रसिया रस लूटो होली में

रसिया रस लूटो होली में।
राम रंग पिचुकारि, भरो सुरति की झोली में,
हरि गुन गाओ, ताल बजाओ, खेलो संग हमजोली में।
होरी के ई धूमि मची है, सिहरो भक्तन की टोली में।

श्रीराम पुकार शर्मा, कोलकाता । इसी तरह रंगोत्सव ‘होली’ के अवसर पर न जाने कितने सारे रंगीन मिजाजी गीत भारत के कोने-कोने में सुनने को मिल जाते हैं। वैसे तो भारत-भूमि को अधिकांश विदेशी विद्वान इसे विविधताओं का देश कहकर बहुत पहले से ही इसे खण्डित करने का कुप्रयास करते रहे हैं। पर अपनी विविधताओं रुपी रंग-बिरंगे पुष्पों से सुसज्जित यह भारत-भूमि विश्व पटल पर एक अद्भुत-अनुपम बगिया का दृष्टांत प्रस्तुत करती है। जिसमें विविध जाति-धर्म, रंग-रूप, भाषा-प्रान्त, सभ्यता-संस्कृति, प्राकृतिक स्वरूप जन्य भाँति-भाँति के पुष्प सुसज्जित और सुवासित है। हमारी भारतीय संस्कृति का अनूठा स्वरूप इसके विविध त्योहारों और पर्वो में ही दिखाई देता है।

जब कोई अपने ललाट पर लम्बा टिका लगाये हुए, कोई अपने माथे पर रंगीन पगड़ी धारण किये हुए, कोई अपने गले में क्रास लटकाए हुए और कोई अपने सिर पर सफेद टोपी पहने किसी पर्व-त्यौहार में सम्मिलित होकर एकत्र भाव से उसे मनाते-पालन करते दिखाई देते हैं, तो फिर वह किसी एक विशेष समुदाय का नहीं, वरन समूचे भारत का ही पर्व परिलक्षित होने लगता है। ऐसे ही एक भारतीय पर्व है ‘होली’। जिसमें न जात और न पात, न राजा और न रंक, बल्कि सभी एकत्र भाव से इस अद्भुत रंगीन वसंतोत्सव की रंगोली में रंगे नजर आते हैं । सर्वत्र ही सुनाई देने लगता है –
‘काहे खातिर राजा रूसे काहे खातिर रानी।
काहे खातिर बकुला रूसे कइलें ढबरी पानी॥
जोगीरा सररर….
राज खातिर राजा रूसे सेज खातिर रानी।
मछरी खातिर बकुला रूसे कइलें ढबरी पानी॥
जोगीरा सररर ….’

इस रंगोत्सव में लोग आपसी सारी रंजिश-कटुताओं को अनुराग से परिपूर्ण इन्द्रधनुषी माधुर्य रंग-कलश में डुबो कर उससे उत्पन्न रंगीन प्रेम-रस का चतुर्दिक छिड़काव करने लगते हैं, जिसके सुनहरे छींटों से सभी के चहरे पर प्रसन्नता-उल्लास-स्फूर्ति के रंग चढ़ जाते हैं, जो फिर छुड़ाए नहीं छूटते हैं। राग-रंग का यह लोकप्रिय रंगोत्सव मधुर वसंत का संदेशवाहक तो है ही, फाल्गुन माह में रंग-बिरंगे यौवन स्वरूप के साथ मनाये जाने के कारण इसे ‘फाल्गुनी’ नाम से भी जाना जाता है। इस रंग-बिरंगी त्यौहार का शुभारम्भ वसंत पंचमी को ही पहली बार गुलाल उड़ा कर दिया जाता है। इस दिन से ही गली-मुहल्ले-चौपालों में ‘फाग’ और ‘धमार’ प्रसंग प्रारंभ हो जाते हैं। फिर मंद-मधुर शीतल फगुनाहट समीर की गति के साथ इसकी तीव्रता भी क्रमशः बढ़ती ही जाती है और फिर फाल्गुन पूर्णिमा के दिन यह अपनी पूर्ण पराकाष्ठा में दिखाई देने लगती है। सब के सब इन्द्रधनुषी रंगीन चहरे और रंगीन बदन को प्राप्त कर महादेव की बारात के अद्भुत ‘गण’ प्रतीत होने लगते हैं। अतः यह होली सम्पूर्ण भारतवासी के लिए एकता, समन्वय और सद्भावना का प्रेरक एक राष्ट्रीय पर्व ही तो है।

