विनय सिंह बैस, नई दिल्ली । बहुत समय पहले की बात है। तब मैं शायद 6-7 साल का रहा होऊंगा!! उन दिनों ज्यादातर घरों में भोजन पकाने के बाद आग को राख से ढक दिया जाता था। अगली बार भोजन पकाने के लिए राख को हटाकर इसी आग का उपयोग भोजन पकाने के लिया किया जाता था। हां, बीच मे हुक्का, गांजा पीने वाले भी अजिया से आग मांगने घर आ जाया करते थे। औरते राख को किसी वजनी बर्तन से दबा दिया करती थी क्योंकि तेज हवा चलने पर यही आग कई बार फूस के छप्परों में आग लगने का कारण भी बन जाया करती थी।

माचिस उस जमाने मे लक्ज़री वस्तु हुआ करती थी। ज्यादातर बीड़ी पीने वालों के पास ही पाई जाती थी। मेरे तीसरे नम्बर वाले बाबा बीड़ी पीते थे। कई बार 25 पैसे देकर दुकान से बीड़ी- माचिस मंगाते । 20 पैसे की ‘बालक छाप’ बीड़ी और पांच पैसे की सुंदर सी लड़की ‘रूबी या चाबी ब्रांड’ वाली माचिस।

बीड़ी तो नहीं लेकिन माचिस मुझे बड़ा आकर्षित करती थी। माचिस की तीली जलाने से मुझे वैज्ञानिक जैसी फीलिंग आती थी। गोया कि हमने आग का आविष्कार कर दिया। माचिस की डिब्बी भी बड़ी रंगीन हुआ करती थी, उस पर सुंदर, मनभावन तस्वीरें छपी रहती थीं। तीली को माचिस पर रगड़ने से आने वाली बारूद की गंध भी मुझे विशिष्ट लगती थी।

एक बार मेरे गांव के ही एक रिश्तेदार के यहां शादी थी। उन्होंने बारात में जाने के लिए चुलिहा नेवार (सपरिवार) निमंत्रण दे रखा था। हमारा परिवार कुछ ज्यादा ही बड़ा था इसलिए बस की क्षमता और जनाती (लड़कीं वालों) की इज्जत को ध्यान में रखते हुए परिवार के कुछ बड़े लोग ही बारात में गए। किसी भी बच्चे को नहीं ले जाया जा रहा था। बाकी बच्चे तो मान गए, लेकिन मैं नंगा (जिद करने लग) गया। अपने ‘चम्मच” (पापा का लाडला) को जिद करते देख पापा को मेरे ऊपर दया आ गई। बोले – “इस बार मान जाओ, अगली कोई भी बारात होगी तो तुम्हें पक्का ले चलूँगा। फिलहाल ये दस पैसे लो और कुछ खा-पी लेना।”

मैं दस पैसे लेकर होरिल (दुकानदार का नाम) की दुकान गया। पांच पैसे के चार कम्पट (लेमनचूस) खरीदे और पांच पैसे की रंगीन कैलेंडर के नीचे स्टेपल की हुई चूरन की पुड़िया खरीदने ही वाला था कि मेरी नजर माचिस पर पड़ गई। मैंने कहा, “पांच पैसे की माचिस दे दे।”

“बाबा ने मंगाया है?? बीड़ी नहीं मंगाई?” दुकानदार ने पूछा
“हां बाबा ने मंगाई है। बीड़ी अभी है, सिर्फ माचिस चाहिए।” मैंने झूँठ बोल दिया।

अब चूंकि मेरे पास खुद की माचिस थी तो मैं उस से एक्सपेरीमेंट करने को स्वतंत्र था। एक तीली जलाने की कोशिश की, लेकिन वह टूट गई। दोबारा कोशिश की तो वह जली तो लेकिन तुरत ही हवा से बुझ गई। दो-चार तीली और जलाकर मैंने तीली जलाने में निपुणता हासिल कर ली। एक स्टेप पूरा हुआ।

