1927 में शुरू हुई पूजा इस वर्ष 100वें साल में; ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष और उपन्यास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को कला के जरिए दिखाने की तैयारी
कोलकाता हिन्दी न्यूज | 01 अक्टूबर 2026: कोलकाता की दुर्गापूजा में इस बार भक्ति, साहित्य और इतिहास का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। खिदिरपुर सार्वजनीन अपनी शताब्दी पूजा को साहित्य सम्राट बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के कालजयी उपन्यास ‘आनंदमठ’ को समर्पित कर रहा है।
1927 में शुरू हुई यह पूजा इस वर्ष अपने सौवें वर्ष में प्रवेश कर रही है। शताब्दी को यादगार बनाने के लिए कलाकार अनिमेष दत्ता की परिकल्पना है—“शताब्दी भर जिसे पूजा, आनंदमठ में उसे जाना।”
‘आनंदमठ’ के जरिए मां दुर्गा के विविध रूपों की झलक
आयोजकों के मुताबिक, पंडाल की सजावट में ‘आनंदमठ’ के दृश्य, चित्र, प्रतीक और विचारों को जगह दी जाएगी। इनके माध्यम से मां दुर्गा के विभिन्न रूपों को प्रस्तुत करने की कोशिश होगी—शक्ति और सौंदर्य के साथ-साथ पीड़ा, संघर्ष और मातृभाव की अभिव्यक्ति भी देखने को मिलेगी।
पूजा परिसर को साहित्य, इतिहास, कला और भक्ति की एक दृश्य यात्रा के रूप में तैयार किया जा रहा है। दर्शक यहां केवल प्रतिमा-दर्शन ही नहीं, बल्कि बंगाल की साहित्यिक विरासत से जुड़ी एक कलात्मक प्रस्तुति का अनुभव भी कर सकेंगे।
‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पर इतिहास को याद करने की कोशिश
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास ‘आनंदमठ’ 1882 में प्रकाशित हुआ था। इसकी कथा 1770 के बंगाल के भीषण अकाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के दौर की पृष्ठभूमि से जुड़ी है।
उपन्यास में शामिल गीत ‘वंदे मातरम्’ आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशभक्ति और संघर्ष की प्रेरणा बना। बाद में इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता मिली।
इस वर्ष ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के संदर्भ में पूजा के माध्यम से उस ऐतिहासिक और साहित्यिक विरासत को भी स्मरण किया जाएगा।
शताब्दी पूजा को यादगार बनाने की तैयारी
आयोजकों का उद्देश्य केवल सौ वर्ष पूरे होने का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि साहित्य और कला के माध्यम से दुर्गा आराधना की परंपरा को नए रूप में प्रस्तुत करना है।
पंडाल के अलग-अलग हिस्सों में मां के विविध रूपों और ‘आनंदमठ’ से प्रेरित प्रसंगों को दर्शाने की तैयारी चल रही है।
पूजा की तैयारियां तेजी से जारी हैं। खिदिरपुर सार्वजनीन की यह शताब्दी पूजा दर्शकों को दुर्गोत्सव के साथ बंगाल की साहित्यिक और सांस्कृतिक स्मृतियों से जोड़ने का प्रयास करेगी।
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