आतारकेश कुमार ओझा, खड़गपुर। झाड़ग्राम की धरती पर कुछ दिन पहले एक ऐसी घटना घटित हुई जिसने इंसानियत को झqकझोर दिया, लेकिन उसी धरती पर जन्मी एक नन्ही परी ने जीवन के रणभूमि में चमत्कारिक विजय प्राप्त कर यह संदेश दिया कि आशा कभी नहीं मरती। 1 नवंबर की वह भयावह सुबह, जब बेलियाबेड़ा थाने के तालग्राम गाँव से दिल दहला देने वाली खबर आई।
सिर्फ इसलिए कि वह एक बेटी थी, आठ दिन की मासूम को दूध में जहर मिलाकर मारने की कोशिश की गई। विडंबना यह कि ऐसा करनेवाली उसकी अपनी दादी थी।
उस नन्ही कली का अपराध बस इतना था कि वह स्त्री रूप में जन्मी थी। मृत्यु से जूझती उस मासूम को पहले गोपीबल्लभपुर सुपर स्पेशलिटी अस्पताल और फिर झाड़ग्राम मेडिकल कॉलेज लाया गया।

डॉक्टरों ने दिन-रात एक कर दिया और वह नवजीवन पाने के लिए लड़ी। एक ऐसी लघु अर्धरात्रि की योद्धा बनकर जिसने दुनिया को दिखा दिया कि जीवन-शक्ति किसी विष से बड़ी होती है। ग्यारह लंबे दिनों की संघर्षमयी रातों के बाद जब उस नन्ही परी ने मुस्कुराकर आँखें खोलीं, तो मानो समूचे झाड़ग्राम ने चैन की साँस ली।
जीवन की इस विजय पर पुलिस ने भी मानवता की मिसाल पेश की बेलियाबेड़ा थाने की ओर से उस बालिका और उसके परिवार को नए वस्त्र व बेबी फ़ूड भेंट किया गया। झाड़ग्राम जिला पुलिस ने उसे शुभकामनाओं के सागर से नहलाया कि वह बड़ी होकर उजाला बन सके।
उस अंधेरे सोच को मिटा दे जो स्त्री-जीवन से घृणा करती है। इस करुण कथा के अंत में मानवता फिर से मुस्कुराई और गाँव के लोगों ने कहा कि “यह बच्ची सिर्फ अपने परिवार की नहीं, हमारे समाज की जीत है।”
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