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साहित्य समीक्षा : गजल संग्रह – पयामे ज़ीस्त

जौनपुर, यूपी। आदरणीय गुरुदेव विनय सागर जायसवाल जी की ताजा काव्य संकलन पयामे ज़ीस्त आपके वर्षों के समर्पण का फल है।
कविता, गीत, गजल लिखना आपका प्रिय शौक है। आपका गजल संग्रह पयामे ज़ीस्त मेरे मझले पुत्र बृज भूषण (गंगा समग्र पश्चिम बंगाल के अध्यक्ष) हाथों प्राप्त हुआ था। लड़का गंगा मिशन के काम से बरेली गया था तब मैंने उनको गुरुदेव जी से मिलने के लिए कहा था। तब गुरु जी ने अपना गजल संग्रह दिया था।

हिन्दी भाषा में भी गजल ‌के संग्रह छप रहे हैं, लेकिन काव्य की इस विधा की राहें सरल भी है ‌और कठिन भी। गजल न केवल अभ्यास चाहती है, बल्कि हृदय का रक्त भी चाहती है। इस राह से गुजरते हुए अच्छे अच्छों के कदम डगमगाए हैं।

इस गजल संग्रह का आरंभ देवी वंदना से हुआ है। शायर की मान्यता है कि जीवन की सार्थकता ईश – स्तुतियों में ही निहित है। शारद वीणा झंकारों से, सब ज्ञान दीप जल जायेंगे।

हिन्दी और देश का हित ऐसे ही लोगों से संभव है जिनका देश की एकाधिक भाषाओं पर अधिकार हो। आदरणीय सागर जी उन्हीं विरल लोगों में हैं, जिनकी निष्ठा एक विधा तक ही सीमित नहीं है। आदरणीय गुरुदेव सागर जी ने गजल को अपने विचारों को व्यक्त करने का माध्यम बनाया है। आप अपनी एक विशेष शैली में अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्ति करते हैं।

आपकी गजलों में परम्परा का ख्याल रखा गया है। लेकिन कहीं उलझाव वाला वातावरण नहीं है। अनुभूतियों में ठहराव है। झरने का शोर नहीं और हल्का सर्द गर्म परिवेश है। आप बनावट और ताम झाम से परहेज करते हैं। सीदे सादे ढंग से अपनी बातें कहते हैं। आपकी गजलों के अध्ययन अनुशीलन से यह अंदाजा होता है कि आप अपने शेरों को कोमलता से व्यक्त करते हैं।

आपकी गजलों का संग्रह पयामे ज़ीस्त अध्ययन के लिए मानसिक परिश्रम नहीं चाहता, बल्कि अत्यंत प्रेम और ध्यान की अपेक्षा करता है। कुछ पंक्तियां दृष्टव्य हैं।

हमारे फैसले होते कड़े है,
अगरचे फायदे इसमें बड़े है।

ज़िद कोई मैंने कभी ठानी नहीं,
इस लिए मुझको पशेमानी नहीं।

मेरी आदत में शामिल गर रवादारी नहीं होती,
तो मेरी ज़िन्दगी की इस कदर ख्वारी नहीं होती।

आज जो हर तरफ उजाला है,
मेरी गजलों ने रंग डाला है।

जो ‌शख़्स दे के गया था कभी गुलाब मुझे,
उसी ने प्यार से तोड़ा है बेहिसाब मुझे।

ऐसे अश‌आ्र इस संकलन में आपको मिलेंगे जहाँ कवि अपने काल की व्यथाओं और उलझनों का वर्णन करता है : समय के अन्याय – अत्याचारों पर आहें भरता है और फिर नये हौसले ‌के साथ चल पड़ता है।

राम शिरोमणि उपाध्याय पथिक जौनपुरी,
उत्तर प्रदेश, जौनपुर

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