धरती के समस्त पादप-पुंज पतझड़ के उपरांत स्वतः ही नूतन किसलय, नूतन पुष्पों से सुसज्जित प्राणवान बनकर न जाने कितने रंग बिखेर देते हैं। विभिन्न रंग-आकर के भौरें व तितलियाँ पुष्पों के साथ अठखेलियाँ करते किसी चित्रपट के सजीव चित्र बन जाते हैं। आम की डालियों के मोजरों के पीछे छिप कर बैठी कोयलिया भी ‘कुहुक’ कर पंचम स्वर में नये राग छेड़ देती हैं। इन विविध पुष्पित रंगों के छींटों से युक्त धरती के हरित-पीताभ परिधान मंद-मंद शीतल समीर में चतुर्दिक लहराते हुए पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सबको ही उल्लास से परिपूर्ण कर देते हैं। हर प्राणी का तन-मन भी इस मधुर आनन्द-रस में गोते लगाने के लिए व्यग्र हो उठता है। मन-मयूरी भी अन्तः की खुशियों को रंग-गीत-धमाल के रूप में व्यक्त करने लगती है।
‘क्यों मो पे मारी रंग की पिचकारी,
देखो कुँअर जी दूंगी गारी।
भाग सकूँ मैं कैसे मो से भागा नहीं जात,
ठाड़ी अब देखूँ और को सनमुच में आत।’

रंगों के इस खुबसूरत पर्व होली के सम्बन्ध को श्रीहरिविष्णु भक्त प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त राक्षसी ढुंढी, राधा-कृष्ण के रास, श्रीकृष्ण द्वारा पूतना का बधोपरांत उल्लास, महादेव शिव की बारात, कामदेव के पुनर्जन्म आदि से भी जोड़ कर देखा जाता है। जो भी हो, इस पर्व का प्रथम दिन तो होलिका दहन और पर दूसरे दिन ही रंग-अबीर- गुलाल के साथ रंगोत्सव का आनन्द ही कुछ और होता है। इसके साथ ही चन्द्रकला, गुझिया, दही-बड़ा, ठंढाई आदि चंचल मन को भी रंगीला बनाने में कोई कमी-कसर नहीं छोड़ते हैं। होली की वास्तविक ख़ुशी तो बच्चों के रंगीन चहरे पर ही दिखाई देती है। अपने हाथों में रंग-बिरंगी पिचकारी सम्भाले, सब पर रंग डालते, भागते-फिरते जो सबेरे से निकलते हैं, फिर वे दोपहर के बाद ही अपने बानरी रंगीन स्वरूप में घर लौटते हैं। उन्हें पहचान पाना उनके माता-पिता के लिए भी कुछ दुश्वार हो जाता है। गली-मुहल्लों में लाल-गुलाबी, हरे-पीले अबीर-गुलाल उड़ते ही रहते हैं और ‘होली है….. ’ की ध्वनि प्रतिध्वनित होती ही रहती है।
‘ब्रज की कुञ्ज गलिन में होली खेले नन्दलाल बरजोरी।
छिरकत जुगल समाज परस्पर, मलत मुखन में रोरी, बाजत तृन तोरी।
बाजत झांझ, मिरिदंग, ढोलि ढप, गृह गह भये चहुँ ओरी, नवसात संजोरी।’

रंगोत्सव होली का प्रचलन सम्पूर्ण भारत-भूमि सहित विदेशों में भी है। पर होली सम्बन्धित सबके आकर्षण का केंद्र बिंदु ‘ब्रज की होली’ ही है। फिर बरसाने की ‘लठमार होली’ की भी तो बात ही क्या कहना? इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालने की कोशिश करते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी लगातार 15 दिनों तक यह रंगोत्सव बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। बिहार में मौज-मस्ती के साथ ‘फगुआ’ तो, कुमाऊँ में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियाँ होती हैं। हरियाणा की ‘धुलंडी’ में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा, तो बंगाल में ‘दोल जात्रा’ रूप में होली मनाई जाती है। महाराष्ट्र में ‘रंग पंचमी’ के रूप में तो, गोवा में जलूस और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करके होली मनाई जाती है।

