स्पेशल स्टोरी डेस्क, कोलकाता हिन्दी न्यूज : पंजाब के ऐतिहासिक शहर कपूरथला की संकरी गलियों से गुजरते हुए भी आज उस दौर की चमक-दमक महसूस होती है, जब यहां के महाराजा जगतजीत सिंह (1872-1949) अपने अनोखे ठाठ-बाट के लिए पूरी दुनिया में मशहूर थे।
फ्रांस की वास्तुकला से प्रेरित उनके दरबार, यूरोपीय शैली के महल और सबसे खास – उनकी पगड़ी में जड़ा विश्व का सबसे बड़ा पुखराज (टोपाज) – ये सब कुछ ऐसा था कि दूर-दूर से राजे-रजवाड़े, अंग्रेज अफसर और आम लोग भी उनकी भोग-विलासिता देखने कपूरथला खिंचे चले आते थे।
पगड़ी पर दुनिया का सबसे बड़ा पुखराज?
इतिहासकार बताते हैं कि महाराजा की पगड़ी पर जड़ा पुखराज न सिर्फ आकार में विशाल था बल्कि उसकी चमक इतनी तीव्र थी कि दरबार में दूर से ही पहचाना जा सकता था। फ्रांसीसी और ब्रिटिश यात्रियों द्वारा लिखे गए संस्मरणों में इस पगड़ी का उल्लेख मिलता है।

इतिहासकार डॉ. ए.जे. एस. ग्रेवाल अपनी पुस्तक “Kapurthala: The Maharaja and His World” में लिखते हैं कि महाराजा के मुकुट और साफा शृंगार में अक्सर कीमती रत्नों का प्रदर्शन किया जाता था, जिनमें एक पुखराज ‘अत्यंत विशाल’ आकार का था।
इसकी चमक इतनी तेज थी कि सूरज की रोशनी में दूर से ही लोगों की नजर इस पर पड़ जाती थी। इतिहासकारों के अनुसार पगड़ी में इस पुखराज के अलावा लगभग 3,000 हीरे, मोती और अन्य कीमती रत्न जड़े हुए थे, जिनका कुल वजन सैकड़ों कैरेट था।
लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में रखे कुछ दस्तावेज और तस्वीरों में इस पगड़ी का जिक्र मिलता है। 1920 के दशक में जब महाराजा यूरोप के दौरे पर जाते थे, तो पेरिस और लंदन के अखबार उनकी “दुनिया की सबसे कीमती पगड़ी” को “The Million-Pound Turban” कहकर छापते थे।
3,000 हीरे-मोती—एक ‘चलता-फिरता आभामंडल’
महाराजा के दरबारी पोशाक को लेकर कई विदेशी अख़बारों में भी कवरेज मिलता रहा। 1920 के दशक में The Illustrated London News ने लिखा था कि जगजीत सिंह के शाही परिधान में 3,000 से अधिक हीरे और मोती, दुर्लभ बर्मा रूबी, पेरिस से मंगवाई गई रेशमी पोशाक और हाथ से कढ़े हुए दुपट्टे शामिल होते थे।
दरबारियों के अनुसार, जब महाराजा दरबार में प्रवेश करते थे तो उनकी पोशाक का आभामंडल “कक्ष को रोशन कर देता था।”
फ्रांस से प्रेरित “पंजाब का वर्साय”
महाराजा जगतजीत सिंह ने कपूरथला को “मिनी पेरिस” बनाने का सपना देखा था। उन्होंने फ्रांस के प्रसिद्ध वास्तुकार मॉन्सिएर मंट को बुलाकर जगतजीत पैलेस बनवाया, जिसकी डिजाइन वर्साय पैलेस से प्रेरित थी। उनके पास रोल्स-रॉयस, इसोटा-फ्रास्किनी और डेलेज जैसी दुर्लभ लग्जरी कारों का कलेक्शन था।
वे पेरिस के मशहूर ज्वैलर्स कार्टियर, बुशरॉन और वैन क्लीफ एंड आर्पेल्स से सीधे गहने मंगवाते थे। उनकी पत्नी महारानी अनीता डेलगाडो (स्पेनिश डांसर से बनी रानी) भी यूरोप की हाई-सोसायटी में फैशन आइकन मानी जाती थीं।
महाराजा जगजीत सिंह भारतीय रियासतों में उन चुनिंदा शासकों में थे जिनका यूरोपीय कलाओं, वास्तुकला और फैशन पर विशेष झुकाव था।
● ‘जगतजीत पैलेस’—कपूरथला में खड़ा फ्रांस का एक टुकड़ा
उनके द्वारा बनाया गया जगतजीत पैलेस फ्रांस के पेरिस स्थित पेटिट ट्रिआनॉन से प्रेरित है। फ्रांसीसी वास्तुकारों ने इसे डिजाइन किया था, और इसके अंदरूनी हिस्से पेरिस से आयातित झूमरों, फर्नीचर और पेंटिंग्स से सजाए गए।
उनकी यूरोप यात्राओं की कवरेज नियमित रूप से Le Figaro, Times of London और Paris Herald में मिलती है। वे अक्सर बेंटली और रोल्स-रॉयस कारों, फ्रांसीसी सिल्क, और इटली के खास दर्जी द्वारा तैयार कोट्स का उपयोग करते थे।
“नाड़ा खोलने वाला अफसर” — अफवाह या हकीकत?
