कोलकाता हिन्दी न्यूज | 29 सितम्बर 2026: दुर्गापूजा केवल मंत्रोच्चार और शास्त्रीय विधि-विधान तक सीमित नहीं है। बंगाल की लोकसंस्कृति में यह पारिवारिक मिलन, परंपरा, कला और उत्सव का भी अवसर है। कोलकाता के तीन ऐतिहासिक राज परिवारों की दुर्गापूजा से जुड़ी एक लोकप्रिय जनश्रुति इसी सांस्कृतिक विरासत को खूबसूरती से बयां करती है।
कहा जाता है कि मां दुर्गा जोड़ासांको के दॉन परिवार के यहां सजती हैं, कुम्हारटोली के मित्र परिवार में भोजन करती हैं और शोभाबाजार राजबाड़ी में रातभर नृत्य-संगीत का आनंद लेती हैं। इस कहावत के पीछे इन परिवारों की पूजा से जुड़ी पुरानी परंपराएं हैं।
दॉ परिवार में देवी के वस्त्र और आभूषणों की भव्यता, मित्र परिवार में बड़े पैमाने पर भोग और शोभाबाजार राजबाड़ी में आयोजित नृत्य-संगीत की महफिलें इस लोककथा का आधार मानी जाती हैं। समय के साथ इन आयोजनों का स्वरूप बदला है, लेकिन तीनों परिवारों में आज भी परंपरागत रीति से पूजा होती है।
1. जोड़ासांको का शिवकृष्ण दॉ परिवार: मां के शृंगार की परंपरा
कोलकाता के जोड़ासांको स्थित शिवकृष्ण दॉ परिवार में दुर्गापूजा की शुरुआत 1840 में गोकुलचंद्र दॉ ने की थी। परिवार का मूल निवास बर्दवान के सातगाछिया में था, जहां आज भी मंदिर और प्रतिमा मौजूद होने की बात कही जाती है। वहां पूजा कितने समय से होती रही, इसकी निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है।
गोकुलचंद्र दॉ के दत्तक पुत्र शिवकृष्ण दां के समय परिवार की समृद्धि और पूजा की भव्यता बढ़ी। परिवार का लोहा, कोयला और हार्डवेयर का कारोबार काफी फला-फूला। शिवकृष्ण दॉ को सजने-संवरने का शौक था और उन्होंने देवी को भी विशेष रूप से सजाने का निश्चय किया।
परिवार की परंपरा के अनुसार, देवी के लिए फ्रांस और जर्मनी से विशेष कारीगरी वाले वस्त्र और आभूषण मंगवाए गए थे।
इन पर सुनहरी और चांदी जैसी जरी का काम तथा कीमती पत्थरों की सजावट थी। देवी के इस भव्य शृंगार से जुड़ी लोकप्रिय मान्यता बनी कि मां धरती पर आती हैं तो सबसे पहले दॉन परिवार में सजती हैं।
पूजा की खास परंपराएं
- रथयात्रा के दिन गड़ानकाठी पूजा के साथ प्रतिमा निर्माण शुरू होता है।
- जन्माष्टमी पर देवी का मस्तक प्रतिमा के ढांचे पर स्थापित किया जाता है; अन्य देवी-देवताओं के मस्तक बाद में लगाए जाते हैं।
- कारीगर देवी का चालचित्र तैयार करते हैं।
- देवी के शृंगार और प्राण-प्रतिष्ठा की परंपरा में 13 साड़ियां और 13 कांसे के पात्र शामिल हैं।
- पूजा में 108 पीतल के दीप सजाए जाते हैं।
- वैष्णव परंपरा का पालन करने वाले इस परिवार में बलि नहीं दी जाती।
- अष्टमी पर भव्य रूप से कुमारी पूजा आयोजित होती है।
2. कुम्हारटोली का अभयचरण मित्र परिवार: मां के भोग की परंपरा
कुम्हारटोली के अभयचरण मित्र परिवार की दुर्गापूजा लगभग 218 वर्ष पुरानी बताई जाती है। परिवार में पूजा की शुरुआत राधाकृष्ण मित्र ने की थी। रथयात्रा के दिन ढांचे की पूजा के बाद घर में ही प्रतिमा तैयार की जाती है। देवी को डाकेर साज से सजाया जाता है और प्रतिपदा के दिन बोधन होता है।
सप्तमी से नवमी तक कुमारी पूजा होती है। अष्टमी पर कल्याणी पूजा की जाती है। संधि पूजा में सामान्यतः 108 कमल चढ़ाए जाते हैं, जबकि दर्जीपाड़ा के मित्र परिवार में 108 अपराजिता फूलों से पूजा करने की परंपरा बताई जाती है। नवमी पर हवन और प्रदक्षिणा होती है।
भोग में पारंपरिक व्यंजनों की भरमार
इस परिवार की पूजा में भोग का विशेष महत्व है। धूप में सुखाई गई मूंग दाल से खिचड़ी बनाई जाती है और नैवेद्य में तली हुई सब्जियां भी रखी जाती हैं। मक्खन का नैवेद्य इस पूजा की खास परंपराओं में शामिल है।
