नई दिल्ली। समानता, न्याय और विश्वगुरु भारत 2047 का संकल्प
जब कोई आम नागरिक न्याय की उम्मीद लेकर प्रशासन के दरवाजे पर पहुंचता है और उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं सुना जाता, तब केवल एक व्यक्ति का विश्वास नहीं टूटता, बल्कि लोकतंत्र और संविधान की उस भावना को भी चोट पहुंचती है, जो हर नागरिक को समान अधिकार, समान अवसर और समान न्याय का भरोसा देती है।सवाल सीधा है क्या यही कानून का राज है?
भारत का संविधान ऐसे समाज की कल्पना करता है, जहां व्यक्ति की पहचान उसकी जाति, आर्थिक स्थिति, सामाजिक हैसियत या राजनीतिक पहुंच से नहीं, बल्कि उसके नागरिक होने के सम्मान से हो। अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता का जो आदर्श स्थापित किया गया है, वह केवल किताब के शब्द नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भारत की बुनियाद है।
फिर भी आज कई बार ऐसा अनुभव होता है कि प्रभावशाली और साधन-संपन्न व्यक्ति की आवाज व्यवस्था तक आसानी से पहुंच जाती है, जबकि गरीब, मजदूर, किसान, वंचित और मध्यम वर्गीय नागरिक को अपनी बात सुने जाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। जब न्याय व्यक्ति की पहुंच और प्रभाव से जुड़ा हुआ दिखाई देने लगे, तो सवाल केवल व्यवस्था पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास पर भी उठता है।
मैं, विक्रम, स्वयं अपने जीवन में भेदभाव और असमान व्यवहार की पीड़ा को करीब से महसूस कर चुका हूं। इसलिए यह मेरे लिए केवल विचार का विषय नहीं, बल्कि एक मानवीय और राष्ट्रीय चिंता है। किसी व्यक्ति के साथ उसकी परिस्थिति या हैसियत के आधार पर अलग व्यवहार होना केवल उसके साथ अन्याय नहीं, बल्कि संविधान की भावना को भी कमजोर करता है।
झूठे आरोप किसी का भविष्य न बनें अभिशाप एक और गंभीर चिंता है व्यक्तिगत द्वेष, ईर्ष्या या प्रतिस्पर्धा के कारण किसी व्यक्ति को झूठे आरोपों या विवादों में उलझा देना। एक युवा, जो अपने परिवार, राष्ट्र के सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत कर रहा है, यदि अचानक किसी आरोप के कारण कानूनी और सामाजिक संकट में फंस जाए, तो उसका प्रभाव केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।
परिवार, शिक्षा, रोजगार, प्रतिष्ठा और भविष्य सब प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए निष्पक्ष जांच, पारदर्शी प्रक्रिया और प्रत्येक पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर न्याय की बुनियादी शर्त हैं। आरोप और दोष सिद्ध होना एक बात नहीं है। कानून का राज तभी मजबूत होगा, जब व्यक्ति नहीं, बल्कि तथ्य और कानून सर्वोपरि होंगे।
आजादी के 80वें वर्ष में आत्ममंथन भारत ने स्वतंत्रता के 80 वर्षों में विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र सहित अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं।
लेकिन हमें स्वयं से पूछना होगा क्या आज हर नागरिक को समान शिक्षा, समान अवसर और समान न्याय मिल रहा है? हम बुद्ध की करुणा, गांधी के सत्य और अहिंसा, भगत सिंह के साहस तथा संविधान के न्याय, समानता और बंधुता की विरासत वाले देश हैं। फिर हमारे व्यवहार में भेदभाव के लिए जगह क्यों हो?
अधिकारों के साथ कर्तव्य भी हम अपने अधिकारों की बात तो करते हैं, लेकिन अपने कर्तव्यों को कितनी गंभीरता से निभाते हैं? संविधान का अनुच्छेद 51क मौलिक कर्तव्यों का बोध कराता है। राष्ट्र निर्माण केवल सरकार या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है प्रत्येक नागरिक उसकी जिम्मेदारी का भागीदार है।
यदि 2047 तक विकसित और विश्वगुरु भारत बनाना है, तो हमें अपने भीतर भी परिवर्तन लाना होगा, जाति से ऊपर इंसानियत, स्वार्थ से ऊपर राष्ट्रहित, घृणा से ऊपर करुणा,भेदभाव से ऊपर समता, अफवाह से ऊपर सत्य और अधिकारों के साथ कर्तव्यबोध। कैसा भारत चाहिए?
हमें ऐसा भारत चाहिए जहां गरीब और अमीर के लिए न्याय का मापदंड अलग न हो। जहां किसी की शिकायत उसकी हैसियत देखकर नहीं, बल्कि उसकी पीड़ा और तथ्यों के आधार पर सुनी जाए। जहां प्रशासन निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह हो।
ऐसा भारत, जहां किसी निर्दोष का भविष्य झूठे आरोपों से बर्बाद न हो, हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर मिले और प्रत्येक नागरिक सम्मान के साथ जीवन जी सके। क्योंकि न्याय केवल होना नहीं चाहिए, न्याय होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।
विश्वगुरु भारत हम सब बनाएंगे विश्वगुरु भारत केवल आर्थिक शक्ति से नहीं बनेगा। वह तब बनेगा, जब हमारे विकास के साथ समानता, शक्ति के साथ करुणा, ज्ञान के साथ न्याय और अधिकारों के साथ कर्तव्यबोध होगा।
हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि देश हमारे लिए क्या कर रहा है। हमें यह भी पूछना होगा हम देश के लिए क्या कर रहे हैं?आइए, संकल्प लें कि हम जाति, वर्ग, आर्थिक स्थिति या सामाजिक हैसियत के आधार पर भेदभाव नहीं करेंगे।
अन्याय के सामने मौन नहीं रहेंगे और अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी ईमानदार रहेंगे। तभी संविधान किताब से निकलकर हमारे व्यवहार में दिखाई देगा। तभी लोकतंत्र केवल व्यवस्था नहीं, जनविश्वास बनेगा और तभी 2047 का भारत केवल विकसित नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण, संवेदनशील, समतामूलक और विश्वगुरु भारत बनेगा।
जिस दिन भारत के अंतिम व्यक्ति को यह विश्वास हो जाएगा कि उसके साथ भी वही न्याय होगा, जो सबसे प्रभावशाली व्यक्ति के साथ होता है उस दिन भारत की लोकतांत्रिक शक्ति अपने सर्वोच्च शिखर पर होगी।
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