में सिमटता जा रहा है। यह बदलाव न केवल भारतीय संस्कृति के लिए खतरे की घंटी है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सामने एक विकृत परंपरा स्थापित कर रहा है। इस विषय का विस्तार पूर्वक विश्लेषण हम 5 बिंदुओं के आधार पर करेंगे।

साथियों बात अगर हम विवाह एक पवित्र संस्कार – आध्यात्मिक और सामाजिक आयाम की करें तो, भारतीय संस्कृति में विवाह को सोलह संस्कारों में एक प्रमुख संस्कार माना गया है। यह केवल पति-पत्नी के शारीरिक या भावनात्मक संबंध का बंधन नहीं है, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की साधना का आधार है। विवाह का उद्देश्य केवल जीवनसाथी चुनना नहीं, बल्कि समाज में संतुलित, संस्कारित और धार्मिक जीवन की स्थापना करना है। सात फेरे, जिन्हें हर दंपति विवाह के समय अग्नि के साक्षी में लेता है, केवल शब्द नहीं हैं बल्कि जीवन के लिए आजीवन वचन हैं।आज की पीढ़ी इन मंत्रों और वचनों की गहराई को समझे बिना केवल विवाह को “सोशल इवेंट” की तरह देखने लगी है। होटल, रिजॉर्ट, फार्म हाउस और डेस्टिनेशन वेडिंग ने विवाह को पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी के बजाय लक्जरी इवेंट में बदल दिया है। यह बदलाव भारतीय समाज की मूल आत्मा के विपरीत है।

साथियों बात अगर हम आधुनिकता का दंश और बदलती शादी की परंपरा व दहेज और उपभोक्तावादी संस्कृति की करें तो आधुनिकता अपने साथ तकनीकी विकास, वैश्विक संपर्क और नए अवसर लाती है, परंतु इसका अंधानुकरण विवाह जैसे संस्कारों को विकृत कर रहा है। आज शादियाँ अधिकतर स्टेटस सिंबल बन गई हैं।
(I) लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर “शाही शादी” दिखाना अब फैशन बन चुका है।
(II) शादी समारोहों में शराब, डीजे, नाइट पार्टी और वेस्टर्न कल्चर की नकल आम हो गई है।
(III) रिश्तेदारों और मेहमानों का सम्मान अब मेन्यू की विविधता और सजावट की भव्यता से आंका जाने लगा है, न कि आत्मीयता और आदर से।

यह भी पढ़ें:  बंगाल में चुनाव प्रचार करने आ रहे हैं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह

इस भौतिकवादी दृष्टिकोण ने विवाह की पवित्रता को गहरे तक प्रभावित किया है। जहां कभी विवाह का अर्थ “दो आत्माओं का आध्यात्मिक बंधन” था, वहीं आज विवाह का अर्थ “सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरें और वीडियो” बन गया है।

दहेज और उपभोक्तावादी संस्कृति- विवाह का कुरूप चेहरा : दहेज प्रथा भारतीय समाज की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है। स्वतंत्रता के बाद से लगातार प्रयासों के बावजूद यह कुरीति खत्म नहीं हुई। आधुनिकता और भौतिकतावाद ने इसे और मजबूत कर दिया है। आज शादी समारोह में गाड़ियों की मांग, महंगे उपहार, नगद और जायदाद की अपेक्षा खुलेआम की जाती है। दहेज न केवल विवाह के पवित्र बंधन को कलंकित करता है बल्कि यह महिलाओं के लिए अपमानजनक और अमानवीय स्थिति पैदा करता है। हजारों बेटियाँ आज भी दहेज के बोझ के कारण या तो शादी नहीं कर पातीं या शादी के बाद उत्पीड़न का शिकार होती हैं।

साथियों बात अगर हम विवाह और शराब संस्कृति, के तेजी से बढ़ते प्रचलन की करें तो, भारतीय समाज में विवाह हमेशा से संयम, मर्यादा और उत्सव का संगम रहा है। परंतु पिछले दो दशकों में शादियों में शराब की संस्कृति तेजी से फैली है। यह न केवल समारोह की गरिमा को कम करता है बल्कि कई बार हिंसा, विवाद और दुर्घटनाओं का कारण भी बनता है। आज समाज के सामने यह प्रश्न है कि क्या विवाह का उत्सव बिना शराब, नाच-गाने और दिखावे के संभव नहीं? विवाह जैसे पवित्र अवसर पर यदि आत्मसंयम और मर्यादा खो जाए तो वह केवल मनोरंजन बनकर रह जाता है।

साथियों बात अगर हम विवाह में बढ़ता दिखावापन और समाज पर असर की करें तो,”शादी में कितना खर्च हुआ?” यह प्रश्न आज समाज का सबसे बड़ा मूल्यांकन बन गया है। किसी परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा अब शादी की भव्यता से तय होती है। परिणामस्वरूप गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार कर्ज, उधार और आर्थिक बोझ तले दब जाते हैं।
(I) शादियों में करोड़ों का खर्च करना “प्रेस्टीज इश्यू” बन चुका है।
(II) आम परिवार इस दौड़ में शामिल होने के लिए अपनी जिंदगी भर की कमाई खर्च कर देते हैं।
(III) और छोटे कस्बों में भी यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है, जिससे आर्थिक असमानता और बढ़ रही है।
यह प्रवृत्ति भारतीय समाज के लिए खतरनाक है क्योंकि इससे सामाजिक संतुलन और समानता की अवधारणा को गहरी चोट पहुंचती है।

यह भी पढ़ें:  जय प्रकाश नारायण जयंती विशेष...

