वाराणसी। पितृ तर्पण की सरल विधि में दक्षिण दिशा में मुख करके, हाथों में जल, तिल, और कुश लेकर पितरों का स्मरण करते हुए, “ॐ पितृभ्यः नमः” मंत्र बोलकर या उनका नाम लेकर, तीन बार अंजलि से जल अर्पित करना चाहिए। जल में काले तिल और गंगाजल मिला सकते हैं। तर्पण के बाद पितरों के प्रिय भोजन या सामग्री का दान करना चाहिए और क्षमता अनुसार दान-पुण्य करना चाहिए।
तर्पण की सरल विधि
1) तैयारी : तर्पण के लिए तांबे या पीतल का पात्र लें। इसमें गंगाजल, काले तिल, जौं (जौ), चावल और सफेद फूल डालें।
2) आसन ग्रहण : तर्पण करने के लिए कुशा के आसन पर बैठें।
3) दिशा : दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें।
4) मंत्र जाप और स्मरण : अपने पितरों का स्मरण करें और “ॐ पितृभ्यः नमः” मंत्र का जाप करें।
5) जल अर्पित करना : हाथों में कुश (एक प्रकार की घास) रखकर, सीधे हाथ के अंगूठे के पास से पितृ तीर्थ (अंगूठे और तर्जनी के बीच का भाग) से जल अर्पित करें।
6) नाम और मंत्र : पितरों का नाम लेकर तीन बार जल अर्पित करें और हर बार “इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः” या “ॐ तर्पयामि” मंत्र बोलें।

7) तर्पण की विधि : अपने पिता, दादा और परदादा के लिए अलग-अलग जल अर्पित करें, उसके बाद अन्य दिवंगत सदस्यों जैसे माता, दादी, परदादी के लिए भी जल अर्पित करें।
8) समापन : तर्पण के बाद अपनी क्षमता के अनुसार ब्राह्मण या गरीबों को भोजन कराएं या अन्न दान करें।
कुछ महत्वपूर्ण बातें :-
समय : पितरों के लिए तर्पण का सबसे उत्तम समय दोपहर का कुतुप काल (सुबह 11:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक) माना जाता है। यह जानकारी भारत के लिए है।
दान : तर्पण के बाद पितरों को उनकी पसंद का भोजन चढ़ाना चाहिए और क्षमता अनुसार दान करना चाहिए।
पवित्रता : तर्पण के समय तामसिक (मांस, मंदिरा आदि) चीजों से पूरी तरह दूरी बनानी चाहिए।

ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848
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