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भारत का जीएसटी सुधार 2025 – टैक्स ढांचे का पुनर्निर्माण और वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम

भारत का जीएसटी सुधार 2025 सिर्फ एक वित्तीय पहल नहीं बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का प्रतीक है
जीएसटी सुधार भारत को न केवल घरेलू स्तर पर महंगाई से राहत दिलाएगा, बल्कि वैश्विक मंच पर उसे और मजबूती से खड़ा करेगा

अधिवक्ता किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र। वैश्विक स्तर पर भारत की अर्थव्यवस्था ने पिछले एक दशक में अनेकों उतार-चढ़ाव देखे हैं। वैश्वीकरण, अमेरिकी टैरिफ, तेल कीमतों की अनिश्चितता, महामारी के झटके और डिजिटल क्रांति के बीच भारतीय कर प्रणाली को समय-समय पर नए स्वरूप की आवश्यकता महसूस होती रही है। इसी कड़ी में 3-4 सितंबर 2025 को आयोजित जीएसटी काउंसिल की 56वीं बैठक ऐतिहासिक साबित हुई, जब इसमें टैक्स स्लैब को पुनर्संरचित कर 12% और 28% की दरों को समाप्त कर दिया गया और सैकड़ों उत्पादों को 5 व 18% टैक्स स्लैब में स्थानांतरित कर दिया गया। साथ ही अनेक आवश्यक वस्तुओं को 0% टैक्स स्लैब में डाल दिया गया। इससे गरीबों किसानों और मध्यम वर्ग के लिए जीवन यापन आसान होगा। यह नया ढांचा 22 सितंबर 2025 से लागू होगा।

साथियों बात अगर हम जीएसटी क्या है? और इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की करें तो, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) एक ऐसा अप्रत्यक्ष कर है, जिसे 122वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत 1 जुलाई 2017 को पूरे देश में लागू किया गया। जीएसटी का मूल उद्देश्य देशभर में एक राष्ट्र, एक टैक्स की अवधारणा को साकार करना था। इससे पहले केंद्र और राज्य स्तर पर उत्पाद शुल्क, सेवा कर, वैट, एंट्री टैक्स और लगान जैसी अनेक परतों वाले कर प्रणाली लागू थे, जिससे व्यापारियों और उपभोक्ताओं दोनों को जटिलताओं का सामना करना पड़ता था। जीएसटी ने इन सबको समेट कर एक एकीकृत कर ढांचा दिया।

आज की तारीख में दुनिया के 150 से अधिक देशों में इसी तरह का जीएसटी सिस्टम किसी-न-किसी रूप में लागू है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ के अधिकांश देश, मलेशिया, सिंगापुर और यहां तक कि ब्राजील जैसे बड़े देश भी जीएसटी आधारित कर व्यवस्था से जुड़े हुए हैं। भारत का नया सुधार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब वह वैश्विक मानकों के अनुरूप टैक्स ढांचे को और सरल बना रहा है।

साथियों बात अगर हम नए ढांचे का स्वरूप, नए टैक्स स्लैब की करें तो, नए सुधार के बाद भारत में अब टैक्स ढांचा मुख्यतः तीन बड़े स्लैब पर केंद्रित हो गया है, 0% 5 पर्सेंट और 18% – 0% स्लैब- गरीब और मध्यम वर्ग की जरूरतों से जुड़े खाद्यान्न, दालें, फल, सब्जियां, स्कूल किताबें, प्राथमिक शिक्षा सेवाएं और जीवनरक्षक दवाइयां इसमें शामिल हैं। यह स्लैब सीधे तौर पर समाज के कमजोर तबकों को राहत देने के लिए बनाया गया है।

5% स्लैब, इसमें रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुएं, कुछ डेयरी प्रोडक्ट्स, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं और छोटे व्यापार से संबंधित सामान आते हैं। 18% स्लैब- इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, बीमा, निर्माण कार्य, उन्नत स्वास्थ्य सेवाएं, औद्योगिक उत्पादन, लक्जरी सामान और उच्च मूल्य के कंज्यूमर गुड्स शामिल हैं। 12% और 28% स्लैब हटाने से टैक्स ढांचा सरल हुआ है। पहले जहां चार से अधिक प्रमुख दरें थीं, अब यह तीन स्लैबों में सिमट गया है, जिससे न केवल व्यापारियों के लिए टैक्स अनुपालन आसान होगा बल्कि आम उपभोक्ता को भी स्पष्टता मिलेगी।