फिर मेरे खाली दिमाग में मेंटोस आइडिया आया कि खाली तीली बहुत जला ली, अब इससे कुछ आगे बढ़ना चाहिए। संयोग से पड़ोस वाले बाबा के घर के सामने बहुत सी पतावर (कुश) बंधी रखी थी। मैंने एक ही बार मे तीली जलाई और उसमें आग लगा दी। आग लगाकर बड़ा मजा आया। मैं बहुत खुश हुआ।

लेकिन कुछ समय बाद आग धीरे-धीरे बढ़ने लगी। मैं डर गया। मैंने पहले तो एक लकड़ी से, फिर मिट्टी डालकर आग बुझाने की कोशिश की। लेकिन तब तक आग फैल चुकी थी। हमारे मुहल्ले चौघरा के सारे घर छप्पर से ढके हुए तथा एक दूसरे से जुड़े हुए थे। एक घर मे आग लगने का मतलब था कि पूरे मुहल्ले और संभव है कि गांव भर में भी आग फैल जाना। यह सोचकर मैं रोने और चिल्लाने लगा। मेरा रोना सुनकर मुहल्ले के लोग दौड़ कर आए और थोड़े प्रयासों के बाद आग बुझा दी गई।

मैं अपराधी सा एक कोने में छिपा हुआ था। भीड़ का फायदा उठाकर मैंने खिसकने की कोशिश की लेकिन छोटे बाबा की नजर मुझ पर पड़ गई। मैं पूरी दम लगाकर भागा और बाबा पीछे-पीछे भागे। तकरीबन 50 मीटर तक तो मैं लीड लिए रहा लेकिन फिर हार गया। बाबा ने पीछे से मेरी कॉलर पकड़ी और एक झन्नाटेदार झापड़ रसीद कर दिया।
“तुम्हें बारात जाने नहीं मिलेगा तो तुम गांव फूंक दोगे” वो बहुत गुस्से में थे।

खैर, बात आई-गई हो गई। चूंकि मुझे नौकरी जल्दी मिली थी इसलिए मेरे लाख मना करने के बावजूद पापा ने मेरी शादी भी जल्दी ही कर दी। शादी के कई साल बाद, एक दिन जब पापा बहुत ही अच्छे मूड में थे तो मैंने पापा से हिम्मत करके पूछ लिया, “पापा, इतनी क्या जल्दी पड़ी थी मेरी शादी करने की?? मैं फौज में कोई “अग्निवीर” योजना के अंतर्गत तो भर्ती नहीं हुआ था कि चार साल बाद निकाल दिया जाता? मैं कहीं भागा तो नहीं जा रहा था और मेरा कोई चक्कर भी नहीं चल रहा था। फिर क्या आशंका थी मुझको लेकर जो मेरा बाल विवाह कर दिया??

“तुम्हारी सब बातें ठीक हैं। तुम शरीफ थे, 20 साल वाली सेवा में गए थे, कहीं भागे भी नहीं जा रहे थे। सहमत। लेकिन एक बार किसी दूसरे की शादी में नहीं ले गए थे तो तुमने गांव ही फूंक डालने की कोशिश की थी। कहीं, तुम्हारी शादी में देर करते, तो तुम पता नहीं क्या फूंक डालते??” पापा ने मुस्कराते हुए जवाब दिया।

मैं लाजवाब हो गया।।

Vinay Singh
विनय सिंह बैस
Shrestha Sharad Samman Awards

1 COMMENT

  1. सफल लेखन में एक मूलभूत गुण मानी जाने वाली, विषय-वस्तु, कहानी को अर्थ देने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। कोई लेखक केवल किसी ऐसी कहानी की रचना करते हुए, जो यथार्थ जीवन की अपनी प्रासंगिकता के द्वारा पाठकों तक पहुँच बनाती है, संसार में अंतर उत्पन्न कर सकता है। विषय-वस्तु पर बल देते हुए, अधिक उपदेशपूर्ण बनाने का प्रयास ।
    आपने जो कहानी लिखी है उसकी सीख स्वाभाविक रूप से टपकने दीजिए जिससे पाठक इस पर स्वयं चिंतन करेंगे।

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