इसी तरह से तमिलनाडु में कामदेव की कथा पर आधारित ‘कमन पोडिगई’ के रूप में, तो मणिपुर में पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर झोपड़ी बनाकर ‘याओसांग’ के रूप में होली मनाई जाती है। छतीसगढ़ की ‘होरी’ में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है, तो मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी के ‘भगोरिया’ के रूप में होली मनाने की परम्परा है। पंजाब में होली के अवसर पर ‘होला मोहल्ला’ और सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा रही है। यहाँ तक कि नेपाल की होली में भी भारतीय धार्मिक व सांस्कृतिक रंगों का ही प्रभाव दिखाई देता है।
‘आज बिरज में होली रे रसिया, होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।
उड़त गुलाल लाल भए बादर, केसर रंग में बोरी रे रसिया।’

हमारे प्राचीन विविध संस्कृत साहित्यों में होली सम्बन्धित विविध रीति व स्वरूपों का विस्तृत वर्णन है। जिनमें हर्षवर्धन की ‘प्रियदर्शिका’ व ‘रत्नावली’, कवि कालिदास की ‘कुमारसंभव’, ‘ऋतुसंहार’ व ‘मालविकाग्निमित्रम’, आदि रचनाओं में रंगोत्सव सम्बन्धित वसंतोत्सव का विशद वर्णन है। कालांतर में चंदबरदाई के ‘पृथ्वीराज रासो’, विद्यापति की ‘पदावली’, अमीर खुसरों की रचनाओं आदि में भी होली का वर्णन है। भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारीलाल, केशव, घनानन्द, पद्माकर आदि अनेक कवियों की होली विषयक पद्य-चर्चा अति मनोहारी रहा है। होली के माध्यम से इन भक्त कवियों ने जहाँ एक ओर लौकिक नायक-नायिकाओं के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णन किया है, तो वहीं दूसरी ओर राधा व कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़-छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण और निर्गुण भक्तिमय प्रेम को ही प्रदर्शित किया है।
खेलत फाग फिरत रस फूले।
स्यामा स्याम प्रेम बस नाचत गावत सुरंग हिंडोरे झूले॥

भारतीय शास्त्रीय व उपशास्त्रीय संगीत का भी होली के साथ गहरा संबंध है। ध्रुपद, धमार, छोटे ख्याल व बड़े ख्याल और ठुमरी में होली के गीतों का राग-सौंदर्य अपने आप में अद्वितीय है। इसी तरह भारतीय शास्त्रीय नृत्य में भी होली को विशेष स्थान प्राप्त है। संगीत की एक तो विशेष शैली है, जिसका नाम ही ‘होली’ है, जिसमें अलग-अलग प्रांतों के अनुकूल होली सम्बन्धित विभिन्न क्रिया-कलापों का वर्णन सुनने को मिलता है। उनमें उस स्थान से सम्बन्धित भाषा-बोली, धार्मिक महत्व, इतिहास और लोक-संस्कृति अभिव्यक्ति होती है।
‘बम भोला बाबा, कहवां रंगवत पागरिया।
कहवां बाबा के जाहा रंगइले और कहवां रंगइलें पागरिया।’

कहीं श्रीराम-सीता के संग तो, कहीं श्रीकृष्ण-राधा व गोपियों के संग, कहीं शिव-पार्वती के संग तो, कहीं देव-देवीगण नर-नारी के रूप में इस रंगोत्सव होली में अवश्य ही रंगीन बन रहे होते हैं, तो फिर हम सब भी क्यों न अपनी सारी रंजिशों को रंग-कलश में डाल कर अपने इष्टदेव को स्मरण करते हुए रंगों के इस त्यौहार होली के हृदयस्पर्शी रंगीन आनन्द को आत्मसात कर लेवें –
‘खेलत रघुपति होरी हो, संगे जनक किसोरी।
इत राम लखन भरत शत्रुघ्न, उत जानकी सभ गोरी,
केसर रंग घोरी।’

(होली उत्सव, 18-19 मार्च, 2022)

श्रीराम पुकार शर्मा, कहानीकार

श्रीराम पुकार शर्मा
हावड़ा – 711101 (पश्चिम बंगाल)
ई-मेल सम्पर्क सूत्र – [email protected]

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