श्याम कुमार राई “सलुवावाला”, खड़गपुर। “याहू” अभिनेता… शम्मी कपूर जीवन पर्यन्त सदाबहार अभिनेता देवानंद का एहसानमंद रहे। क्यों और कैसे? फिल्मी दुनिया के दिलचस्प किस्सा का आज का विषय यही है। हालांकि शम्मी कपूर सन् 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘जीवन ज्योति’ से फिल्मी दुनिया में बतौर अभिनेता प्रवेश कर चुके थे। लेकिन इसके बाद आई उनकी लगभग दर्जन से अधिक फिल्मों में से एक भी फिल्म को वो सफलता नसीब नहीं हुई जिससे वे सफल अभिनेताओं की कतार में शामिल होते।
वे एक हिट फिल्म की तलाश में लगे हुए थे। संघर्ष जारी था। सन् 1957 की बात है इन्हीं दिनों नासिर हुसैन फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ के निर्माण और निर्देशन की तैयारी कर रहे थे। फिल्म में वे मुख्य भूमिका में उन दिनों के हिट अभिनेता देवानंद को और बतौर नायिका अभिनेत्री अमीता को लेना चाहते थे। अमीता अभी नई थीं और उनकी यह पहली फिल्म थी। ऐसा कहते हैं कि चूंकि अभिनेत्री अमीता नई थी और उनकी यह पहली फिल्म थी इसलिए देवानंद ने इस फिल्म को करने से मना कर दिया।
इधर फिल्म के लेखक निर्माता-निर्देशक नासिर हुसैन ने नायिका को ध्यान में रखकर फिल्म की कहानी लिखी थी इसलिए नायिका की भूमिका अमीता को ही निभानी थी। फिल्म की अभिनेत्री अमिता के नई होने की वजह से देवानंद ने फिल्म करने से इंकार कर दिया। ऐसे में नासिर हुसैन ने उनकी जगह शम्मी कपूर को अनुबंधित कर लिया। इस तरह शम्मी कपूर इस भूमिका को मिलने का श्रेय देवानंद को देते थे और यह सही भी है देवानंद के मना करने की वजह से ही उन्हें ‘तुमसा नहीं देखा’ में काम करने का मौका मिला।

इतना ही नहीं पिछले तीन चार वर्षों से असफलताओं से जूझने के बाद इस फिल्म ने अच्छी सफलता प्राप्त की। बल्कि हिट साबित हुई। फिल्म ने देश के कई सिनेमाघरों में सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली भी मनाई। इसके साथ ही फिल्म ने शम्मी कपूर को रोमांटिक हीरो के रूप में स्थापित कर दिया। उन्होंने चार साल के समय और दर्जन भर फिल्मों की असफलता के बाद सफलता का स्वाद चखा।
इस फिल्म के बाद उनके अभिनय की गाड़ी चल निकली। फिर तो ‘जंगली'(1961), चायना टाउन (1962), प्रोफेसर (1962), ‘ब्लफ मास्टर’ (1963), ‘राजकुमार’ (1964), ‘कश्मीर की कली’ (1964) आदि फिल्मों में काम किया। इन फिल्मों ने अच्छी-खासी व्यवसायिक सफलता भी प्राप्त की। अब उनकी लोकप्रियता ऊंचाईयां छूने लगी थी।
फिर आया वर्ष 1966 का, निर्माता-निर्देशक नासिर हुसैन एक संगीत प्रधान एवं रहस्यमयी फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ की योजना बनाते हैं। जिसे देवानंद के छोटे भाई विजय आनंद (गोल्डी) निर्देशन करने वाले थे। चूंकि नासिर हुसैन देवानंद के साथ सन् 1961 में फिल्म ‘जब प्यार किसी से होता है’ में देवानंद के साथ काम कर चुके थे इसलिए उनकी पहली पसंद देवानंद ही थे पर किसी कारणवश वे इस बार भी इस फिल्म को नहीं कर पाने की मजबूरी में फंस गए और वे फिल्म का हिस्सा नहीं बन सके बल्कि उन्होंने ही अपनी जगह शम्मी कपूर का नाम यह कहते हुए सुझाया कि, “अरे वो राज कपूर का भाई है न, उसे मेरी जगह ले लो।”