साथियों बातें अगर हम किन क्षेत्रों को मिलेगा लाभ? इसको समझने की करें तो, नए ढांचे के सबसे बड़े लाभार्थी वे क्षेत्र हैं जो प्रत्यक्ष रूप से गरीब, मध्यम वर्ग, उद्योग और सामाजिक जरूरतों से जुड़े हैं।
(1) डेयरी प्रोडक्ट्स : दूध, पनीर, दही, घी और पोषण संबंधी उत्पादों पर टैक्स संरचना सरल होने से कीमतें स्थिर रहेंगी। इससे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को लाभ होगा।

(2) बीमा क्षेत्र : स्वास्थ्य व जीवन बीमा पर बीमा प्रीमियम पर 0% टैक्स लागू होने से उपभोक्ताओं के लिए प्रीमियम लागत कम हो सकती है। इससे जीवन बीमा, स्वास्थ्य बीमा और पेंशन योजनाओं में भागीदारी बढ़ेगी।
(3) निर्माण और आवास-घर बनाने के लिए आवश्यक सीमेंट, स्टील, टाइल्स और सेवाओं पर कर भार कम होने से घर की लागत घटेगी। यह मध्यम वर्ग और रियल एस्टेट उद्योग दोनों के लिए लाभकारी है।

(4) इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र, मोबाइल, लैपटॉप और घरेलू उपकरणों की कीमतें स्थिर होने से डिजिटल इंडिया अभियान को गति मिलेगी।
(5) मेडिकल और पोषण क्षेत्र : जीवन रक्षक दवाओं को 0% स्लैब और अन्य चिकित्सा उपकरणों को 5% -18% स्लैब में रखने से स्वास्थ्य सेवाएं सस्ती होंगी।
(6) एमएसएमई और बड़े उद्योग- सरल टैक्स स्लैब से छोटे और मझोले उद्योगों को अनुपालन लागत कम होगी, जबकि बड़े उद्योगों को उत्पादन और निर्यात बढ़ाने में बहुत विशाल सहूलियत होगी।

साथियों बात अगर हम जीएसटी रिफॉर्म करने का सरकार का मकसद और आम आदमी का फायदा होने की करें तो, जीएसटी सुधार का सबसे बड़ा मकसद है,
(1) गरीबों और मध्यम वर्ग को राहत देना। नई दरों से- गरीब तबके को 0% टैक्स स्लैब से सस्ते में भोजन और दवाइयां मिलेंगी। (2) घर बनाने वालों को कम खर्च आएगा। (3) बीमा सस्ता होगा। (4) स्वास्थ्य सेवाएं किफायती होंगी। (5) छोटे उद्योगों को प्रतिस्पर्धा में मजबूती मिलेगी। (6) और महंगाई का दबाव घटेगा। सरकार यह संदेश देना चाहती है कि टैक्स नीति सिर्फ राजस्व बढ़ाने का साधन नहीं, बल्कि आर्थिक न्याय और सामाजिक सुरक्षा का भी सशक्त औजार है।

साथियों बात अगर हम टैक्स के स्लैब में परिवर्तन करने से करीब 85000 करोड़ का घाटा और भरपाई के उपायों को समझने की करें तो, सरकार का अनुमान है कि दरें घटाने और कई वस्तुओं को 0% टैक्स स्लैब में डालने से उसे लगभग 85,000 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हो सकता है। लेकिन इसकी भरपाई के लिए बड़े उपाय किए गए हैं, 40% स्लिप से रिकवरी-टैक्स अनुपालन बढ़ने, ई-इनवॉइसिंग और डिजिटल ट्रैकिंग से टैक्स चोरी में कमी आएगी और इससे राजस्व की बड़ी मात्रा में भरपाई होगी।

