अशोक वर्मा “हमदर्द”, कोलकाता। 15 मई को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाती है। यह दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा परिवार की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्ता को रेखांकित करने के लिए घोषित किया गया था। भारत जैसे देश में जहां परिवार केवल सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि एक भावनात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र रहा है, जो भारत वसुधैव कुटुंबकम् की बात करता है वहां यह दिन मात्र एक संदेश या औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर होना चाहिए।
आज संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक का सफर हम कर रहे है। भारत में परंपरागत रूप से संयुक्त परिवार की अवधारणा रही है। एक ही छत के नीचे दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, बुआ और भाई-बहन सब एक साथ रहते थे। खुशियां साझा होती थीं, दुख आधे हो जाते थे। जिम्मेदारियां बंटती थीं और प्रेम बढ़ता था। परंतु आज यह तस्वीर बदल चुकी है।
अब परिवार का अर्थ सीमित हो गया है- पति, पत्नी और उनके बच्चे। बहन-भाई, चाचा-चाची, ताऊ-ताई अब केवल त्योहारों पर मिलने वाले रिश्ते बनकर रह गए हैं। संयुक्त परिवार अब अपवाद बन चुके हैं और एकल परिवार सामान्य। किंतु एक बात अवश्य सामने आई है कि भाई के रिश्ते को साला और साढूं से नीचे रखा जा रहा है और बहन के रिश्तों को साली और सरहज से नीचे क्यों की अपनत्व का भाव खो रहा है।

बदलती सोच और दिखावे का जीवन लोग जीने के आदि हो चुके है। आज का समाज ‘कम खाना, ज्यादा दिखाना’ की मानसिकता में उलझ गया है। परिवारों में पहले जहाँ सादगी और समर्पण का भाव था, वहीं अब दिखावा और स्वार्थ की दीवारें खड़ी हो गई हैं। रिश्तों की मिठास की जगह औपचारिक संदेशों ने ले ली है- व्हाट्सएप पर “हैप्पी फैमिली डे” लिख देने से लोग सोचते हैं कि उन्होंने अपने कर्तव्य निभा दिए। यानी कुल मिलाकर रिश्ता अभिनय का मंच बन कर रह गया है। परिवार की परिभाषा अब केवल भौतिक आवश्यकताओं तक सीमित हो गई है। माता-पिता की सेवा, भाई की मदद, बहन की चिंता- ये सब बातें अब पुरानी कहानियों में सिमटती जा रही हैं।
इसे हम आर्थिक दबाव या संवेदनहीनता कहें समझ में नहीं आता। किंतु फिर सोचता हूं पहले जैसा अभाव तो रहा नहीं जहां बताशा ही मिठाई हुआ करता था, घर में जब पूड़ी बनती थी तब हम बच्चे नाच-कूद करते थे, घर में मछली आने के बाद मां के हाथों की चूड़ियां सिलबट्टे पर करताल बजाती थी, दालान में पुआल के बिस्तर पर हम सोते वो सुख आज के डनलप के गद्दे पर नहीं मिलता, इसलिए की मन में संतोष का भाव था हमें अभाव नहीं दिखता और पूरा परिवार सुकून से जीते थे।
आज कई बार यह सुनने को मिलता है कि “मेरे पास खुद के लिए ही पैसे नहीं हैं, दूसरों की मदद कैसे करूं?” यह कथन जितना सच है, उससे ज्यादा खतरनाक यह सोच बनती जा रही है कि यदि किसी को सहायता की जरूरत हो और हम सक्षम हों, फिर भी मदद नहीं करते क्योंकि “वो हमारा क्या लगता है?”
