जकार्ता | 1962 — भारतीय फुटबॉल इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय तब लिखा गया जब जरनैल सिंह ढिल्लों, जो आमतौर पर एक सेंटर-बैक डिफेंडर थे, ने 1962 के एशियन गेम्स के फाइनल में स्ट्राइकर की भूमिका निभाई और भारत को गोल्ड मेडल दिलाया।
🩹 चोट के बावजूद मैदान में उतरे
- सेमीफाइनल मुकाबले में सिर पर छह टांके लगे थे, लेकिन जरनैल सिंह ने हेलमेट पहनकर फाइनल में खेलने का फैसला किया
- उन्होंने इंडोनेशिया के विरोधी माहौल और दर्शकों के दबाव के बीच अग्रिम पंक्ति में खेलते हुए गोल दागा
- यह गोल भारत को दक्षिण कोरिया के खिलाफ 2-1 की जीत दिलाने में निर्णायक साबित हुआ
जरनैल सिंह को दुनिया एशिया के सर्वश्रेष्ठ डिफेंडरों में से एक मानती थी, लेकिन वह फाइनल में एक डिफेंडर के रूप में नहीं, बल्कि एक स्ट्राइकर के रूप में खेल रहे थे क्योंकि सेमीफाइनल में वियतनाम के खिलाफ खेलते समय उनके सिर में गंभीर चोट लगी थी, जिस पर छह टांके लगे थे।
डॉक्टरों ने उन्हें खेलने से मना कर दिया था, लेकिन कोच एसए रहीम ने एक साहसी दांव खेला। रहीम साहब जानते थे कि जरनैल अपनी निडरता और हेडर की ताकत के कारण अटैक में भी मूल्यवान हो सकते हैं, बशर्ते उन्हें दौड़-भाग कम करनी पड़े।

🇮🇳 भारत की ऐतिहासिक जीत
- 1962 एशियन गेम्स में भारत ने फुटबॉल में स्वर्ण पदक जीता
- यह भारत की फुटबॉल टीम का दूसरा एशियन गेम्स गोल्ड था (पहला 1951 में)
- टीम में शामिल थे पी.के. बनर्जी, तुलसीदास बलराम, चुनि गोस्वामी, और कप्तान ज्योति बसु
फिर, वह जादुई क्षण आया। जब मैच निर्णायक मोड़ पर था, तब जरनैल सिंह ने अपने सिर पर बंधी पट्टी के बावजूद, अपने शानदार हेडर से गेंद को नेट में डाल दिया। यह गोल सिर्फ एक अंक नहीं था। यह दृढ़ संकल्प की विजय थी। भारत ने 2-1 से वह फाइनल मुकाबला जीता और स्वर्ण पदक हासिल किया।
जरनैल सिंह, जो अपनी रक्षात्मक क्षमता के लिए जाने जाते थे, उस दिन स्ट्राइकर के हीरो बनकर उभरे। इस अदम्य साहस और अतुलनीय प्रदर्शन ने उन्हें भारतीय फुटबॉल का ‘शेर’ बना दिया।
🏅 जरनैल सिंह का योगदान
- जरनैल सिंह ढिल्लों ने न सिर्फ गोल किया, बल्कि टीम को प्रेरित किया
- बाद में वे 1965–67 तक भारतीय टीम के कप्तान भी रहे
- उन्हें अर्जुन पुरस्कार और मोहन बागान रत्न से सम्मानित किया गया
कोलकाता फुटबॉल, जिसे ‘मैदान’ के नाम से जाना जाता है, जरनैल सिंह के लिए कर्मभूमि बन गया। उनकी ताकत, समय पर टैकल करने की कला और शारीरिक कौशल ने उन्हें देखते ही देखते क्लब का सितारा बना दिया। वह मोहन बागान की रक्षापंक्ति की एक ऐसी ‘लौह दीवार’ बन गए, जिसे पार करना विरोधी स्ट्राइकरों के लिए लगभग असंभव था। पश्चिम बंगाल के फुटबॉल प्रेमियों ने उन्हें प्यार से ‘लायन’ (शेर) कहना शुरू कर दिया।
1960 के रोम ओलंपिक में जरनैल सिंह ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छाप छोड़ी। भारत भले ही उस टूर्नामेंट में ज्यादा सफल न हो पाया हो, लेकिन जरनैल सिंह का प्रदर्शन इतना शानदार था कि उन्हें उस समय के ‘वर्ल्ड इलेवन’ में शामिल करने पर विचार किया गया था और उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्टॉपर बैक में से एक माना गया।
वह भारतीय फ़ुटबॉल के ‘स्वर्णिम युग’ (1950 और 1960 का दशक) के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ थे। वह न केवल एक बेहतरीन खिलाड़ी थे, बल्कि एक शानदार कप्तान भी थे। 1964 में, भारत ने एशियन कप में उपविजेता (रनर-अप) का स्थान हासिल किया। इस टूर्नामेंट में जरनैल सिंह ने रक्षापंक्ति का नेतृत्व किया और अपनी कप्तानी से टीम को प्रेरित किया।
1965 से 1967 तक, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम की कप्तानी की और चुन्नी गोस्वामी जैसे दिग्गजों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खेले।
उनकी प्रतिभा का सबसे बड़ा सम्मान तब हुआ, जब उन्हें लगातार दो वर्षों (1966 और 1967) के लिए एशियाई ऑल-स्टार फुटबॉल टीम का कप्तान चुना गया। वह यह सम्मान पाने वाले एकमात्र भारतीय खिलाड़ी हैं। उनके करियर की उपलब्धियों को देखते हुए, भारत सरकार ने 1964 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया।
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