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मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारतीय रेलवे 100% इलेक्ट्रिफिकेशन के करीब

  • डीज़ल खपत में 62% गिरावट, होर्मुज़ तनाव से सुरक्षित बनी पटरियां

निशान्त, Climate कहानी, कोलकाता: 6 दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध की आहट से ऊर्जा बाज़ार फिर अस्थिर हो रहे हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, खासकर ईरान, इज़रायल और अमेरिका के बीच टकराव ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि तेल और गैस पर निर्भर दुनिया कितनी असुरक्षित है।

भारत भी इससे अलग नहीं है। देश अपनी ज़रूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर आता है।

ऐसे समय में भारतीय रेलवे की एक शांत मगर बड़ी उपलब्धि सामने आ रही है। देश का यह विशाल रेल नेटवर्क अब लगभग पूरी तरह बिजली से चलने की दहलीज़ पर है।

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99.4% ब्रॉड गेज नेटवर्क इलेक्ट्रिफाइड

मार्च 2026 तक भारतीय रेलवे के ब्रॉड गेज नेटवर्क का 99.4 प्रतिशत हिस्सा इलेक्ट्रिफाई हो चुका है। करीब 70,001 किलोमीटर ट्रैक में से 69,427 किलोमीटर पर बिजली के इंजन दौड़ रहे हैं। यानी अब सिर्फ कुछ छोटे हिस्से ही बचे हैं, जो पांच राज्यों में फैले हैं।

यह बदलाव सिर्फ तकनीकी नहीं है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु रणनीति की एक अहम कहानी भी है।

डीज़ल से बिजली तक का सफर

रेलवे के इलेक्ट्रिफिकेशन का असर सबसे पहले डीज़ल खपत पर दिखाई देता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2024-25 में रेलवे ने करीब 178 करोड़ लीटर डीज़ल की बचत की। 2016-17 की तुलना में यह करीब 62 प्रतिशत की गिरावट है।

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रेलवे जैसे विशाल नेटवर्क के लिए यह सिर्फ लागत घटने की बात नहीं है। इसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों के झटकों का असर भी कम होगा।

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बिजली से चलने वाली ट्रेनें डीज़ल इंजनों की तुलना में करीब 70 प्रतिशत अधिक किफायती मानी जाती हैं। इससे रेलवे की परिचालन लागत कम होती है और यात्रियों के लिए किराया भी अपेक्षाकृत सस्ता बना रहता है।

भारत में हर दिन करीब 2.6 करोड़ लोग ट्रेन से सफर करते हैं। ऐसे में रेलवे सिर्फ परिवहन का साधन नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की धड़कन है।

युद्ध, तेल और भारत की चिंता

पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव ने भारत की ऊर्जा निर्भरता को फिर चर्चा में ला दिया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर भारत के लगभग 40 प्रतिशत कच्चे तेल और 20 प्रतिशत एलएनजी आयात गुजरते हैं।

अगर इस रास्ते पर जहाजों की आवाजाही बाधित होती है तो तेल की कीमतों के साथ बीमा लागत और सप्लाई जोखिम भी तेजी से बढ़ सकते हैं। ऐसी स्थिति में रेल जैसे बड़े परिवहन तंत्र का बिजली पर जाना भारत के लिए एक तरह का सुरक्षा कवच बन सकता है।

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सौर ऊर्जा से चलती पटरियां

रेलवे का इलेक्ट्रिफिकेशन सिर्फ ग्रिड बिजली पर निर्भर नहीं है। पिछले दशक में रेलवे ने अपने नेटवर्क में सौर ऊर्जा को भी तेजी से जोड़ा है।

  • 2014 में रेलवे के पास सिर्फ 3.68 मेगावॉट सौर क्षमता थी।
  • नवंबर 2025 तक यह बढ़कर 898 मेगावॉट हो चुकी है।
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इनमें से लगभग 70 प्रतिशत बिजली सीधे ट्रेनों को चलाने में मदद करती है। आज देश भर में 2,600 से ज्यादा रेलवे स्टेशन और इमारतों पर सोलर सिस्टम लगे हुए हैं।

रेलवे ने 2030 तक नेट ज़ीरो कार्बन एमिटर बनने का लक्ष्य भी तय किया है। इसके लिए आने वाले वर्षों में रेलवे की कुल बिजली मांग 10 गीगावॉट से अधिक होने का अनुमान है, जिसमें बड़ा हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा से आने की उम्मीद है।

दुनिया के लिए एक उदाहरण

ब्रिटेन की संस्था Riding Sunbeams, जो रेल नेटवर्क में स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग पर काम करती है, पिछले कुछ वर्षों से भारत के रेलवे बदलाव पर नजर रख रही है।

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संस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी लियो मरे कहते हैं: “पूरे रेलवे नेटवर्क को इलेक्ट्रिफाई करके और 2030 तक नेट ज़ीरो का लक्ष्य तय करके भारत दुनिया के सामने एक साफ संदेश दे रहा है। यह दिखाता है कि बुनियादी ढांचे की रणनीति कैसे जलवायु महत्वाकांभा और ऊर्जा सुरक्षा दोनों को मजबूत कर सकती है।”

उनके मुताबिक बहुत कम देश इतने बड़े पैमाने और इतनी तेजी से यह बदलाव कर पाए हैं।

नीति और व्यवस्था की चुनौती

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना काफी नहीं है। इसके साथ नीति, तकनीक और वित्त का संतुलन भी जरूरी है। दिल्ली क्लाइमेट इनोवेशन वीक के दौरान आयोजित एक चर्चा में रेलवे बोर्ड के राहुल कपूर ने कहा: “नीति को अलग-अलग हिस्सों में नहीं देखा जा सकता।

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तकनीक, नीति ढांचा, मानव संसाधन, अर्थशास्त्र और राज्यों व केंद्र के बीच समन्वय – इन सबको साथ लेकर चलने वाली संरचित रणनीति जरूरी है। तभी नवाचार भी होगा और वह किफायती भी रहेगा।”

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एक शांत लेकिन बड़ा बदलाव करीब 70,000 किलोमीटर

लंबे रेलवे नेटवर्क के साथ भारत दुनिया के सबसे बड़े रेल तंत्रों में से एक है। इतनी विशाल प्रणाली का लगभग पूरी तरह बिजली पर चलना अपने आप में एक ऐतिहासिक बदलाव है।

ऊपर से देखने पर यह सिर्फ तारों और खंभों का नेटवर्क लगता है। लेकिन असल में यह भारत के ऊर्जा भविष्य की दिशा बदलने वाली कहानी है।

जहां दुनिया तेल के झटकों से जूझ रही है, वहीं भारत की पटरियों पर धीरे-धीरे एक नई आवाज़ सुनाई दे रही है। डीज़ल इंजन की घरघराहट कम हो रही है। और उसकी जगह ले रही है बिजली से चलती एक नई, शांत, लेकिन दूर तक जाने वाली यात्रा।

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