खड़गपुर ब्यूरो | 24 सितम्बर 2026: रेलनगरी खड़गपुर के खड़िदा बाजार इलाके में मित्र परिवार की दुर्गापूजा आज भी अपनी पुरानी परंपराओं और विरासत को पूरी तरह संजोए हुए है। आधुनिकता के दौर में जहां पूजा के स्वरूप में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है, वहीं इस परिवार की पूजा में करीब एक सदी पुरानी परंपराएं आज भी उसी तरह निभाई जाती हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, परिवार के दिवंगत जमींदार संतोष मित्र की पहल पर 1933 में घर के आंगन में मातृमंडप का निर्माण कराया गया था। इसके अगले वर्ष यानी 1934 में पहली बार दुर्गापूजा शुरू हुई। इस वर्ष यह पूजा अपने 93वें वर्ष में प्रवेश कर गई है।
1934 से एकचाला प्रतिमा की परंपरा
मित्र परिवार की दुर्गापूजा की सबसे खास बात इसकी प्रतिमा और उसके ढांचे की परंपरा है। पूजा की शुरुआत से ही यहां एकचाला प्रतिमा स्थापित की जाती रही है और आज भी उसी परंपरा का पालन किया जा रहा है।
इतना ही नहीं, जिस नीम की लकड़ी के ढांचे पर पहली बार प्रतिमा तैयार की गई थी, उसी ढांचे में आज तक पूजा होती आ रही है। परिवार के सदस्य और सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी स्वपन मित्र के मुताबिक, इस ढांचे को उस दौर में पुरी की रथयात्रा के रथ बनाने वाले कारीगरों ने तैयार किया था।
उन्होंने बताया कि उस समय नीम की लकड़ी से बिना रंग का यह ढांचा बनाया गया था। बाद के वर्षों में मामूली मरम्मत को छोड़कर इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया।
आधुनिकता से दूर, परंपरा के अनुसार पूरी पूजा
मित्र परिवार की पूजा में आधुनिकता का प्रभाव लगभग नहीं के बराबर है। पूजा की पूरी व्यवस्था पुराने रीति-रिवाज और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार ही होती है।
ढाक बजाने से लेकर पूजा-अर्चना और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों तक कई व्यवस्थाएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं। परिवार का कहना है कि शुरुआत से जिन लोगों और परिवारों की भूमिका इस पूजा से जुड़ी रही है, उनकी परंपरा को आज भी कायम रखा गया है।
खेमाशुली से पीढ़ियों से आते हैं ढाकी
पूजा में ढाक बजाने के लिए खड़गपुर ग्रामीण क्षेत्र के खेमाशुली से ढाकियों का दल आता है। बताया जाता है कि कालंदी परिवार के ढाकी पीढ़ियों से मित्र परिवार की पूजा में ढाक बजाते आ रहे हैं।
यानी ढाक की आवाज भी इस पूजा की पुरानी पहचान का हिस्सा बन चुकी है। पीढ़ी बदलती रही, लेकिन ढाकियों की यह परंपरा बनी रही।
इसी तरह पूजा के लिए पुरोहित भी मेदिनीपुर से पीढ़ियों से आते रहे हैं। इस तरह पूजा से जुड़े कई लोगों की भूमिका परिवार की तरह ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।
आदिवासी समुदाय के कंधों पर निकलती है प्रतिमा
मित्र परिवार की विसर्जन परंपरा भी बेहद खास है। दशमी के दिन प्रतिमा को आदिवासी समुदाय के लोग अपने कंधों पर लेकर शहर के एक हिस्से की परिक्रमा कराते हैं और इसके बाद खड़िदा मंदिरतला तालाब में विसर्जन किया जाता है।
परिवार के चौथी पीढ़ी के सदस्य स्वपन मित्र के अनुसार, खड़गपुर के लालडेंगा इलाके से आदिवासी समुदाय के लोगों का एक दल दशमी की सुबह परिवार के साथ पहुंचता है।
इनमें करीब 50 से 60 पुरुष प्रतिमा और उसके लकड़ी के ढांचे को कंधे पर उठाकर शहर के कुछ हिस्सों की परिक्रमा करते हैं। इसके बाद प्रतिमा को खड़िदा मंदिरतला तालाब में विसर्जित किया जाता है।
विसर्जन के बाद भी ढांचा रहता है पानी में
इस विसर्जन की एक और परंपरा है। परिवार के अनुसार, प्रतिमा के साथ लकड़ी का ढांचा भी तालाब में विसर्जित किया जाता है और वह पूरी रात पानी में रहता है।
इसके अगले दिन यानी एकादशी की सुबह आदिवासी समुदाय के वही लोग ढांचे को पानी से निकालकर वापस मित्र परिवार के घर पहुंचाते हैं। अगले वर्ष उसी पारंपरिक ढांचे का फिर इस्तेमाल किया जाता है।
परिवार के अनुसार, प्रतिमा को विसर्जित करते समय उसका मुख पानी की दिशा में रखा जाता है। स्वपन मित्र का दावा है कि प्रतिमा विसर्जन की यह विशेष परंपरा देश में कहीं और देखने को नहीं मिलती। हालांकि, यह परिवार की ओर से किया गया दावा है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
संधि पूजा के समय आतिशबाजी की परंपरा भी कायम
मित्र परिवार की दुर्गापूजा में संधि पूजा के ठीक पहले और बाद में आतिशबाजी करने की परंपरा भी आज तक जारी है।
परिवार के सदस्यों के लिए यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे पारिवारिक मिलन का भी अवसर है।
देश-विदेश से घर लौटते हैं रिश्तेदार
पूजा के दौरान मित्र परिवार के देश और विदेश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले रिश्तेदार अपने पुश्तैनी घर लौटते हैं। इस मौके पर परिवार के सदस्य एक साथ मिलकर पूजा में शामिल होते हैं।
पूजा के दिनों में परिवार के लोग एक साथ पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। इस तरह 93 वर्ष पुरानी दुर्गापूजा धार्मिक परंपरा के साथ-साथ परिवार को एक साथ जोड़ने वाली कड़ी भी बनी हुई है।
खड़गपुर के इस मित्र परिवार की पूजा की खासियत यही है कि समय बदलने के बावजूद पूजा का मूल स्वरूप नहीं बदला।
1934 में शुरू हुई एकचाला प्रतिमा, नीम की लकड़ी का पुराना ढांचा, पीढ़ियों से आते ढाकी और पुरोहित तथा आदिवासी समुदाय के कंधों पर निकलने वाली विसर्जन यात्रा—ये सभी परंपराएं आज भी इस पूजा को अपनी अलग पहचान देती हैं।
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