तारकेश कुमार ओझा, खड़गपुर। सार्वजनिक पूजा के अवसर पर पंडाल बनाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। पहले के समय में गांव मोहल्ले के लड़के और युवक मिलकर पूजा के लिए सादे धागे या जूट के धागे से पंडाल बनाते थे, जिसमें वे रात भर काम करते थे।
किसे पता था कि उस समय के सादे पंडाल आज के थीम पंडाल के अग्रदूत बनेंगे, जो आगे चलकर बंगाल के कलाकारों के हाथों में पड़कर एक नए कला रूप “कॉन्सेप्चुअल पंडाल आर्ट” का जन्म लेंगे।
खड़गपुर का अद्वितीय पंडाल : पश्चिम मेदिनीपुर जिला अंतर्गत खड़गपुर के तालबागीचा में इस वर्ष रथतला के रवींद्र संघ द्वारा प्रस्तुत पंडाल “कोलकाता चलिया छे नड़ी ते नड़ी ते” एक अनोखा और आकर्षक पंडाल है। इस पंडाल की मुख्य विशेषताओं में शामिल है।
चलती ट्राम : पंडाल में एक चलती ट्राम का मॉडल बनाया जा रहा है, जो दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करेगा।
हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे : कोलकाता की व्यस्त जीवनशैली को दर्शाने के लिए पंडाल में पांच हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे बनाए जा रहे हैं।
जीवंत कामकाजी दृश्य : पंडाल में कोलकाता के जीवंत कामकाजी दृश्यों को प्रदर्शित किया जाएगा, जो दर्शकों को शहर के जीवन की झलक दिखाएगा।
कलाकार की दृष्टि : इस पंडाल की समग्र योजना और निष्पादन कलाकार अशोक घोष द्वारा किया गया है, जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से कोलकाता के जीवन को पंडाल में जीवंत बनाने की कोशिश की है। पेशे से शिक्षक अशोक घोष कहते हैं यह पंडाल न केवल एक पूजा स्थल है, बल्कि एक कला का नमूना भी है,
जो दर्शकों को आकर्षित करेगा और उन्हें कोलकाता के जीवन की विविधता से परिचित कराएगा। उन्होंने कहा कि अध्यापन के अलावा वे यह कार्य पेशेवर तरीके से करते हैं। इस पंडाल का बजट करीब 18 लाख रुपए है।
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