साथियों बात अगर हम अमेरिकी टैरिफ और भारत की रणनीति को समझने की करें तो, हाल के वर्षों में अमेरिका ने भारत सहित कई देशों के खिलाफ टैरिफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किए हैं। इस पृष्ठभूमि में जीएसटी सुधार भारत की आंतरिक ताकत को बढ़ाने का जरिया है। (1) सरल टैक्स ढांचा विदेशी निवेशकों को आकर्षित करेगा। (2) घरेलू उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाएगा। (3) निर्यात लागत कम होने से अमेरिका और यूरोप के टैरिफ का दबाव कम महसूस होगा। यह सुधार संकेत देता है कि भारत आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाना चाहता है।

साथियों बातें अगर हम जीएसटी सुधारो के पीछे संभव होता है राजनीतिक विमर्श, राहत या सियासत? की करें तो, जब 2017 में जीएसटी लागू हुआ था तब सरकार ने इसे “वन नेशन, वन टैक्स” कहकर ऐतिहासिक बताया था और तर्क दिया था कि उच्च दरें राजस्व जुटाने के लिए जरूरी हैं। अब 2025 में दरें घटाने पर वही सरकार कह रही है कि, इससे उपभोक्ताओं को राहत और उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा। अब सवाल उठता है, क्या यह आर्थिक विवशता है या राजनीतिक रणनीति? दरअसल, यह दोनों का मिश्रण है। वैश्विक मंदी, अमेरिकी दबाव और घरेलू महंगाई ने सरकार को दरें घटाने पर मजबूर किया। साथ ही, यह कदम गरीबों, मध्यम वर्ग और छोटे उद्योगों को चुनावी वर्ष में राहत देने की रणनीति भी हो सकता है।

साथियों बात अगर हम जीएसटी सुधारो को सामाजिक दृष्टिकोण, जैसे घर के बड़े समझाते हैं थ्योरी को समझने की करें तो, अगर इस सुधार को सामाजिक रूप से समझा जाए तो यह बिल्कुल वैसा है जैसे घर के बड़े सदस्य बच्चों को जीवन जीने का तरीका बताते हैं। (1) “भोजन और स्वास्थ्य सबसे पहले”- इसलिए खाद्यान्न और दवाइयां 0% स्लैब में।(2) “स्वास्थ्य का ध्यान रखो”- इसलिए मेडिकल और बीमा क्षेत्र सस्ता। (3) “घर बनाओ” – इसलिए कंस्ट्रक्शन सेक्टर को राहत। (4) “बच्चों की पढ़ाई जरूरी है”- इसलिए शिक्षा सेवाएं किफायती। (5) “फालतू दिखावा मत करो”- इसलिए लक्जरी सामान पर टैक्स ऊंचा रखा गया। यह सुधार दर्शाता है कि सरकार टैक्स नीति को सिर्फ राजस्व का औजार नहीं, बल्कि समाज के कल्याण का ढांचा मानकर आगे बढ़ रही है।

अधिवक्ता किशन सनमुखदास भावनानी : संकलनकर्ता, लेखक, कवि, स्तंभकार, चिंतक, कानून लेखक, कर विशेषज्ञ

साथियों बात अगर हम इन जीएसटी सुधारो को अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य के रूप में समझने की करें तो, विश्व अर्थव्यवस्था आज दो ध्रुवों में बंटी हुई है, अमेरिकी प्रभुत्व और एशियाई उभार। ऐसे समय में भारत का टैक्स सुधार एक सॉफ्ट पावर मॉडल के रूप में सामने आ रहा है। (1) यूरोप ने भी 2008 मंदी के बाद टैक्स स्लैब घटाकर अर्थव्यवस्था को स्थिर किया था। (2) चीन ने निवेश आकर्षित करने के लिए टैक्स दरें लचीली बनाई थी। (3) भारत अब उसी राह पर चल रहा है। इससे भारत की छवि निवेश के लिए सुरक्षित और आकर्षक गंतव्य के रूप में मजबूत होगी।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भारत का जीएसटी सुधार 2025 सिर्फ एक वित्तीय पहल नहीं बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का प्रतीक है। यह सुधार भारत को न केवल घरेलू स्तर पर महंगाई से राहत दिलाएगा बल्कि वैश्विक मंच पर उसे और मजबूती से खड़ा करेगा।

(स्पष्टीकरण : उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। यह जरूरी नहीं है कि कोलकाता हिंदी न्यूज डॉट कॉम इससे सहमत हो। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।)

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