विश्व फेफड़ा कैंसर दिवस 1 अगस्त 2025- तंबाकू मुक्त जीवन, स्वस्थ्य हवा व स्वास्थ्य समता का सामाजिक नैतिक व नीतिगत आवाहन।
2025 में हमारे पास तकनीकी, ज्ञान व संसाधन है, फेफड़ा कैंसर से लड़ने के लिए अब सरकार, समाज, चिकित्सा प्रणाली व आम नागरिकों की इच्छाशक्ति व संकल्प की जरूरत है।
अधिवक्ता किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र। वैश्विक स्तर पर पृथ्वी पर 84 लाख योनियाँ विचलित कर रही है, जिसमें मनुष्य का दर्जा सबसे ऊपर है, क्योंकि सृष्टि रचनाकर्ता ने उसे हाईटेक बुद्धि के रूप में अनमोल उपहार दिया है, जिसे हम कुशाग्रता से उपयोग कर अपनी जीवन शैली को जीने के लिए उस कुशाग्र बुद्धि का उपयोग स्वास्थ्य संरक्षण के लिए भी करना जरूरी हो गया है। क्योंकि वर्तमान डिजिटल युग में अनेक नई-नई बीमारियों का दायरा बढ़ता जा रहा है। हालांकि मेडिकल सुविधाओं का दायरा भी बढ़ता जा रहा है परंतु मैं यह मानता हूं कि हर मनुष्य को स्वस्थ शरीर रहना ही उसकी अनमोल पूंजी है। जिसके लिए हमें अपने जीवन शैली में अपने शरीर को उन बीमारियों से बचने के लिए शारीरिक रूप से स्वस्थ्य रहना होगा।
इसके लिए हमें स्वस्थ जीवन शैली को अपनाना होगा। आज हम इस विषय पर चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि आज 1 अगस्त 2025 को विश्व फेफड़ा (लंग्स) कैंसर दिवस है, जो एक खामोश कातिल है। जिसका पता हमें करीब-करीब अंतिम स्टेज पर चलता है। इसलिए हमें अपने जीवन शैली को इस तरह से ढालना है कि इस तरह की बीमारियां हमारे पास फटके भी नहीं। इसलिए आज हम मीडिया में उपलब्ध जानकारी के सहयोग से इस आलेख के माध्यम से चर्चा करेंगे, 2025 में हमारे पास तकनीकी ज्ञान संसाधन हैं। फेफड़ा कैंसर से लड़ने के लिए अब सरकार, समाज, चिकित्सा प्रणाली व आम नागरिक की इच्छा शक्ति व संकल्प की जरूरत है। यह जानकारी मीडिया से ली गई है अतः इसकी सटीकता की गारंटी नहीं दी जा सकती।
साथियों बात अगर हम प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी 1 अगस्त 2025 को फेफड़ा कैंसर जनजागरण दिवस की करें तो, हर साल 1 अगस्त को ‘वर्ल्ड लंग्स कैंसर डे’ मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस घातक बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाना और इसके प्रभाव को कम करने के लिए एकजुट होना है। फेफड़ों का कैंसर दुनिया भर में कैंसर से होने वाली मौतों का एक प्रमुख कारण है और भारत में भी इसकी दरें चिंताजनक हैं। इस गंभीर स्वास्थ्य चुनौती के बावजूद, फेफड़ों के कैंसर से जुड़ी कई ऐसी अफवाहें और गलत धारणाएं आज भी समाज में व्याप्त हैं, जो इसकी रोकथाम, शुरुआती पहचान और प्रभावी उपचार में बाधा डालती हैं। इन मिथकों को तोड़ना और वैज्ञानिक तथ्यों को जानना बेहद जरूरी है ताकि हम इस बीमारी को बेहतर ढंग से समझ सकें और इससे लड़ सकें।
विश्व फेफड़ा कैंसर दिवस 1 अगस्त 2025 को “बाधाओं को तोड़ना : शीघ्र पहचान और समान देखभाल को बढ़ावा देना” थीम के साथ मनाया जा रहा है। इस थीम का उद्देश्य फेफड़ों के कैंसर के शीघ्र निदान और उपचार में असमानताओं को दूर करने पर ध्यान केंद्रित करना है। विश्व फेफड़ा कैंसर दिवस हर साल 1 अगस्त को मनानें का उद्देश्य फेफड़ों के कैंसर के बारे में जागरूकता बढ़ाना और इस बीमारी से प्रभावित लोगों का समर्थन करना है। इस दिन, विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम, शैक्षिक अभियान और चिकित्सा पेशेवर और रोगी संगठन फेफड़ों के कैंसर के बारे में जानकारी साझा करते हैं और इस बीमारी से लड़ने के लिए एकजुटता दिखाते हैं।
उद्देश्य : फेफड़ों के कैंसर के शीघ्र निदान और उपचार में असमानताओं को दूर करना है, अन्य महत्वपूर्ण पहलू :
