तारकेश कुमार ओझा, खड़गपुर : मृत्यु मनुष्य के लिए सदा-सर्वदा अवांछित व भयावह रही है लेकिन कभी-कभी कोई जिंदादिल इंसान इस अंदाज में दुनिया से चीरविदाई लेता है कि लोगों के मुंह से अनायास ही निकल पड़ता है- मौत हो तो ऐसी…! खड़गपुर के मलिंचा रोड निवासी 85 वर्षीय गुलाब चंद बोहरा ऐसे ही सौभाग्यशाली व्यक्तियों में शामिल हो चुके हैं। बोहरा अपने भरे पूरे परिवार के मुखिया तो थे ही, समूचा शहर मानो उनका परिवार था।

1981 में नासिक से आईं तीर्थ यात्रियों से भरी बस के दुर्घटनाग्रस्त होने की दर्दनाक घटना हो या शहर के किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत सुख-दुख का मामला, बोहरा साहब किसी की मदद से पीछे नहीं हटते थे। आजीवन सक्रिय जीवन जीने वाले बोहरा ने जैनियों के सबसे बड़े क्षमा पर्व के दिन पूरी जिंदादिली से संसार को अलविदा कहा। ना अस्पताल-चिकित्सा का चक्कर, न क्षोभ-पश्चाताप या दारुण कष्ट की पीड़ा।

क्षमा पर्व के दिन वो रोज की तरह सुबह उठे… अपनी पसंदीदा नई सफारी सूट पहनी, जैन मंदिर गए… पूजा अर्चना के बाद सभी से जाने अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा याचना की। घर लौटे तो मोबाइल पर रिश्तेदारों से लंबी बातें की और सभी से क्षमा याचना की। इसके बाद अपने बेटे से नाश्ता मांगा, नाश्ता करने के बाद प्लेट रखने के दौरान ही उनके प्राण पखेरू उड़ गए। परिजनों के लिए विश्वास करना मुश्किल था… लेकिन नियति के आगे सभी बेबस थे। उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हर किसी की जुबान पर बस यही वाक्य था – मौत हो तो ऐसी…!!

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