कोलकाता न्यूज डेस्क | 12 मई 2026: ‘माँ’ — यह शब्द सिर्फ एक संबंध नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, संघर्ष और सामाजिक चेतना का प्रतीक है। मातृ दिवस के अवसर पर शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा आयोजित राष्ट्रीय आभासीय संगोष्ठी ‘माँ का पुनर्पाठ’ में देशभर के साहित्यकारों, शोधार्थियों, शिक्षकों और साहित्य प्रेमियों ने मातृत्व की पारंपरिक और आधुनिक अवधारणाओं पर गहन चर्चा की।
संगोष्ठी में मातृत्व को केवल आदर्श रूप में नहीं, बल्कि वास्तविक चुनौतियों, सामाजिक दबाव और डिजिटल युग की जटिलताओं के साथ समझने का प्रयास किया गया।
प्रमुख विषय और चर्चा
कार्यक्रम में निम्नलिखित विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई:
- डिजिटल युग में माँ की बदलती भूमिका
- सोशल मीडिया का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
- बच्चों में मोबाइल की बढ़ती लत
- दलित एवं श्रमजीवी माताओं का संघर्ष
- हिंदी और तमिल साहित्य में मातृत्व का चित्रण
- बच्चों के चरित्र निर्माण में माँ की भूमिका
संयोजिका ईशा साव का संबोधन
संगोष्ठी की संयोजिका ईशा साव ने दिनकर की प्रसिद्ध कविता से कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए कहा:
“भारतीय साहित्य और समाज में माँ को सदियों से प्रेम, करुणा, त्याग और ममता की प्रतिमूर्ति माना गया है, लेकिन समकालीन साहित्य अब माँ की पारंपरिक छवि का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है। आज की माँ केवल परिवार के लिए समर्पित स्त्री नहीं, बल्कि संघर्षशील, आत्मनिर्भर और बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में उभर रही है।”
- मुख्य वक्ताओं के विचार
डॉ. लिट्टी योहान्नान ने ‘डिजिटल युग की माँ : सोशल मीडिया, मानसिक दबाव और नई चुनौतियाँ’ विषय पर बोलते हुए कहा:
“आज की माँ तकनीक, परिवार, नौकरी और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच निरंतर संतुलन बनाने के लिए संघर्ष कर रही है। सोशल मीडिया पर ‘परफेक्ट मदर’ की छवि महिलाओं पर भारी मानसिक दबाव डाल रही है, जिससे अपराधबोध, अकेलापन और तनाव बढ़ रहा है।”
मुकेश राम ने मुंशी प्रेमचंद के साहित्य का हवाला देते हुए दलित और गरीब माताओं के संघर्ष को रेखांकित किया। उन्होंने ‘कफन’, ‘ठाकुर का कुआं’ और ‘गोदान’ जैसी रचनाओं के उदाहरण दिए।
डॉ. बी. मल्लिका ने हिंदी और तमिल साहित्य में मातृत्व के चित्रण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि माँ का चरित्र अब त्याग और वात्सल्य के साथ-साथ आत्मसम्मान और सामाजिक चेतना का भी प्रतीक बन चुका है।
आशीष अम्बर (दरभंगा) ने बच्चों में मोबाइल लत पर चिंता जताते हुए माता-पिता को जागरूक रहने और बच्चों को रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ने की सलाह दी।
कार्यक्रम की खासियत
संगोष्ठी में कविता पाठ और मुक्त संवाद का भी आयोजन किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने माँ की ममता, संस्कार और वास्तविक चुनौतियों पर आधारित अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। वक्ताओं ने एकमत से कहा कि माँ को आदर्श के ऊंचे मंच पर अकेला छोड़ने के बजाय उसकी मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक दबाव और वास्तविक समस्याओं को समझना समय की मांग है।
अंत में संचालिका ईशा साव ने सभी वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि “मातृत्व को समझने के लिए साहित्य, समाज और तकनीक के बीच संतुलित संवाद आवश्यक है।”
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