Jhumri telaiya radio

“अगली फरमाइश है झुमरी तलैया से: रेडियो सीलोन ने कैसे एक कस्बे को दी वैश्विक पहचान ”

झुमरी तलैया (झारखंड) | 23 दिसंबर 2025 : ‘‘अगली फरमाइश है झुमरी तलैया से’’— कभी ये शब्द सिर्फ एक उद्घोषणा नहीं, बल्कि पूरे देश में रेडियो प्रेमियों के लिए उत्सुकता और रोमांच का प्रतीक हुआ करते थे।

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रेडियो सीलोन और बाद में आकाशवाणी के विविध भारती से जब भी यह वाक्य गूंजता, झुमरी तलैया का नाम देशभर के घरों तक पहुंच जाता था।

प्रकृति की गोद में, एक शांत झील के किनारे बसा झुमरी तलैया आज भले ही एक छोटा सा कस्बा लगे, लेकिन 1950 और 60 के दशक में यह रेडियो की दुनिया का सबसे चर्चित नाम बन चुका था।

अभ्रक से संगीत तक का सफर

झुमरी तलैया की कहानी 1890 में शुरू होती है, जब अंग्रेजों ने यहां अभ्रक (माइका) के विशाल भंडार की खोज की। देखते ही देखते यह इलाका एक समृद्ध खनन क्षेत्र बन गया। आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ यहां संगीत और रेडियो सुनने की संस्कृति भी पनपने लगी।

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1950 के दशक में जब रेडियो सीलोन और ऑल इंडिया रेडियो के कार्यक्रमों में यहां से लगातार गानों की फरमाइशें पहुंचने लगीं, तो झुमरी तलैया राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा बन गया।

रेडियो सीलोन के 100 साल और पुरानी यादें

इस हफ्ते रेडियो सीलोन ने अपने 100 साल पूरे किए, और इसके साथ ही झुमरी तलैया की वो यादें फिर ताजा हो गईं, जिसे आज भी कई लोग प्यार से ‘रेडियो सीलोन’ वाला शहर कहते हैं।

रेडियो सीलोन वही प्रसारणकर्ता था, जिसने बिनाका गीतमाला जैसे ऐतिहासिक कार्यक्रम को जन्म दिया। अमीन सयानी की आवाज़ में जब कहा जाता—
“अगली फरमाइश है झुमरी तलैया से” तो यह शहर देश के रेडियो मानचित्र पर फिर से चमक उठता था।

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संगीत प्रेम की जड़ें

1991 बैच के भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी राजीव रंजन बताते हैं कि झुमरी तलैया का संगीत प्रेम सीधे उसके आर्थिक इतिहास से जुड़ा था।

उनके अनुसार, अभ्रक कारोबारी चट्टू राम भदानी और होरिल राम भदानी जैसे व्यापारियों ने न सिर्फ खनन को बढ़ावा दिया, बल्कि संगीत को भी शहर की पहचान बना दिया।

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मुंबई से सुरैया जैसी मशहूर गायिका को झुमरी तलैया में कॉन्सर्ट के लिए बुलाया गया। वहीं 1971 में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का कार्यक्रम आज भी लोगों की यादों में जिंदा है।

पोस्टकार्ड से बना रेडियो इतिहास

रेडियो दीवानगी की एक दिलचस्प कहानी भी है। अभ्रक व्यापारी रामेश्वर प्रसाद बर्णवाल रोज़ाना रेडियो सीलोन को पोस्टकार्ड भेजकर गानों की फरमाइश करते थे। लगातार नाम लिए जाने से बाकी लोग भी प्रेरित हुए और जल्द ही पूरा शहर पोस्टकार्ड भेजने की होड़ में शामिल हो गया।

स्थिति यह हो गई कि

  • अनौपचारिक रेडियो श्रोता क्लब बनने लगे
  • लोग शर्त लगाते कि किसका नाम कब ऑन-एयर होगा
  • आकाशवाणी को झुमरी तलैया के लिए मानक पोस्टकार्ड फॉर्मेट तक छपवाने पड़े

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हॉस्टल में छिपकर सुनी जाती थी गीतमाला

संयुक्त राष्ट्र से जुड़े डॉक्टर दीपक कुमार याद करते हैं कि सैनिक स्कूल तिलैया के हॉस्टल में रेडियो प्रतिबंधित थे। लेकिन बिनाका गीतमाला सुनने का जुनून ऐसा था कि छात्र स्टाफ क्वार्टर से आती आवाज़ों के सहारे गाने सुनते थे।

रेडियो से बनी पहचान

सैनिक स्कूल तिलैया पूर्व छात्र संगठन के अध्यक्ष आशीष सिन्हा कहते हैं, “झुमरी तलैया की पहचान रेडियो से है। यह नाम सिर्फ एक जगह नहीं, एक दौर की याद है।”

Jhumri Telaiya ruled India’s radio waves

1952 से 1988 तक रेडियो सीलोन पर और बाद में 1994 तक विविध भारती पर प्रसारित बिनाका गीतमाला, झुमरी तलैया को हमेशा के लिए भारतीय रेडियो इतिहास में दर्ज कर गई।

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