परिवारों में अब निहित स्वार्थ की भावना बलवती होती जा रही है। पहले जहाँ कोई बीमार होता था, तो पूरा परिवार उसके इर्द-गिर्द होता था। अपनी पूरी कमाई उस बीमार व्यक्ति में लगाकर उसे स्वस्थ करने में लग जाता था, किंतु आज बीमारी की खबर पर भी प्रतिक्रिया आती है- “इतने पैसे कहां से आएंगे?”- और लोग चुपचाप मुंह फेर लेते हैं। जो परिवार के संवेदनहीनता को दर्शाती है और इसका मूल कारण है भावनाओं की हत्या।
परिवार पहले भावनाओं का संगम था। अब वह ‘ड्यूटी’ का ठेका बन गया है। माता-पिता को वृद्धाश्रम भेज देना आसान विकल्प बन गया है और अगर नहीं भेजे तो घर के पहरेदारी की जिम्मेदारी दे दिया जाता है। उस बूढ़े दादा या पिता के पास बैठना भी लोग नहीं चाहते जिसने अपने सारे जीवन को परिवार के कल्याण में लगा दिया।भाई-बहन की शादी में जाना भी समय और खर्च का हिसाब लगाकर तय होता है। बचपन की वह शिक्षा – कि परिवार से समाज बनता है और समाज से देश- अब किताबी बातें बनकर रह गई हैं।
टूटते संबंध, बिखरता समाज आज के झूठे शानो शौकत में उलझ कर रह गया है। परिवार केवल एक निजी इकाई नहीं होता, वह समाज का मूल आधार होता है। जब परिवार कमजोर होता है, तो समाज भी बिखरने लगता है। आज अपराध, मानसिक तनाव, अकेलापन, डिप्रेशन जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। इन सबका मूल कारण एक ही है- भावनात्मक सुरक्षा का टूटना।
संयुक्त परिवार में बच्चे बुजुर्गों के अनुभवों से सीखते थे, युवा एक-दूसरे की मदद से आगे बढ़ते थे और बुजुर्ग स्नेह और सम्मान पाते थे। अब हर व्यक्ति अपने ‘पर्सनल स्पेस’ में जी रहा है – लेकिन यह ‘स्पेस’ अंदर से खाली है।
अभी के समय को पश्चिम की नकल और पूर्व का पतन कह सकते है।
पश्चिमी देशों में एकल परिवार की संस्कृति पहले से थी, लेकिन वहां समाज ने इसके लिए व्यवस्थाएं बनाई हैं – जैसे कि सरकारी वृद्धाश्रम, बच्चों के लिए डे केयर और बीमा आधारित स्वास्थ्य सेवाएं। भारत ने तो पश्चिम की संस्कृति तो अपनाई, पर उसकी व्यवस्थाएं नहीं। नतीजा यह है कि हमारे बुजुर्ग असहाय हैं, बच्चे संस्कारहीन हो रहे हैं और युवा अकेलेपन से जूझ रहे हैं।अभी के समय में आत्मचिंतन ही समाधान हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस केवल संदेश भेजने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। हमें सोचना होगा और एक एक पहलू पर ध्यान देना होगा जैसे – क्या हम अपने परिवार से सच में जुड़े हैं या सिर्फ नाम के रिश्ते निभा रहे हैं? क्या हमने अपने बच्चों को परिवार का मूल्य सिखाया है? न की परिवार के बारे में अपनें बच्चों में नकारात्मक विष बोया है?
क्या हम अपने माता-पिता के लिए समय निकाल पाते हैं या केवल पहरेदार समझते है और उन पर झल्लाते है? यदि इन सवालों के जवाब नकारात्मक हैं, तो हमें अब भी समय है- बदलने का, सुधरने का, और अपने परिवार को फिर से जोड़ने का।

हमें फिर से संयुक्त परिवारों की भावना को जीवित करना होगा। यदि एक ही छत के नीचे नहीं रह सकते, तो कम से कम एक-दूसरे से जुड़े रहें- मन से, मदद से, और संवेदना से। रिश्तों को दिखावे की नहीं, निभाने की जरूरत है। तभी सच्चे अर्थों में हम एक मजबूत समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर पाएंगे।
नई पीढ़ी के सामने एक चुनौती और अवसर दोनों है- आधुनिकता के साथ पारंपरिक मूल्यों को जोड़ने की। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और डिजिटल जीवन के बीच अगर हम रिश्तों की गर्मी बचा सके, तो यही भारत की असली शक्ति होगी। अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस का संदेश यही है – लौट आइए अपने परिवार की गोद में, क्योंकि वहीं से जीवन की सबसे सच्ची शुरुआत होती है।
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