नई दिल्ली । हमने फिर से देखा की इस बार फिर से बिहार की सियासत में अचानक से भूचाल आ गया! सत्ता का तो पूरा का पूरा समीकरण ही बदल गया। बिहार का मुख्यमंत्री जी तो वही है हमारे नीतीश कुमार जी ही लेकिन एनडीए के नहीं, अब वे राजद और कांग्रेस के महागठबंधन का हिस्सा हैं। ऐसे ही भूचाल हमे अभी हाल ही में महाराष्ट्र में भी देखने को मिला था। अब खैर यह किस्सा भी कोई नया नहीं है, देखे तो वही सावन का महीना, वही मुख्यमंत्री और वही सियासी हालात। बात है 2017 की, जब नीतीश कुमार महागठबंधन का हिस्सा थे और वह मुख्यमंत्री थे।

तेजस्वी उपमुख्यमंत्री थे तब तेजस्वी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप से नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिए थे। जिससे मंत्रिमंडल स्वत: भंग हो गया था, 2 साल के भीतर ही महागठबंधन की सरकार गिर गई थी। बाद में उन्होंने भाजपा का समर्थन लिया और इनकी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। वही इस बार फिर से बिहार में उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही राजद के चुनावी वादे को पूरा करने की कोशिश में तेजस्वी यादव जुट गए हैं, उन्होंने शपथ लेते ही बेरोजगार युवाओं के लिए एक बड़ी घोषणा करते हुए कहे कि अगले एक महीने के अंदर प्रदेश में बंपर सरकारी नौकरियां निकलेंगी।

यह तो वक्त के कोंख में है की कितना सच्चाई है या युवाओं के साथ हमेशा की तरह छल कपट ही होगा जैसे प्रधानमंत्री जी बोले थे की दो करोड़ नौकरियां हर वर्ष दिया जायेगा। खैर ये समय बताएगा, पर फिर से इस समय राज्य में एक बार 2022 में भी वैसे ही हालात हो गया। हालांकि इस बार जदयू को भाजपा द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने का मुद्दा सामने आया है, जिसके कारण ही बीजेपी ने रोष प्रदर्शन भी किया। अब आठवीं बार मुख्यमंत्री बने नीतीश और दूसरी बार उप मुख्यमंत्री बने तेजस्वी को इस बार ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि राजद के साथ कानून एवं व्यवस्था को लेकर कैसे सवाल उठते रहे हैं? इससे उनसे व बिहार के जनता से बेहतर कोई और अवगत नहीं हो सकता।

नीतीश सरकार ने भले ही अच्छी सरकार व्यवस्था का वादा करते आए हो लेकिन यह भी सच है कि राज्य विकास के पैमाने पर पिछ्ड़ता जा रहा है। चलिए बात करते हैं इस ‘आया राम गया राम’ वाले सच्चाई के बारे में ताजा संदर्भ में देखें तो बिहार में एनडीए सरकार का गिरना खासतौर पर बीजेपी नेतृत्व के लिए खतरा है। बीजेपी नेतृत्व पर पहले से आरोप लगा है कि वह गठबंधन के सहयोगी दलों को समुचित सम्मान नहीं देती। यहां सरकार की स्थिरता एक विशेष मुद्दा है। गठबंधन में पार्टियों के आंतरिक संबंध मजबूत होने चाहिए जिससे आया राम गया राम जैसी स्थिति की संभावना कम की जा सके। चुनाव आयोग ने सुझाव दिया है कि दलबदल मामलों में एक निर्णय प्राधिकारी होना चाहिए।

एक मत के अनुसार कानून में राजनीतिक दलों को आरटीआई के तहत लाना चाहिए। बिहार की स्थिति देखकर कई सवाल मन में उठते हैं? क्या इसी प्रकार दल बदली से विकास संभव है? क्या तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरियां देने का जो वादा किया है वह पूरा होगा? क्या नीतीश कुमार स्वयं को प्रधानमंत्री पद पर देखना चाह रहे हैं? बिहार की राजनीति अभी भविष्य में न जाने कितने रंग दिखाएगी, मुद्दा ये है कि यह राजनीतिक अस्थिरता बिहार के लोगों के लिए ज्यादा नुकसानदायक न हो और बिहार की जो स्थिति है वह विकास के पैमाने पर खरी उतरे और आने वाली सरकार या यह महागठबंधन बिहार के विकास में सहयोगी बने।

vikram
डॉ. विक्रम चौरसिया

चिंतक/आईएएस मेंटर/सोशल एक्टिविस्ट/दिल्ली विश्वविद्यालय

Shrestha Sharad Samman Awards

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