भारत में बढ़ रहे पत्नियों द्वारा पतियों की हत्या चिंताजनक
नई दिल्ली। नारी सम्मान हमारी संस्कृति है, पुरुष सम्मान हमारा कर्तव्य है और दोनों को समान न्याय देना संविधान की आत्मा है। भारतीय संस्कृति में नारी को माँ, शक्ति और सृजन का स्वरूप माना गया है। हमारे समाज में महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा का विशेष महत्व रहा है।
साथ ही यह भी उतना ही सत्य है कि अपराध का कोई लिंग नहीं होता। अपराधी केवल अपराधी होता है और पीड़ित केवल पीड़ित। इसलिए न्याय का आधार व्यक्ति का लिंग नहीं, बल्कि सत्य, साक्ष्य और संविधान होना चाहिए।
पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों से महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों के साथ-साथ ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें पुरुषों ने स्वयं को घरेलू हिंसा, मानसिक उत्पीड़न, ब्लैकमेल, वैवाहिक प्रताड़ना या कथित झूठे मुकदमों का शिकार बताया है।
कई मामलों में मानसिक तनाव इतना गहरा हो जाता है कि कुछ लोग आत्महत्या जैसा दुखद कदम उठा लेते हैं। वहीं कुछ मामलों में हिंसा और हत्या जैसे गंभीर घटनाएं लगातार आ रही हैं। ऐसी प्रत्येक घटना की निष्पक्ष, पारदर्शी और साक्ष्य-आधारित जांच होना आवश्यक है।
आज प्रश्न यह है कि यदि कोई पुरुष स्वयं को पीड़ित मानता है, तो उसकी शिकायतों की सुनवाई, कानूनी सहायता, परामर्श और संरक्षण के लिए समर्पित संस्थागत व्यवस्था कहाँ है?
अनेक बार सामाजिक धारणाएँ भी निष्पक्ष सुनवाई में बाधा बन जाती हैं। न्याय का तकाज़ा है कि किसी भी व्यक्ति को केवल उसके लिंग के आधार पर दोषी या निर्दोष न माना जाए।
मैं हमेशा कहता हूँ कि महिला और पुरुष समाज तथा परिवार रूपी साइकिल के दो पहिए हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है। परिवार प्रेम, विश्वास, सम्मान और संवाद से बनते हैं; हिंसा, छल और प्रतिशोध से नहीं। इसी संदर्भ में मेरा मानना है कि राष्ट्रीय पुरुष आयोग के गठन पर गंभीर और संवेदनशील विचार होना चाहिए।
इसका उद्देश्य किसी भी रूप में महिलाओं के अधिकारों का विरोध करना नहीं है, बल्कि उन पुरुषों को भी कानूनी सहायता मनोवैज्ञानिक परामर्श और निष्पक्ष सुनवाई उपलब्ध कराना होना चाहिए जो स्वयं को पीड़ित मानते हैं।
जैसे महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों के लिए संस्थागत व्यवस्थाएँ हैं, वैसे ही पुरुषों की वास्तविक शिकायतों के लिए भी एक निष्पक्ष व्यवस्था पर विमर्श होना लोकतांत्रिक दृष्टि से अनुचित नहीं कहा जा सकता।
हमें स्त्री और पुरुष के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि समान न्याय की संस्कृति विकसित करनी होगी। महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक प्रत्येक निर्दोष पुरुष की गरिमा और अधिकारों की रक्षा भी है। न्याय तभी सार्थक होगा जब हर पीड़ित की बात सुनी जाएगी और हर आरोपी का निष्पक्ष परीक्षण होगा।
भारत का संविधान समानता, गरिमा और न्याय का संदेश देता है। इसलिए कानून का धर्म केवल एक होना चाहिए सत्य, समानता और न्याय। यदि प्रत्येक निर्दोष सुरक्षित होगा और प्रत्येक दोषी को, चाहे वह महिला हो या पुरुष, कानून के अनुसार समान दंड मिलेगा, तभी भारत वास्तव में एक न्यायपूर्ण, संवेदनशील और समतामूलक राष्ट्र बन सकेगा।
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