स्पोर्ट्स डेस्क, कोलकाता | 20 जुलाई 2026: “तोमार होलो शुरू, आमार होलो शारा” (तुम्हारा हुआ आरंभ, मेरा हुआ अंत…”) रवीन्द्रनाथ ठाकुर की यह पंक्ति शायद इस कहानी का शीर्षक हो सकती थी। लेकिन लामिन यामाल की यात्रा किसी गीत या उपमा से कहीं बड़ी है। यह उस विश्वास की कहानी है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी टूटता नहीं।
रोमन सम्राट जूलियस सीज़र अपने सैनिकों से कहा करते थे कि जो संकट अभी आया ही नहीं, उससे डरना सबसे बड़ी हार है। शायद यही दर्शन अनजाने में मुनिर नस्राउई और शीला एबाना ने भी जिया। यही दो लोग हैं, जिन्होंने दुनिया को लामिन यामाल जैसा सितारा दिया।
नाम में छिपी पूरी कहानी
लामिन यामाल का पूरा नाम Lamine Yamal Nasraoui Ebana है।
स्पेन की नामकरण परंपरा के अनुसार उनके नाम का “नस्राउई” हिस्सा पिता के परिवार से और “एबाना” हिस्सा मां के परिवार से आया है।
- “Lamine” अरबी शब्द अल-अमीन से निकला है, जिसका अर्थ है ईमानदार और विश्वसनीय।
- “Yamal” अरबी शब्द जमाल से बना है, जिसका अर्थ है सुंदरता।
यह नाम केवल पहचान नहीं, बल्कि दो संस्कृतियों, दो परिवारों और दो महाद्वीपों की विरासत है।
दो दोस्तों के नाम पर रखा बेटे का नाम
यामाल के पिता मोरक्को से और मां इक्वेटोरियल गिनी से हैं। बेटे के जन्म के समय परिवार बेहद आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। घर चलाना मुश्किल था।
इसी कठिन दौर में उनके दो दोस्तों लामिन और यामाल ने आर्थिक और मानसिक दोनों तरह से मदद की।
कृतज्ञता के प्रतीक के रूप में माता-पिता ने अपने बेटे का नाम दोनों दोस्तों के नाम जोड़कर लामिन यामाल रखा।
उधार लेकर पिता ने दिलाया पहला बूट
यामाल के बचपन में ही माता-पिता अलग हो गए। वह मां के साथ बड़े हुए, लेकिन फुटबॉल का सपना उनके पिता मुनिर ने देखा था। आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि बेटे के लिए फुटबॉल बूट खरीदने तक के पैसे नहीं थे।
तब एक दुकानदार से उधार पर बूट लेकर मुनिर ने कहा था— “एक दिन मेरा बेटा बड़ा खिलाड़ी बनेगा और आपका पैसा चुका देगा।”
आज वही यामाल चाहें तो पूरी जूता कंपनी खरीदने की आर्थिक क्षमता रखते हैं। लेकिन पिता का वह संघर्ष और त्याग उनके लिए आज भी सबसे बड़ी पूंजी है।
रोकाफोंडा को कभी नहीं भूले
12 वर्ष की उम्र में यामाल ने बार्सिलोना की प्रसिद्ध ला मासिया अकादमी में प्रवेश लिया। इसके बाद उनका सफर लगातार ऊंचाइयों की ओर बढ़ता गया, लेकिन उन्होंने कभी अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा।
उनकी उंगली पर लिखा “304” दरअसल उनके बचपन के इलाके रोकाफोंडा के पोस्टल कोड के अंतिम तीन अंक हैं।
गोल करने के बाद वह अक्सर यही संख्या दिखाते हैं, मानो पूरी दुनिया को बता रहे हों कि महानता की शुरुआत किसी महल से नहीं, बल्कि साधारण गलियों से भी हो सकती है।
विश्व कप में भी नहीं भूले अपनी पहचान
विश्व कप के दौरान यामाल ने अपने सिर पर “Rocafonda” लिखा हेडबैंड पहना और अपने फुटबॉल बूट पर माता-पिता की जन्मभूमि मोरक्को और इक्वेटोरियल गिनी के झंडे लगाए।
उनका संदेश साफ था— अपनी पहचान पर गर्व करो, क्योंकि वही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत है।
सीमाएं मिटा देता है फुटबॉल
यामाल की कहानी केवल एक खिलाड़ी की सफलता नहीं है। यह उन लाखों प्रवासी परिवारों की कहानी है, जो संघर्ष के बावजूद अपने बच्चों के सपनों को जिंदा रखते हैं। यह बताती है कि गरीबी प्रतिभा को रोक नहीं सकती, यदि परिवार विश्वास बनाए रखे।
दुनिया के सबसे महान और प्रभावशाली गीतकारों में से एक जॉन लेनन ने लिखा था—
“तुम कह सकते हो कि मैं एक स्वप्नदृष्टा हूं, लेकिन मैं अकेला नहीं हूं। मुझे उम्मीद है कि एक दिन तुम भी हमारे साथ जुड़ोगे और पूरी दुनिया एक होकर जीएगी।”
लामिन यामाल उसी सपने का जीवंत उदाहरण हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि फुटबॉल केवल खेल नहीं, बल्कि भाषा, धर्म, रंग और सीमाओं से ऊपर उठकर इंसानों को जोड़ने वाला सबसे सुंदर सेतु है।
विश्व कप जीतने वाले इस युवा सितारे की कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है कि सपनों की उड़ान परिस्थितियों से नहीं, हौसलों से तय होती है।
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