(1) फेफड़ों के कैंसर से प्रभावित लोगों को याद करना और उनके साथ खड़े होना।
(2) फेफड़ों के कैंसर के कारणों, लक्षणों और रोकथाम के बारे में जागरूकता बढ़ाना।
(3) स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना।
(4) शीघ्र निदान और उपचार के महत्व पर जोर देना। फेफड़ों के कैंसर के रोगियों और उनके परिवारों के लिए आवश्यक संसाधनों को प्रदान करना है।
साथियों बात कर हम फेफड़ा कैंसर बढ़ने के कारणों की करें तो, विशेषज्ञों के मुताबिक, लंग कैंसर के मामलों के बढ़ने के पीछे कई कारण होते हैं जैसे कि, लक्षणों के बारे में जागरूकता की कमी- अधिकांश लोगों को लगातार खांसी, सीने में दर्द और सांस फूलने जैसी समस्या होती है, जो कि इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों में से एक होते हैं। अक्सर लोग इन्हें पहचान नहीं पाते हैं कि ये लंग कैंसर के संक्रमण होने का इशारा है। इस वजह से बीमारी का इलाज देरी से शुरू होता है।
धूम्रपान और तंबाकू का सेवन- डॉक्टर बताते हैं कि भारत के कई राज्यों में बीड़ी, हुक्का और गुटखा जैसी चीजों का सेवन सामाजिक रूप से स्वीकार किया जाता है।
जहां हुक्का पुराने लोगों के घरों में आम हुआ करता था बिल्कुल वैसे ही युवाओं में सिगरेट और मॉडर्न हुक्का पीने का शौक भी तेजी से बढ़ गया है। हालांकि, युवा इन्हें टशनबाजी में करते हैं लेकिन इससे फेफड़ों का कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।
देर से डायग्नोज और स्क्रीनिंग में गड़बड़ी- एक्सपर्ट बताते हैं कि भारत के अस्पतालों में कैंसर की स्क्रीनिंग हो रही है लेकिन फेफड़ों के कैंसर के लिए कोई नियमित स्क्रीनिंग कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाते हैं। ऐसे में कई बार बीमारी का पता मरीज को तब चलता है जब यह पूरे शरीर में फैल जाती है। खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में बीमारी की जांच के लिए कोई विशेष सुविधाएं नहीं दी गई हैं।
गलतफहमियां– दरअसल, फेफड़ों के कैंसर को अक्सर धूम्रपान करने वालों की बीमारी माना जाता है। जबकि बीमारी के बढ़ने के पीछे और भी ठोस वजहें हैं। इस वजह से कई बार यदि इंसान को हल्के लक्षण दिख भी रहे हैं, तो वह सोचकर इलाज से बचता है कि वह सिगरेट नहीं पीता है।
प्रदूषण– लोग प्रदूषण के बारे में जानते हैं लेकिन इससे कैंसर के जोखिम को नहीं समझ पाते हैं। पिछले कई सालों से लंग कैंसर के मामलों में वृद्धि की प्रमुख वजह पॉल्यूशन रही है।पीएम 2.5, इंडस्ट्रियल एमिशन और घर के अंदर के धूंआ भी फेफड़ों के कैंसर का कारण बन जाता हैं।
साथियों बात अगर हम फेफड़ा कैंसर की अन्य जानकारी की करें तो…
(1) फेफड़ा कैंसर की शुरुआती संकेत हमेशा खांसी होना, खांसी में कफ या फिर खून आना। सीने में दर्द होना, गहरी सांस लेने की आदत,आवाज में बदलाव, कमजोरी और थकान महसूस करना। निमोनिया बार-बार होना।
(2) फेफड़ा कैंसर के लास्ट स्टेज में देखने वाले लक्षण- गर्दन में गांठें, हड्डियों और पसलियों में दर्द, सिरदर्द, चक्कर आना, शरीर का संतुलन खोना, हाथ-पैर में सुन्नपन।
बचाव के लिए क्या करें- सिगरेट, शराब जैसी हानिकारक चीजों से परहेज करें। प्रदूषण को घर में न फैलने दें और ऐसे इलाकों में बिना मास्क जाने से बचें।
नियमित जांचें जरूर करवाएं– खासतौर पर वह लोग जो हाई रिस्क ग्रुप जोन में रहते हैं। एक हेल्दी लाइफस्टाइल को फॉलो करें, अपना खान-पान सख्त रूप से सही रखें।
साथियों बात अगर हम फेफड़ा कैंसर के कारणों उपायों इत्यादि के संबंध में पूरी जानकारी प्राप्त करने की करें तो-