साथियों बात अगर हम घटते पारंपरिक संस्कार और अनुष्ठान की करें तो पहले विवाह घर-आंगन में, मंदिरों या पंचायतों में पूरे परिवार और समाज की सहभागिता से होते थे। बारात में ढोल-नगाड़े, लोकगीत,नृत्य, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान का विशेष महत्व होता था। परंतु अब इनकी जगह डीजे, फिल्मी गाने और कोरियोग्राफ्ड डांस ने ले ली है। कन्यादान, होम, सप्तपदी, वरमाला जैसे संस्कार केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। कई बार डेस्टिनेशन वेडिंग्स में पुरोहित और मंत्रोच्चार तक “फास्ट फॉरवर्ड” कर दिए जाते हैं। यह बदलाव कहीं न कहीं विवाह को केवल मनोरंजन का साधन बना रहा है।

साथियों बात अगर हम समाज को दिशा दिखाने की आवश्यकता व सादगीपूर्ण विवाह की करें तो, आज समय की मांग है कि समाज इस बदलते परिदृश्य पर गंभीर चिंतन करे। विवाह को पुनः उसके मूल स्वरूप में लाने की आवश्यकता है। इसके लिए (I) धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को विवाह संस्कारों की पवित्रता का प्रचार करना चाहिए। (II) परिवारों को बच्चों को बचपन से ही विवाह संस्कारों की महत्ता सिखानी चाहिए। (III) सरकार को दहेज और अनावश्यक खर्च पर रोक लगाने वाले कानूनों को कड़ाई से लागू करना चाहिए। (IV) समाज में “सादगीपूर्ण विवाह” को प्रोत्साहित करने वाले अभियान चलाने चाहिए।

सादगीपूर्ण विवाह- भविष्य की राह। आज कई राज्यों में “सामूहिक विवाह” और “सादगीपूर्ण विवाह” की परंपरा को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें खर्च सीमित रखा जाता है और धार्मिक अनुष्ठानों को महत्व दिया जाता है। इससे न केवल आर्थिक बोझ कम होता है, बल्कि विवाह की सामाजिक और आध्यात्मिक महत्ता भी बनी रहती है। सादगीपूर्ण विवाह को समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा दिलाना होगा। जब तक दिखावे और भव्यता को “प्रेस्टीज” माना जाएगा, तब तक यह प्रवृत्ति नहीं रुकेगी।

अधिवक्ता किशन सनमुखदास भावनानी : संकलनकर्ता, लेखक, कवि, स्तंभकार, चिंतक, कानून लेखक, कर विशेषज्ञ

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि विवाह भारतीय संस्कृति का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण संस्कार है। इसे आधुनिकता और दिखावे की भेंट चढ़ाना हमारी आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा। समाज को यह समझना होगा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि दो परिवारों का पवित्र मिलन है, जिसका उद्देश्य धर्म, परंपरा और संस्कारों को आगे बढ़ाना है। यदि हम विवाह को पुनः उसके आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप में स्थापित कर पाते हैं, तभी हम आधुनिकता के दंश से बचकर आने वाली पीढ़ियों को एक सशक्त और संस्कारित समाज दे पाएंगे।

यह भी पढ़ें:  80वाँ स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त 2026 : लाल किले से अमेरिका में इंडिया डे तक - वंदे मातरम् के 150 वर्ष से युवा भारत के 2047 तक : इतिहास से भविष्य की ओर बढ़ता सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा

(स्पष्टीकरण : इस आलेख में दिए गए विचार लेखक के हैं और इसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है।)

ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च करफॉलो करें।

Kolkata News Desk Avatar

Kolkata News Desk

News Editor MA

कोलकाता और पश्चिम बंगाल की ब्रेकिंग न्यूज, स्थानीय घटनाओं, खेल, राजनीति और सामाजिक मुद्दों की खबरों को कवर करता है। हमारी डेस्क टीम 24×7 सक्रिय रहकर पाठकों को ताज़ा और प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध कराती है।

Areas of Expertise: Sports, Politics & West Bengal
Fact Checked & Editorial Guidelines

Our Fact Checking Process

We prioritize accuracy and integrity in our content. Here's how we maintain high standards:

  1. Expert Review: All articles are reviewed by subject matter experts.
  2. Source Validation: Information is backed by credible, up-to-date sources.
  3. Transparency: We clearly cite references and disclose potential conflicts.
Reviewed by: Subject Matter Experts

Our Review Board

Our content is carefully reviewed by experienced professionals to ensure accuracy and relevance.

  • Qualified Experts: Each article is assessed by specialists with field-specific knowledge.
  • Up-to-date Insights: We incorporate the latest research, trends, and standards.
  • Commitment to Quality: Reviewers ensure clarity, correctness, and completeness.

Look for the expert-reviewed label to read content you can trust.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

two × three =