कोलकाता | 26 दिसंबर 2025: कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कथित जातिसूचक गाली-गलौज फोन कॉल के जरिए की गई हो, तो ऐसे मामले में SC/ST (Prevention of Atrocities) Act के प्रावधान स्वतः लागू नहीं होते।
अदालत ने कहा कि कानून की मंशा सार्वजनिक अपमान और प्रत्यक्ष उत्पीड़न से जुड़ी है, न कि निजी संवाद से।
क्या है पूरा मामला
यह फैसला जस्टिस शाहादत की एकल पीठ ने सुनाया। अदालत उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोप था कि शिकायतकर्ता को फोन पर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर अपमानित किया गया। इस आधार पर SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि :- “SC/ST Act का उद्देश्य किसी अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से अपमानित या भयभीत किए जाने से बचाना है। फोन पर की गई कथित गाली-गलौज को अपने आप ‘public view’ में किया गया कृत्य नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर आपत्तिजनक या अपमानजनक भाषा SC/ST Act के दायरे में नहीं आती, जब तक कि वह कानून में निर्धारित शर्तों को पूरा न करे।
‘Public View’ की शर्त अहम
हाईकोर्ट ने पूर्व के सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि SC/ST एक्ट की धारा 3 के तहत अपराध तभी बनता है, जब
- अपमान सार्वजनिक स्थान या सार्वजनिक दृष्टि में हो
- या किसी तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति में किया गया हो
- फोन कॉल जैसे निजी संवाद में यह शर्त स्वतः पूरी नहीं होती।
हालांकि अन्य धाराओं में कार्रवाई संभव
अदालत ने यह भी जोड़ा कि यदि फोन पर धमकी, गाली-गलौज या उत्पीड़न हुआ है, तो आईपीसी की अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है, लेकिन केवल इसी आधार पर SC/ST एक्ट लगाना उचित नहीं है।
कानूनी हलकों में फैसले की चर्चा
इस फैसले को कानूनी स्पष्टता देने वाला माना जा रहा है, क्योंकि हाल के वर्षों में SC/ST Act के दुरुपयोग और उसकी व्याख्या को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं।
ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च कर, फॉलो करें।



