अशोक वर्मा “हमदर्द” की परिवार को जोड़ने वाली एक अनोखी कहानी
कोलकाता। गाँव की सुबह हमेशा की तरह चहकते पंछियों की आवाज और आँगन में झाड़ू लगाती बाला की थाप से शुरू हुई। आज का दिन विशेष था, क्योंकि यह जिउतिया व्रत का दिन था। स्त्रियाँ अपने संतान की लंबी उम्र और मंगलमय जीवन की कामना के लिए यह उपवास करती हैं। बाला ने भी बड़े जतन से व्रत की तैयारी की थी।
बाला दो बच्चों की माँ थी – अनुराधा और अभिषेक। अनुराधा ब्याह कर अपने ससुराल जा चुकी थी। उसकी दो बेटियाँ थीं – सान्विका और प्रविषा। दामाद प्रत्यूष तो जैसे लाखों में एक थे – उच्च विचारों वाले, शांत, सौम्य और हर किसी के लिए प्रेरणा। अभिषेक अभी अविवाहित था, लेकिन उसकी ज़िंदगी में एक नई किरण आ चुकी थी – प्रांजल, जिसे प्यार से सब लोग पूजा भी बुलाते।

प्रांजल अभी ब्याह कर इस घर की बहू नहीं बनी थी, मगर बाला के दिल में उसके लिए वही ममता उमड़ती थी जो अपनी बेटी या बेटे के लिए उमड़ती है। प्रांजल रोज फोन पर बाला से बातें करती, छोटी-छोटी खुशियाँ और परेशानियाँ साझा करती और बाला भी जब तक उससे बातें न कर ले, दिन अधूरा महसूस करती। धीरे-धीरे दोनों का रिश्ता सिर्फ़ होने वाली सास-बहू का नहीं, बल्कि माँ-बेटी जैसा हो गया था।
आज जब बाला ने जिउतिया का व्रत रखा, तो उसने अनुराधा और अभिषेक के साथ-साथ प्रांजल के नाम का भी एक जिउतिया धारण किया। उसके गले में तीन धागे चमक रहे थे – एक बेटी के लिए, एक बेटे के लिए और एक बहू के लिए।
पड़ोसियों की फुसफुसाहट पूरे लोगों के कानों तक पहुंच चुकी थी कारण कि गाँव में बात छुपी नहीं रहती। किसी ने देखा कि बाला बहू के नाम का भी जिउतिया बाँध रही है। धीरे-धीरे खबर पूरे टोले में फैल गई।
“अरे, देखो तो बाला कैसी नयी रीति निकाल लाई है,” एक पड़ोसन ने हँसते हुए कहा।
“हाँ, बहू के नाम का भी व्रत रख रही है! बेटा-बेटी के लिए ठीक है, मगर बहू के लिए? ये कैसी नयी परंपरा है?” दूसरी ने ताना कसा।
“आजकल की औरतें ना जाने क्या-क्या करने लगी हैं। लोग हँसेंगे इन पर।”
लोगों की हँसी, ताने, फुसफुसाहट… सब कुछ बाला के कानों तक पहुँचा। मगर वह शांत रही। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि लोग क्या कहते हैं।
रात को जब वह आँगन में बैठी तो अभिषेक ने धीरे से पूछा, “अम्मा, लोग कह रहे थे कि आप बहू के नाम का भी जिउतिया बाँधी हैं। आपको कुछ बुरा तो नहीं कहा किसी ने?”
बाला ने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, लोग तो हर बात पर बोलते ही हैं। लेकिन सोचो, अगर जिउतिया का व्रत बेटे और बेटी के लिए हो सकता है, तो बहू के लिए क्यों नहीं? बहू क्या कम है? वह अपना घर-परिवार, माँ-बाप सब छोड़कर हमारे घर आती है। हमारे हर सुख-दुख में साथ देती है। क्या उसकी लंबी उम्र की कामना करना गलत है?”
