खड़गपुर ब्यूरो | 27 जुलाई 2026: सपने बड़े हों तो आर्थिक तंगी भी रास्ते की सबसे बड़ी दीवार नहीं बन सकती। पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम जिले के बेलपहाड़ी ब्लॉक के सुदूर जाड़दा गांव के 25 वर्षीय देवकुमार सिंह ने अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से इसे सच कर दिखाया है।
देवकुमार के पिता लक्ष्मीकांत सिंह गांव-गांव घूमकर एल्युमिनियम के बर्तन बेचते हैं। इसी सीमित आमदनी से उन्होंने अपने परिवार का पालन-पोषण करने के साथ तीनों बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी उठाया। अब उनके बेटे देवकुमार ने IIT खड़गपुर के Centre for Rural Development and Innovative Sustainable Technology (CRDIST) में शोध के लिए जगह हासिल की है।
देवकुमार की इस उपलब्धि से उनके परिवार के साथ-साथ जाड़दा गांव और पूरे बेलपहाड़ी इलाके में खुशी का माहौल है।
आर्थिक तंगी के बीच पिता ने नहीं रोकी बच्चों की पढ़ाई
देवकुमार सिंह के पिता लक्ष्मीकांत सिंह लंबे समय से गांव-गांव घूमकर एल्युमिनियम के बर्तन बेचते हैं। आमदनी सीमित है, लेकिन बच्चों की शिक्षा को लेकर उनका संकल्प कभी कमजोर नहीं पड़ा।
इसी मेहनत के बल पर उन्होंने अपने तीनों बच्चों की पढ़ाई जारी रखी। बड़ी बेटी का विवाह हो चुका है। वहीं देवकुमार के छोटे भाई प्रद्यूत कुमार सिंह ने पिछले वर्ष मेदिनीपुर मेडिकल कॉलेज में MBBS पाठ्यक्रम में दाखिला लिया।
एक साधारण परिवार के लिए एक साथ बच्चों की उच्च शिक्षा का खर्च उठाना आसान नहीं था, लेकिन लक्ष्मीकांत सिंह ने आर्थिक चुनौतियों के बावजूद बच्चों के सपनों को आगे बढ़ने का अवसर दिया।
सरकारी स्कूल से IIT खड़गपुर तक का सफर
देवकुमार की प्रारंभिक शिक्षा जाड़दा प्राथमिक विद्यालय से हुई। इसके बाद उन्होंने मुरारी एससी उच्च माध्यमिक विद्यालय में दाखिला लिया।
वर्ष 2019 में उन्होंने उच्च माध्यमिक परीक्षा पास की। इसके बाद उन्होंने हल्दिया गवर्नमेंट कॉलेज से भूगोल विषय में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। आगे उन्होंने कोलकाता की अलिया विश्वविद्यालय से भूगोल में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की।
इसके बाद UGC-NET-JRF परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन ने उनके लिए शोध की राह खोली और आखिरकार उन्हें IIT खड़गपुर में शोध करने का अवसर मिला।
ग्रामीण विकास में विज्ञान और तकनीक के इस्तेमाल पर करेंगे शोध
देवकुमार को IIT खड़गपुर के CRDIST में शोध का अवसर मिला है। उनके शोध का प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण समाज के विकास में विज्ञान और तकनीक के प्रभावी इस्तेमाल की संभावनाओं को समझना और उन पर काम करना है।
यह विषय उनके अपने सामाजिक और ग्रामीण परिवेश से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। ग्रामीण क्षेत्र में पले-बढ़े देवकुमार ने बेहद करीब से गांवों की चुनौतियों को देखा है। ऐसे में उनका शोध ग्रामीण जीवन की वास्तविक समस्याओं के समाधान में विज्ञान और तकनीक की भूमिका तलाशने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है।
शिक्षक ने जगाई भूगोल के प्रति रुचि
देवकुमार अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता के साथ-साथ अपने शिक्षकों को भी देते हैं। खास तौर पर वे मुरारी एससी उच्च माध्यमिक विद्यालय के भूगोल शिक्षक अचिन्त्य सरकार के योगदान को महत्वपूर्ण मानते हैं।
देवकुमार के मुताबिक, कक्षा 11वीं और 12वीं में अचिन्त्य सरकार के पढ़ाने के तरीके ने उनके भीतर भूगोल के प्रति गहरी रुचि पैदा की। उसी समय उन्होंने तय कर लिया था कि वे आगे की पढ़ाई और शोध भी इसी विषय में करेंगे।
बाद में UGC-NET-JRF में सफलता हासिल करना उनके इसी सपने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना।
‘IIT खड़गपुर में शोध का अवसर मिलना सपने जैसा’
देवकुमार ने अपनी सफलता के पीछे माता-पिता के त्याग, शिक्षकों के मार्गदर्शन और परिवार के सहयोग को सबसे महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने कहा कि UGC-NET-JRF में अच्छे परिणाम के बाद IIT खड़गपुर में शोध का अवसर मिलना उनके लिए सपने के सच होने जैसा है। उनके मुताबिक, माता-पिता के त्याग और शिक्षकों के प्रोत्साहन के बिना वह इस मुकाम तक नहीं पहुंच सकते थे।
माता-पिता के चेहरे पर आई मुस्कान
देवकुमार के लिए 23 जुलाई का दिन बेहद खास रहा। इसी दिन वे अपने माता-पिता लक्ष्मीकांत सिंह और रीना सिंह के साथ IIT खड़गपुर पहुंचे और दाखिले की प्रक्रिया पूरी की।
उस दिन को याद करते हुए देवकुमार ने कहा कि दाखिले की प्रक्रिया पूरी होने के बाद माता-पिता के चेहरे पर आई मुस्कान ही उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
जिस पिता ने वर्षों तक गांव-गांव घूमकर बर्तन बेचकर परिवार चलाया, उसी पिता के बेटे का देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान में शोध के लिए चयन होना निश्चित रूप से पूरे परिवार के लिए गौरव का क्षण है।
देवकुमार की कहानी देती है बड़ा संदेश
देवकुमार सिंह की कहानी केवल एक छात्र के IIT खड़गपुर पहुंचने की कहानी नहीं है। यह उस परिवार की कहानी है जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षा को प्राथमिकता दी, उस शिक्षक की कहानी है जिसने एक छात्र के भीतर विषय के प्रति जिज्ञासा पैदा की और उस युवा की कहानी है जिसने आर्थिक कठिनाइयों को अपनी मंजिल के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया।
अब देवकुमार की नजर ग्रामीण भारत की समस्याओं पर वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टिकोण से शोध करने पर है। जाड़दा गांव से IIT खड़गपुर तक का उनका सफर आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश देता है कि संसाधनों की कमी सपनों को छोटा नहीं करती, अगर मेहनत, परिवार का साथ और सही मार्गदर्शन साथ हो।
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