डिजिटल डेस्क | Kolkata : कभी खेतों में सड़ने वाला केले का तना आज केरल की ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का नया स्रोत बन गया है। इन महिलाओं ने केले के तने से प्राकृतिक फाइबर निकालकर इको-फ्रेंडली प्लेट्स बनाना शुरू किया है, जो अब पांच सितारा होटलों की शान बन रही हैं।
यह पहल न सिर्फ पर्यावरण को बचा रही है, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर भी बना रही है। केरल के अलप्पुझा और त्रिशूर जिलों की महिलाएं, मुख्य रूप से ‘कुदुंबश्री’ समूहों के माध्यम से, इस नवाचार की अगुआ हैं।
केले की फसल कटने के बाद बचे तने को पहले जला दिया जाता था या खेत में ही सड़ने दिया जाता था, जिससे मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती थी और प्रदूषण बढ़ता था। लेकिन अब यही ‘कचरा’ इन महिलाओं के लिए ‘बेस्ट’ बन गया है।

कैसे बनती हैं ये प्लेट्स?
- केले के तने से नरम फाइबर निकाला जाता है
- फाइबर को प्राकृतिक गोंद के साथ मिलाकर मशीनों से प्लेट का आकार दिया जाता है
- ये प्लेट्स:
- 100% बायोडिग्रेडेबल
- 90 दिनों में खाद में बदल जाती हैं
- गर्म खाने के लिए सुरक्षित
- प्लास्टिक और थर्माकोल का टिकाऊ विकल्प
‘महिलाएं केले के तने को काटकर उसमें से नरम फाइबर निकालती हैं। फिर इसे साफ करके, प्राकृतिक गोंद के साथ मिलाकर मशीनों से प्लेट्स का आकार देती हैं। ये प्लेट्स पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल हैं – इस्तेमाल के बाद 90 दिनों में खाद बन जाती हैं। प्लास्टिक या थर्माकोल की प्लेट्स के मुकाबले ये न सिर्फ सुरक्षित हैं, बल्कि गर्म खाने को भी सहन कर सकती हैं।
अलप्पुझा की राधा अम्मा, (जो इस यूनिट की प्रमुख हैं) बताती हैं -“पहले हमें मजदूरी के लिए बाहर जाना पड़ता था। अब घर बैठे ही हर महीने 8-10 हजार रुपये कमा लेती हूं ।”
बाजार तक का सफर
- शुरुआत: स्थानीय बाजार और शादियाँ
- अब:
- ताज, लीला, मारियट जैसे होटल
- कोच्चि, तिरुवनंतपुरम, कोझिकोड में बड़े पैमाने पर उपयोग
- अंतरराष्ट्रीय मांग:
- जर्मनी और दुबई से ऑर्डर
शुरुआत में ये प्लेट्स स्थानीय बाजारों और शादियों में बिकीं। लेकिन गुणवत्ता और पर्यावरण-अनुकूल होने की वजह से जल्द ही बड़े होटलों का ध्यान खींचा। आज कोच्चि, तिरुवनंतपुरम और कोझिकोड के पांच सितारा होटल जैसे ताज, लीला और मारियट इन प्लेट्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं।
कोच्चि के एक लग्जरी होटल के मैनेजर कहते हैं -“हमारे मेहमानों को प्लास्टिक से दूर रखना चाहते हैं। ये प्लेट्स न सिर्फ इको-फ्रेंडली हैं, बल्कि केरल की संस्कृति को भी दर्शाती हैं।”
सरकारी सहयोग और भविष्य
- ‘हरिता कर्म सेना’ और ‘कुदुंबश्री मिशन’ से
- मशीनरी
- ट्रेनिंग
- मार्केटिंग सपोर्ट
- 15 यूनिट्स में 200+ महिलाएं कार्यरत
- सर्कुलर इकोनॉमी और महिला सशक्तिकरण का मॉडल
केरल सरकार की ‘हरिता कर्म सेना’ और कुदुंबश्री मिशन ने इन यूनिट्स को मशीनरी, ट्रेनिंग और मार्केटिंग में मदद दी है। अब तक 200 से ज्यादा महिलाएं 15 यूनिट्स में काम कर रही हैं। विदेशी बाजारों में भी मांग बढ़ रही है – जर्मनी और दुबई से ऑर्डर आ चुके हैं।
संदेश साफ है
- कचरे से कमाई
- पर्यावरण संरक्षण
- स्थानीय से वैश्विक बाज़ार तक पहुंच
- केरल बना नवाचार और आत्मनिर्भरता का उदाहरण
यह कहानी सिर्फ कमाई की नहीं, बल्कि सर्कुलर इकोनॉमी की है। खेत का कचरा आज महिलाओं की ताकत बन गया है। पर्यावरण बच रहा है, आय बढ़ रही है, और केरल एक नया मॉडल दुनिया को दिखा रहा है।
यह केरल की ‘कुदुंबश्री’ (Kudumbashree) जैसी महिला स्व-सहायता समूहों की पहल का हिस्सा है, जो कृषि कचरे को संसाधन में बदलकर पर्यावरण संरक्षण और महिलाओं की आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा दे रही है।
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