कोलकाता हिन्दी न्यूज | 11 सितम्बर 2026: “मुझे थोड़ा मानसिक सहारा दीजिए, ट्रेन आ रही है। मैं मेट्रो लाइन पर जाने वाली हूं।” यह फोन कॉल किसी भी व्यक्ति को विचलित कर सकता था, लेकिन यादवपुर विश्वविद्यालय के काउंसलिंग सेल से जुड़े प्रोफेसर समर कुमार मंडल ने धैर्य बनाए रखा। उन्होंने फोन पर बातचीत जारी रखते हुए उस छात्रा को तत्काल संकट से बाहर निकालने में मदद की।
विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर काउंसलिंग सर्विस एंड स्टडीज इन सेल्फ डेवलपमेंट के प्रभारी प्रोफेसर ने बताया कि उस समय उनका पूरा ध्यान छात्रा को सुरक्षित रखने पर था। ठंडे दिमाग से बातचीत शुरू की गई और छात्रा की मानसिक स्थिति तथा उसकी परेशानियों को समझने की कोशिश की गई।
फोन पर बातचीत से शुरू हुई मदद
घटना से जुड़े सूत्रों के अनुसार, हाल ही में यादवपुर विश्वविद्यालय के कला विभाग में दाखिला लेने वाली एक छात्रा ने संकट की स्थिति में विश्वविद्यालय के काउंसलिंग सेल को फोन किया था। खबरों में छात्रा का नाम बदला हुआ बताया गया है।
प्रोफेसर समर कुमार मंडल के अनुसार, फोन पर छात्रा ने अपनी तत्काल स्थिति के बारे में बताया। उन्होंने बातचीत समाप्त करने के बजाय लगातार उससे बात की और उसे अकेला महसूस न होने देने की कोशिश की।
काउंसलिंग विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे समय में व्यक्ति की बात ध्यान से सुनना और उसे बिना किसी निर्णय या आलोचना के अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर देना बेहद महत्वपूर्ण होता है।
पढ़ाई में हमेशा रही थी मेधावी
परिवार और परिचितों के अनुसार, छात्रा पढ़ाई में बेहद अच्छी थी। स्कूल के दिनों में वह हमेशा अच्छे विद्यार्थियों में शामिल रही थी। अपने उत्कृष्ट परीक्षा परिणामों के आधार पर उसे यादवपुर विश्वविद्यालय में प्रवेश मिला था।
हालांकि, विश्वविद्यालय में आने के बाद उसे नए शैक्षणिक और सामाजिक वातावरण के साथ तालमेल बैठाने में कठिनाई होने लगी। धीरे-धीरे उसके भीतर यह भावना विकसित होने लगी कि वह अपने आसपास के माहौल के लिए उपयुक्त नहीं है और अन्य विद्यार्थियों से पीछे छूट रही है।
प्रोफेसर मंडल के अनुसार, छात्रा प्रतिभाशाली होने के बावजूद खुद को लेकर असुरक्षित महसूस करने लगी थी।
असफलता का अनुभव न होने से बढ़ा दबाव
काउंसलिंग के दौरान यह बात सामने आई कि छात्रा ने अपने जीवन में अब तक लगातार सफलता का अनुभव किया था। पढ़ाई या अन्य गतिविधियों में उसे कभी गंभीर असफलता का सामना नहीं करना पड़ा था।
विश्वविद्यालय के प्रतिस्पर्धी माहौल में पहुंचने के बाद उसके भीतर यह डर पैदा हुआ कि यदि वह अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाई तो क्या होगा। यही आशंका धीरे-धीरे उसके मानसिक तनाव का कारण बनने लगी।
प्रोफेसर मंडल ने बताया कि छात्रा को परिवार से पर्याप्त संवाद और भावनात्मक सहारा नहीं मिल पा रहा था। उसका मित्र भी कोलकाता से बाहर रहता था, जिससे वह कई बार खुद को अकेला महसूस करती थी।
प्रोफेसर ने बातचीत जारी रखकर छात्रा को सुरक्षित किया
प्रोफेसर मंडल ने बताया कि छात्रा के फोन करने के बाद उन्होंने उससे लगातार बातचीत की। उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि वह कहां है और उसके आसपास कोई व्यक्ति मौजूद है या नहीं।
बातचीत के दौरान छात्रा को सुरक्षित स्थान की ओर जाने के लिए प्रेरित किया गया। इसके बाद उसे मेट्रो स्टेशन से बाहर आने और घर लौटने के लिए कहा गया। परिवार तथा उसके मित्रों से भी संपर्क किया गया, ताकि छात्रा को अकेला न छोड़ा जाए।
प्रोफेसर ने छात्रा के मित्र को भी तत्काल कोलकाता आने के लिए कहा। परिवार और दोस्तों को उसके साथ लगातार संपर्क में रहने तथा उसकी सुरक्षा का ध्यान रखने की सलाह दी गई।
फिलहाल छात्रा की हालत स्थिर
परिवार और विश्वविद्यालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, छात्रा को सुरक्षित घर पहुंचा दिया गया है और फिलहाल उसकी स्थिति सामान्य बताई जा रही है। उसे भावनात्मक सहयोग और काउंसलिंग उपलब्ध कराने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
“बातचीत शुरू करना जरूरी है”
विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस 2026 की थीम ‘स्टार्ट द कन्वर्सेशन’ यानी बातचीत शुरू करने पर केंद्रित है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक संकट से जूझ रहे व्यक्ति की बात सुनना, उसकी भावनाओं को गंभीरता से लेना और उसे अकेला न छोड़ना मदद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
यादवपुर विश्वविद्यालय की यह घटना भी बताती है कि समय पर उपलब्ध मानसिक स्वास्थ्य सहायता और संवेदनशील बातचीत किसी व्यक्ति को गंभीर संकट से बाहर निकलने में मदद कर सकती है।
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