कोलकाता हिन्दी न्यूज | 13 जुलाई 2026: सात साल पुराने एक संवेदनशील पॉक्सो (POCSO) मामले में कोलकाता हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने सबूतों के अभाव में नाबालिग से दुष्कर्म के आरोप में दोषी ठहराए गए उसके सौतेले पिता को बरी कर दिया।
हाई कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के गर्भवती होने का तथ्य निर्विवाद है, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि गर्भधारण के लिए आरोपी ही जिम्मेदार था।
क्या है पूरा मामला?
मामला 10 अक्टूबर 2018 का है। अचानक एक किशोरी की तबीयत बिगड़ गई और उसे तेज पेट दर्द के कारण आर. जी. कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल ले जाया गया। जांच में डॉक्टरों ने पाया कि किशोरी करीब तीन महीने की गर्भवती है।
हालांकि गर्भ सामान्य स्थान पर नहीं था। डॉक्टरों ने इसे एक्टोपिक प्रेग्नेंसी (Ectopic Pregnancy) बताया, जिसके कारण किशोरी को अत्यधिक रक्तस्राव हो रहा था। उसकी जान बचाने के लिए तत्काल ऑपरेशन कर गर्भपात कराया गया। ऑपरेशन के बाद वह कई दिनों तक आईसीयू में भर्ती रही।
पीड़िता ने सौतेले पिता पर लगाए गंभीर आरोप
अस्पताल में उपचार के दौरान किशोरी ने आरोप लगाया कि उसका सौतेला पिता कई महीनों से जबरन शारीरिक संबंध बना रहा था। उसने यह भी दावा किया कि विरोध करने या किसी को बताने पर आरोपी उसे जान से मारने की धमकी देता था। डर की वजह से वह लंबे समय तक चुप रही।
मां ने दर्ज कराई शिकायत
बेटी की आपबीती सुनने के बाद उसकी मां सीधे टाला थाने पहुंचीं और अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने POCSO Act की धारा 4 और 6 के तहत मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
जांच के दौरान पीड़िता का मजिस्ट्रेट के समक्ष गोपनीय बयान दर्ज किया गया। अदालत में उसने आरोपी की पहचान भी की। मेडिकल रिपोर्ट में भी यौन संबंध और गर्भधारण के संकेत मिलने की बात कही गई।
निचली अदालत ने सुनाई थी सजा
सभी साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर निचली अदालत ने 18 फरवरी 2019 को आरोपी को दोषी ठहराया था। इसके बाद आरोपी ने इस फैसले को कोलकाता हाई कोर्ट में चुनौती दी।
हाई कोर्ट ने क्यों किया बरी?
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा और न्यायमूर्ति स्मिता दास दे की खंडपीठ ने की।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि:
- पीड़िता के गर्भवती होने पर कोई विवाद नहीं है।
- लेकिन अभियोजन पक्ष यह संदेह से परे साबित नहीं कर सका कि गर्भधारण के लिए आरोपी ही जिम्मेदार था।
- आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक होते हैं।
- पर्याप्त प्रमाण के अभाव में आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इन्हीं आधारों पर हाई कोर्ट ने करीब सात वर्ष बाद आरोपी को बेकसूर बरी कर दिया।
अदालत का संदेश
यह फैसला एक बार फिर स्पष्ट करता है कि गंभीर आरोपों वाले मामलों में भी न्यायालय केवल कानूनी रूप से स्वीकार्य और पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय देता है। भावनात्मक या परिस्थितिजन्य पहलू महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन दोषसिद्धि के लिए ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।
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