कपूरथला रियासत से जुड़ी एक लोकप्रिय लोककथा है कि महाराजा जगजीत सिंह ने अपनी पोशाक (विशेषकर पायजामा) का नाड़ा खोलने व बांधने के लिए भी एक मुंशी या अफसर को नियुक्त कर रखा था।
हालांकि, इसे लेकर प्रमाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं मिलते। यह कथा पहली बार 1960-70 के दशक में कुछ पंजाबी लोक संस्मरणों और किस्सों में दर्ज हुई दिखती है।
इतिहासकार डॉ. मीनाक्षी जीत कहती हैं— “महाराजा अत्यंत विलासप्रिय थे, यह सत्य है। लेकिन ‘नाड़ा खोलने वाले अफसर’ वाली कहानी अधिकतर अतिशयोक्ति है। उनकी शाही सेवा में कई विशिष्ट पद अवश्य थे, पर यह दावा प्रमाणित नहीं है।”
कई स्थानीय बुजुर्ग इसे मनोरंजक प्रसंग के रूप में सुनाते हैं, न कि ऐतिहासिक तथ्य के रूप में।
- विलासिता के पीछे एक कला-प्रेमी शासक
जगजीत सिंह सिर्फ विलासिता के पर्याय नहीं थे। वे कला संरक्षक, शिक्षा-समर्थक और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में माहिर माने जाते थे। उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोले, नगर योजना पर काम किया और कपूरथला को ‘पंजाब का पेरिस’ कहलवाया।
अंतिम दिन और विरासत
1947 में भारत की आजादी के बाद जब रियासतें विलय हो रही थीं, तब भी महाराजा जगतजीत सिंह की संपत्ति का अनुमान लाखों पाउंड था। उनके निजी खजाने में शामिल वह ऐतिहासिक पुखराज आज भी कपूरथला राजघराने के पास माना जाता है,
हालांकि कई सालों से इसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं किया गया है। कुछ इतिहासकारों का दावा है कि यह रत्न अब स्विट्जरलैंड के किसी बैंक वॉल्ट में सुरक्षित है।
कपूरथला के वरिष्ठ इतिहासकार प्रो. सुखदेव सिंह सोहल कहते हैं, “महाराजा जगतजीत सिंह ने जिस तरह भारतीय परंपरा और यूरोपीय लग्जरी को मिलाया, वह अपने आप में अनोखा था। उनकी पगड़ी सिर्फ एक आभूषण नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक बयान थी।”
आज जब पंजाब के गांवों में लोग रियासतों के किस्से सुनाते हैं, तो सबसे पहले जगतजीत सिंह की उस चमकती पगड़ी की बात करते हैं – जिसकी चमक दूर से ही बता देती थी कि “महाराजा आ रहे हैं”।
इतिहास की शानो-शौकत और आज की यादें
आज कपूरथला में जगतजीत पैलेस, दरबार हॉल और फ्रांसीसी शैली के बगीचे उस दौर की झलक देते हैं जब महाराजा की हर गतिविधि समाचार बन जाती थी। उनकी पगड़ी पर जड़ा ‘सबसे बड़ा पुखराज’ चाहे मिथक हो या सत्य महाराजा जगजीत सिंह का शाही ठाठ आज भी भारतीय रियासतों के इतिहास में एक चमकदार अध्याय की तरह दर्ज है।
मुख्य स्रोत
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Illustrated London News archive (1922–1935)
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Dr. A.J.S. Grewal — Kapurthala: The Maharaja and His World
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Minakshi Jeet — Royal Punjab and Its Princes
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Punjab State Archives, Patiala (Kapurthala royal records)
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Times of India archive (1930s: Indian Princely States coverage)
मुख्य संदर्भ
- “The Magnificent Maharajas” by Amin Jaffer (V&A Publications)
- “Kapoor Singh of Kapurthala” by Sir Malcolm Darling (1932)
- “The Golden Book of India” by Sir Roper Lethbridge (1893)
- विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम, लंदन – जगतजीत सिंह की पगड़ी की पुरानी तस्वीरें
- “A Princess Remembers” by Maharani Gayatri Devi (समान युग की रियासतों का तुलनात्मक वर्णन)
- कपूरथला स्टेट आर्काइव्स (अब पंजाब स्टेट आर्काइव्स, पटियाला में उपलब्ध)
(यह स्टोरी ऐतिहासिक तथ्यों और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित है।) कोलकाता हिन्दी न्यूज, स्पेशल स्टोरी डेस्क : 1 दिसंबर 2025
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