अभिषेक चुप रहा। उसकी आँखें नम थीं। उसे लगा कि सचमुच, उसकी माँ का दिल कितना बड़ा है।
उधर प्रांजल को जब यह बात पता चली तो वह फोन पर ही रो पड़ी।
“अम्मा, आप सच में मेरे नाम का भी व्रत बाँधी हैं?” उसकी आवाज काँप रही थी।
“हाँ बेटी,” बाला ने सहजता से कहा, “क्योंकि तुम भी तो मेरी बेटी जैसी ही हो। आज तुम मेरे बेटे के जीवन का हिस्सा बनने जा रही हो। मैं तुम्हारी भी उतनी ही चिंता करती हूँ जितनी अनु और अभिषेक की।”
प्रांजल देर तक चुप रही। उसके आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
“अम्मा, मुझे कभी नहीं लगा था कि मुझे इतनी जल्दी ससुराल में अपनापन मिलेगा। आपने तो मुझे मेरे माँ-बाप से भी ज्यादा ममता दी है। अब मैं वादा करती हूँ कि इस घर की हर ख़ुशी और ग़म में आपके साथ रहूँगी।”
समाज की सोच बनाम बाला का निर्णय यह आत्म चिंतन के लायक था। अगले दिन कुछ औरतें बाला के घर आईं। “बहन, हम तो समझ नहीं पाए कि बहू के नाम का भी जिउतिया कैसे रख सकती हो?” एक ने पूछा।
बाला ने शांत स्वर में जवाब दिया, “बहनों, अगर बेटी को अपना समझकर उसके लिए व्रत रख सकती हूँ, तो बहू के लिए क्यों नहीं? बहू भी तो हमारी बेटी जैसी ही होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि बेटी जन्म से हमारी होती है और बहू विवाह से। मगर जब वह इस घर में आ जाती है, तो उसके हर दुःख-सुख का हिस्सा यही घर बनता है। क्या उसकी लंबी उम्र और सुख की दुआ माँगना गलत है?”
औरतें थोड़ी देर चुप रहीं। शायद उन्होंने पहली बार इस दृष्टि से सोचा था। रिश्तों का असली अर्थ ही है केवल और केवल एक दूसरे के भावना को समझना। दिन बीतते गए। अनुराधा भी जब मायके आई और यह सुना कि माँ ने बहन की तरह प्रांजल के लिए व्रत रखा है, तो उसकी आँखें चमक उठीं।
“माँ, आप तो सचमुच अद्भुत हैं। आपने हमें हमेशा सिखाया कि बहू और बेटी में भेद नहीं करना चाहिए। आज आप खुद उस शिक्षा की मिसाल बन गईं।”
बाला मुस्कुराई। “बेटी, रिश्तों की असली सुंदरता तभी है जब उनमें भेदभाव न हो। बहू भी तो बेटी जैसी है। अगर हम बहू को बेटी का स्थान देंगे तो घर में कभी कलह नहीं होगी। घर सुख-शांति से भरा रहेगा।”
धीरे-धीरे गाँव में यह बात फैल गई कि बाला ने बहू के लिए भी जिउतिया रखा था। पहले लोग हँसे, मगर बाद में सोचने लगे कि इसमें बुरा क्या है। बहू भी तो घर की बेटी जैसी है। अगर माँ उसकी लंबी उम्र की दुआ करे तो यह तो और भी शुभ है।
बाला का यह छोटा-सा कदम पूरे गाँव के लिए एक संदेश बन गया। अब कई औरतें कहने लगीं कि अगली बार वे भी बहू के लिए जिउतिया बाँधेंगी।
कुछ महीनों बाद प्रांजल विधिवत इस घर की बहू बनकर आई। घर में दीप जल उठे। बाला की आँखों में खुशी के आँसू थे। “आज मेरी मन्नत पूरी हुई,” उसने मन ही मन सोचा, “जिस बहू के लिए मैंने जिउतिया रखा था, वह आज सचमुच मेरी बेटी बनकर इस घर में आ गई।”
प्रांजल भी भावुक थी, उसने आकर बाला के पैर छुए और कहा,
“अम्मा, मैं सिर्फ़ आपकी बहू नहीं, आपकी बेटी हूँ। आपने मुझे अपने आंचल में पहले ही समेट लिया था। अब मैं इस घर को अपना घर मानकर हर जिम्मेदारी निभाऊँगी।”
बाला की कहानी यह सिखाती है कि रिश्तों की मजबूती खून के रिश्तों से नहीं, बल्कि दिल के अपनापन से होती है। जिउतिया का व्रत सिर्फ़ संतान के लिए ही नहीं, बल्कि उस बहू के लिए भी होना चाहिए, जो अपने परिवार का त्याग कर ससुराल आती है और पूरे मन से उसमें रम जाती है।
अगर हर माँ बाला की तरह अपनी बहू को बेटी का दर्जा दे, तो घरों में कभी दूरी या कलह न हो। बहू और बेटी में भेदभाव मिट जाए, और समाज में एक नई सोच पनपे कि व्रत और दुआएँ रिश्तों के बंधन को मजबूत करने का माध्यम हैं, चाहे वह संतान हो या बहू।
यह कहानी हमें यही सिखाती है कि प्यार और अपनापन ही असली परंपरा है। रीति-रिवाज तभी सार्थक हैं जब उनमें मानवता और समानता झलके।

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