फेफड़ा कैंसर : क्या है यह रोग? फेफड़ा कैंसर तब होता है जब फेफड़ों की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं और ट्यूमर का निर्माण करती हैं। यह कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल सकता है। इसके मुख्य दो प्रकार होते हैं : (नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर एनएससी लगभग 85% मामलों में पाया जाता है। स्मॉल सेल लंग कैंसर – तेजी से फैलने वाला प्रकार,15 प्रतिशत मामलों में होता है।
प्रमुख कारणों में शामिल हैं :
(1) धूम्रपान (90 प्रतिशत मामलों में) (2) वायु प्रदूषण (3) रैडॉन गैस (5) एस्बेस्टस और औद्योगिक रसायन (6) आनुवांशिक जोखिम।
आंकड़ों की जुबानी : 2025 में वैश्विक और भारत का परिदृश्य।
(1) वैश्विक स्थिति (डब्ल्यूएसएससीएल, आईएआरसी के अनुसार) : 2025 में अनुमानित 25 लाख नए फेफड़ा कैंसर मामलों का रिकॉर्ड। मृत्यु दर : लगभग 20 लाख लोग इस रोग से मारे गए।
(2) पुरुषों में सर्वाधिक घातक कैंसर और महिलाओं में स्तन कैंसर के बाद दूसरा।
भारत में स्थिति : भारत में 2025 में अनुमानित 1.2 लाख नए मामले। मृत्यु दर 80 प्रतिशत के आसपास। शहरी क्षेत्र अधिक प्रभावित, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से फैलाव। आधुनिक जीवन शैली और बढ़ता जोखिम धूम्रपान : फैशन से विनाश धूम्रपान अब केवल तंबाकू नहीं बल्कि ई-सिगरेट, वेपिंग, हुक्का जैसी आधुनिक प्रवृत्तियों में भी फैल चुका है। युवा वर्ग में इसका प्रचलन ‘कूल फैक्टर’ बन चुका है लेकिन फेफड़ों के लिए यह जहर है। वायु प्रदूषण : अदृश्य हत्यारा, विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, वायु प्रदूषण के कारण फेफड़ा कैंसर का जोखिम 35 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता जैसे शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक बेहद खराब स्तर पर है।
शहरीकरण और इनडोर पॉल्यूशन- घरों में अगरबत्ती, रसोई गैस, परफ्यूम, डियोड्रेंट, कीटनाशक जैसे उत्पादों का अत्यधिक उपयोग भी इनडोर एयर क्वालिटी को खराब करता है। खानपान और फेफड़ा कैंसर- प्रोसेस्ड फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, हाई ट्रांसफैट डाइट- यह सब शरीर में सूजन और कोशिकीय बदलाव को बढ़ावा देते हैं, जो कैंसर का कारण बन सकते हैं। वैज्ञानिक प्रगति और उपचार के नवाचार- इम्यूनोथेरेपी और टारगेटेड थेरेपी, इन आधुनिक तकनीकों ने कीमोथेरेपी के बाद की दुनिया को बदला है। लिक्विड बायोप्सी और एआई आधारित डिटेक्शन, अब ब्लड सैंपल से ही प्रारंभिक स्तर पर कैंसर की पहचान संभव है।
साथियों बातें अगर हम कैंसर से संबंधित स्वास्थ्य सेवाओं की करें तो, चिकित्सा पद्धतियाँ : इलाज की आधुनिक दिशा (1) सर्जरी : प्रारंभिक चरण में कैंसरयुक्त ऊतक हटाना। (2) कीमोथैरेपी : रसायनों द्वारा कैंसर कोशिकाओं को मारना। (3) रेडिएशन थेरेपी : ऊर्जा तरंगों से ट्यूमर को नष्ट करना। (4) टारगेटड थेरेपी : जिन कैंसरों में विशिष्ट म्यूटेशन हो, उनके लिए। (5) इम्यूनथेरेपी : रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत कर कैंसर से लड़ने के लिए सक्षम बनाना।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि फेफड़ा (लंग्स) कैंसर एक खामोश कातिल है- आइए व्यक्तिगत व सामूहिक रूप से मिलकर इसपर ठोस कार्यवाही करें। विश्व फेफड़ा कैंसर दिवस 1 अगस्त 2025- तंबाकू मुक्त जीवन, स्वस्थ्य हवा व स्वास्थ्य समता का सामाजिक नैतिक व नीतिगत आवाहन, 2025 में हमारे पास तकनीकी, ज्ञान व संसाधन है, फेफड़ा कैंसर से लड़ने के लिए अब सरकार, समाज, चिकित्सा प्रणाली व आम नागरिकों की इच्छा शक्ति व संकल्प की जरूरत है।
(स्पष्टीकरण : उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। यह जरूरी नहीं है कि कोलकाता हिंदी न्यूज डॉट कॉम इससे सहमत हो। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।)
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