परिवार की परंपरा के अनुसार, देवी को 30 से 50 मन चावल का नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
इसके साथ विभिन्न प्रकार की मिठाइयां, गजा, निमकी, लुची और राधाबल्लभी जैसे पकवान भी होते हैं। भोग की इसी विशाल व्यवस्था से जुड़ी जनश्रुति है कि दां परिवार में शृंगार के बाद मां दुर्गा कुमोरटुली के मित्र परिवार में भोजन करती हैं।
3. शोभाबाजार राजबाड़ी: नृत्य-संगीत और ऐतिहासिक पूजा
शोभाबाजार राजबाड़ी की दुर्गापूजा का इतिहास 1757 के प्लासी युद्ध के बाद की घटनाओं से जुड़ा है। नवाब सिराजुद्दौला की हार के बाद अंग्रेजों ने विजय समारोह आयोजित करने की योजना बनाई। इस आयोजन की जिम्मेदारी राजा नवकृष्ण देव को मिली।
इसी क्रम में शोभाबाजार राजबाड़ी में ठाकुरदालान बना और दुर्गापूजा की शुरुआत हुई। समारोह में नृत्य-संगीत के साथ अंग्रेज अधिकारियों और विशिष्ट अतिथियों के लिए भोज की व्यवस्था भी होती थी।
राजा नवकृष्ण देव की संतान नहीं थी। 1768 में उन्होंने अपने बड़े भाई के पुत्र गोपीमोहन को गोद लिया। इसके 13 वर्ष बाद उनकी पांचवीं रानी ने पुत्र राजकृष्ण को जन्म दिया।
परिवार की परंपरा के अनुसार, ज्योतिषियों ने राजकुमार के लिए उत्तर दिशा का घर अनुकूल नहीं बताया। इसके बाद नवकृष्ण देव ने दक्षिण दिशा में छह-मंजिला मकान बनवाया।
नवकृष्ण देव ने पहले उत्तर दिशा वाले घर में दुर्गापूजा शुरू की थी। बाद में 1790 में दक्षिण दिशा वाले घर में भी पूजा आरंभ हुई। उसी वर्ष संपत्ति का बंटवारा गोपीमोहन और राजकृष्ण के बीच हुआ।
इसके बाद दोनों घरों में अलग-अलग पूजा होने लगी। उत्तर वाले घर की पूजा गोपीमोहन के पुत्र राधाकांत देव के परिवार से और दक्षिण वाले घर की पूजा राजकृष्ण देव के परिवार से जुड़ी।
दोनों राजबाड़ियों की पूजा में खास अंतर
- राधाकांत देव के घर में रथयात्रा और राजकृष्ण देव के घर में उलटोरथ के दिन ढांचे की पूजा के साथ प्रतिमा निर्माण शुरू होता है।
- दोनों घरों में डाकेर साज वाली एकचाला प्रतिमा स्थापित होती है।
- राधाकांत देव के घर की प्रतिमा में सिंह सफेद रंग का और घोड़े जैसे मुख वाला होता है, जिसे नरसिंह कहा जाता है। महिषासुर का रंग हरा होता है।
- राजकृष्ण देव के घर में सिंह का रंग स्टील जैसा और महिषासुर का रंग हरा होता है।
- दुर्गानवमी से पहले वाली नवमी पर बोधन होता है।
- सप्तमी की सुबह नवपत्रिका को चांदी की छतरी के साथ बागबाजार घाट पर स्नान कराने ले जाया जाता है।
- संधि पूजा आज भी पारंपरिक विधि से होती है और दशमी की सुबह दर्पण विसर्जन किया जाता है।
जलसे की परंपरा से जुड़ी जनश्रुति
लोकप्रचलित मान्यता के अनुसार, शोभाबाजार राजबाड़ी में दुर्गापूजा के दौरान बाईजी नृत्य की शुरुआत हुई थी।
कहा जाता है कि यहां लगातार 15 दिनों तक नृत्य-संगीत की महफिलें सजती थीं और अंग्रेज अधिकारी भी उनमें शामिल होते थे। इसी परंपरा से यह कहावत जुड़ी कि मां दुर्गा शोभाबाजार राजबाड़ी में रातभर जलसा देखती हैं।
तीन परिवार, तीन परंपराएं और बंगाल की साझा सांस्कृतिक विरासत
जोड़ासांको के दां परिवार का शृंगार, कुमोरटुली के मित्र परिवार का भोग और शोभाबाजार राजबाड़ी का नृत्य-संगीत—इन तीनों परंपराओं ने कोलकाता की दुर्गापूजा को एक विशिष्ट पहचान दी है।
भव्यता का स्वरूप भले समय के साथ बदला हो, लेकिन इन परिवारों की पूजा में इतिहास, लोकविश्वास और पारिवारिक परंपरा आज भी साथ-साथ दिखाई देते हैं।
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