इस तरह एक बार फिर शम्मी कपूर के ‘तीसरी मंजिल’ में हीरो बनने की वजह बने देवानंद। कहते हैं बावजूद इसके शम्मी कपूर देवानंद से जाकर खुद मिले और उनकी सहमति लेने के बाद ही फिल्म से जुड़े। इस तरह देवानंद की सिफारिश पर ही दूसरी बार भी उन्हें एक बड़ी फिल्म में काम करने का मौका मिला जिस फिल्म ने उन्हें प्रथम पंक्ति के अभिनेता की कतार में शामिल कर दिया। कहते हैं बावजूद इसके इस तरह से शम्मी कपूर के फिल्मी जीवन की दो बेहद सफल फिल्म में काम करने का मौका देवानंद की वजह से मिला।
‘तुमसा नहीं देखा’ और ‘तीसरी मंजिल’ इन दोनों ही फिल्मों ने शम्मी कपूर के लिए न केवल सफलता के द्वार खोले बल्कि अभिनय के शिखर पर पहुंचाने का मार्ग भी प्रशस्त किया। ‘तीसरी मंजिल’ ने अपार सफलता प्राप्त की। इसके गीत संगीत ने मानो एक नए संगीत युग की आधारशिला ही रख दी। आर.डी. बर्मन के गीत-संगीत ने फिल्मी दुनिया में क्रांति ही ला दी थी।
करीब 60 साल होने को आ रहे हैं फिर भी तीसरी मंजिल का ‘गीत-संगीत आज भी जवां है, ताजा है। यहां फिल्म तीसरी मंजिल’ और शम्मी कपूर से जुड़ी कुछ जानकारी याद हो आई उसे भी साझा करता चलूं। बात ये है कि फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ में अभिनेता सलमान खान के पिता और प्रसिद्ध फिल्म स्क्रिप्ट और कहानी लेखक सलीम-जावेद के सलीम खान ने भी एक भूमिका अदा की थी।
‘तीसरी मंजिल’ के बाद तो शम्मी कपूर के खाते में एक से एक सफल फिल्में जुड़ती चली गई। इन फिल्मों में ‘पगला कहीं का’ (1970) ‘पेरिस की एक शाम’ (1967), ब्रह्मचारी (1968), प्रिंस (1969), ‘जवां मोहब्बत’ (1971) और ‘अंदाज’ (1971) इत्यादि फिल्मों से उन्होंने सिने प्रेमियों का खूब मनोरंजन किया।
आगे चलकर शम्मी कपूर ने फिल्म निर्देशन में भी हाथ आजमाए। उन्होंने सन् 1974 में ‘मनोरंजन’ नामक फिल्म का निर्देशन किया। इसमें मुख्य अभिनेता संजीव कुमार तथा हिरोइन जीनत अमान थीं, खुद शम्मी कपूर ने भी एक भूमिका अदा की थी। यह फिल्म ‘इर्मा ला ड्यूस” नामक फ्रेंच नाटक पर आधारित थी। इसके बाद सन् 1976 मे एक और फिल्म ‘बंडलबाज’ का भी निर्देशन किया। इसमें राजेश खन्ना और गायिका- अभिनेत्री सुलक्षणा पंडित ने काम किया था। शम्मी कपूर ने इस फिल्म में भी एक महत्वपूर्ण भूनिका अदा की थी।
दोस्तो फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ और ‘तीसरी मंजिल’से जुड़े और भी कई छोटी-छोटी मजेदार बातें हैं, किस्से है। उनकी भी चर्चा फिर कभी आने वाले दिनों में करूंगा। फिलहाल देवानंद के प्रति शम्मी कपूर के ताउम्र शुक्रगुजार रहने का किस्सा यही पूरा हुआ।
आप सबने यहां तक आने की जहमत की इसके लिए आभारी हूं, हमेशा रहूंगा। फिर मिलता हूं…अभी तो चलता हूं। धन्यवाद, शुक्रिया, सायोनारा…..

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