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जन्माष्टमी का व्रत आज

वाराणसी। जन्माष्टमी का त्योहार भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। मान्यता है कि इस भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप की विधि-विधान से पूजन करने और व्रत रखने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस बार भगवान कृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा।

मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को हुआ था। इस शुभ अवसर पर भक्त विधि-विधान से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करते हैं और निशिता काल में जन्मोत्सव का आनंद उठाते हैं। इस दिन भगवान आधी रात को श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की विधि-विधान से पूजा करके कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता है।

पूजा का शुभ मुहूर्त :-
निशिता काल (मध्यरात्रि) पूजा का समय: रात 11:57 बजे से देर रात 12:43 बजे तक (4 सितंबर की रात)
अष्टमी तिथि समाप्त: 5 सितंबर 2026 को रात 12:13 बजे तक

जन्माष्टमी व्रत पारण का शुभ मुहूर्त :-
जन्माष्टमी व्रत का रखने वाले भक्त 5 सितंबर 2026 को पारण करेंगे। इस दिन व्रत का पारण सूर्योदय के बाद किया जा सकेगा। इस दिन सूर्योदय सुबह 05 बजकर 47 मिनट पर होगा।

जन्माष्टमी पूजा विधि :-
जन्माष्टमी के शुभ मुहूर्त में बाल गोपाल का दूध, दही, शहद, घी और जल से अभिषेक करें। अब लड्डू गोपाल को नए या साफ वस्त्र पहनाएं और उनका श्रृंगार करें। लड्डू गोपाल को माखन-मिश्री का भोग लगाएं। शंख और घंटी बजाकर भगवान श्रीकृष्ण की आरती उतारें। अब लड्डू गोपाल को झूला झुलाएं। अंत में परिवार के साथ प्रसाद वितरण करें।

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जन्माष्टमी का महत्व :-
पुराणों में वर्णित है कि जो व्यक्ति जन्माष्टमी का व्रत करता है उसे पापों से मुक्ति मिलती है और अंत में विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। अग्नि पुराण में लिखा है कि जो व्यक्ति जन्माष्टमी का व्रत रखता है उसके जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जन्माष्टमी की कथा :-
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पावन कथा भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण के जन्म और उनके चमत्कारी रूप से गोकुल पहुँचने की गाथा है। द्वापर युग में मथुरा का राजा कंस बेहद क्रूर था। उसने अपनी बहन देवकी का विवाह वसुदेव जी से किया। विदाई के समय आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र कंस का वध करेगा।

डरकर कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया। कंस ने देवकी के सातों संतानों को जन्म लेते ही मार दिया। श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। उनके प्रकट होते ही कारागृह में दिव्य प्रकाश फैला। भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए।

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उन्होंने वसुदेव-देवकी को बाल रूप में गोकुल जाने और नंद-यशोदा की नवजात कन्या को लाने का आदेश दिया। उसी समय संयोग से यशोदा के यहाँ एक कन्या (माया) का जन्म हुआ था।

भगवान के आदेश पर कारागार के ताले टूट गए और पहरेदार गहरी नींद में सो गए। वसुदेव जी श्रीकृष्ण को सूप (टोकरी) में रखकर उफनती हुई यमुना नदी को पार कर गोकुल पहुँचे। उन्होंने श्रीकृष्ण को यशोदा जी के पास सुलाया और कन्या को लेकर मथुरा लौट आए।

ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848

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“पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री वैदिक ज्योतिष के विद्वान हैं। वे दैनिक राशिफल, पंचांग, मुहूर्त, धर्म-कर्म और शुभ-अशुभ योगों पर विस्तृत जानकारी देते हैं। हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र के गहन अध्ययन के साथ वे पाठकों को सरल भाषा में उपयोगी ज्योतिषीय सलाह प्रदान करते हैं।”

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