कोलकाता। पश्चिम बंगाल सरकार की नियुक्ति प्रक्रिया में हो रही देरी के खिलाफ शुक्रवार को विकास भवन के बाहर एक बड़ा और भावनात्मक विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। प्रदर्शनकारी कोई आम समूह नहीं, बल्कि वे आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, जो पदोन्नत होकर सुपरवाइजर बनने का सपना पिछले दो दशक से संजोए हुए हैं।
दरअसल, राज्य की महिला एवं बाल विकास और समाज कल्याण विभाग द्वारा आयोजित सुपरवाइजर पद की नियुक्ति प्रक्रिया बीते 21 वर्षों के लंबे इंतज़ार और सार्वजनिक सेवा आयोग (PSC) द्वारा कराई गई परीक्षा के बाद शुरू हुई थी।
इस परीक्षा में 1152 अभ्यर्थी सफल घोषित हुए, लेकिन सफलता के 6 वर्ष बाद भी केवल 409 लोगों को ही नियुक्ति पत्र जारी किए गए हैं।
शेष 730 से अधिक सफल उम्मीदवार अब भी अनिश्चितता और उपेक्षा का शिकार हैं। विडंबना यह है कि केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत पदों और कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद नियुक्ति की प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है।
- “कितनी और परीक्षा देंगे हम?”
प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों का कहना है कि विभाग की उदासीनता ने उन्हें सड़क पर उतरने को मजबूर कर दिया है। उन्होंने विकास भवन के मुख्य गेट पर डेरा डालते हुए दो टूक कहा कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन और अनशन का रास्ता अपनाने को बाध्य होंगे।
- कोर्ट के आदेश, फिर भी निष्क्रियता
अभ्यर्थियों का दावा है कि कोर्ट की सिंगल बेंच और डिवीजन बेंच दोनों यह स्पष्ट कर चुके हैं कि चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति में देरी नहीं होनी चाहिए। इसके बावजूद विभाग की ओर से कोई ठोस पहल नहीं की गई।
1713 पदों में से कई रिक्तियां अब भी खाली हैं, जबकि नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे उम्मीदवार हर दिन आर्थिक, मानसिक और सामाजिक तनाव का सामना कर रहे हैं।
- सवालों के घेरे में विभाग की कार्यशैली
अभ्यर्थियों और सामाजिक संगठनों ने विभाग की इस निष्क्रियता को संवेदनहीनता करार दिया है। उनका कहना है कि जो महिलाएं वर्षों से बच्चों के पोषण, शिक्षा और देखरेख में अपनी सेवाएं दे रही हैं, उन्हें जब उनकी योग्यता का सम्मान नहीं मिलता, तो यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक नैतिक चूक भी है।
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