कोलकाता डेस्क | 21 नवंबर 2025 : भारत सरकार ने आज (21 नवंबर 2025) एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए चार नए लेबर कोड्स को पूरी तरह लागू कर दिया है।
यह आज़ादी के बाद श्रमिकों के लिए सबसे बड़ा सुधार माना जा रहा है, जिसमें 29 पुराने कानूनों को समाहित कर दिया गया है।
पुराने कानून ज्यादातर 1930–1950 के दशक के थे, जो आज की डिजिटल अर्थव्यवस्था, गिग वर्कर्स और माइग्रेंट लेबर के दौर में अप्रासंगिक हो चुके थे।

नए कोड्स का उद्देश्य :
- श्रमिकों की सुरक्षा बढ़ाना
- सामाजिक सुरक्षा का दायरा विस्तार करना
- कानूनी प्रक्रियाओं को सरल बनाना
- उद्योगों को निवेश के लिए आकर्षक बनाना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा: “ये सुधार न सिर्फ साधारण बदलाव हैं, बल्कि श्रमिक कल्याण के लिए एक बड़ा कदम हैं। ये आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण हैं और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को गति देंगे।”
श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मंडाविया ने इसे “भविष्य-तैयार कार्यबल” बनाने वाला बताया। वहीं ट्रेड यूनियंस ने विरोध जताया है, उनका कहना है कि इससे फिक्स्ड-टर्म जॉब्स बढ़ेंगे और स्थायी रोजगार के अधिकार कमजोर होंगे।
चार नए लेबर कोड्स: मुख्य विशेषताएं
- 1️⃣ कोड ऑन वेजेज (2019)
– न्यूनतम वेतन की一 परिभाषा (National Floor Wage लागू)।
– सभी कर्मचारियों को समय पर वेतन भुगतान सुनिश्चित।
– बोनस और ग्रेच्युटी के नियमों में सुधार।
– हर वर्कर को लिखित अपॉइंटमेंट लेटर देना अनिवार्य।
– वेतन से जुड़ी शिकायतों के लिए सरल तंत्र।
- 2️⃣ इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड (2020)
– स्ट्राइक से पहले 14 दिन का नोटिस अनिवार्य।
– ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आसान।
– 300 से अधिक कर्मचारियों वाले उद्योगों में छंटनी/बंद करने के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी।
– फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयी को स्थायी कर्मचारियों जैसी सुविधाएँ (PF, ग्रेच्युटी आदि)।
– विवाद निपटान के लिए औद्योगिक ट्रिब्यूनल की भूमिका मजबूत।
- 3️⃣ कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी (2020)
– पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स (जैसे उबर, स्विगी) को कवरेज।
– PF, पेंशन, इंश्योरेंस को पोर्टेबल बनाया गया (राज्यों के बीच ट्रांसफर योग्य)।
– ESIC अब 1 वर्कर वाले हेजर्डस यूनिट्स में भी लागू।
– माइग्रेंट वर्कर्स के लिए बेनेफिट्स पोर्टेबल।
– सोशल सिक्योरिटी कवरेज 2015 के 19% से बढ़कर 2025 में 64%।
- 4️⃣ ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस (OSHWC) कोड (2020)
– 500+ कर्मचारियों वाले उद्योगों में सेफ्टी कमिटी अनिवार्य।
– सभी कर्मचारियों के लिए वार्षिक हेल्थ चेक-अप और मेडिकल सुविधा।
– महिलाओं और ट्रांसजेंडर कर्मचारियों के लिए जेंडर-न्यूट्रल नियम।
– नाइट शिफ्ट में महिलाओं के लिए सुरक्षा प्रावधान।
– इंस्पेक्टर अब ‘फेसिलिटेटर’ की भूमिका में, यानी मार्गदर्शन और निगरानी दोनों।
- 👉 इन चारों कोड्स ने मिलकर 29 पुराने कानूनों को समाहित कर दिया है।
- 👉 उद्देश्य है श्रमिकों की सुरक्षा + उद्योगों के लिए सरलता + गिग और असंगठित क्षेत्र को कवरेज।
(स्रोत: श्रम मंत्रालय, 21 नवंबर 2025)
किन लोगों को फायदा?
- गिग वर्कर्स: उबर, स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म्स पर काम करने वालों को इंश्योरेंस और PF।
- महिलाएं: क्रेच सुविधा, नाइट शिफ्ट्स में सुरक्षा, मैटरनिटी बेनिफिट्स में विस्तार।
- माइग्रेंट्स: बेनिफिट्स पोर्टेबल, राज्यों के बीच ट्रांसफर आसान।
- छोटे उद्योग: कंप्लायंस सरल, सिंगल-विंडो रजिस्ट्रेशन, 5 साल वैलिड लाइसेंस।
- डॉक वर्कर्स: फॉर्मल रिकग्निशन और सोशल सिक्योरिटी
- न्यूनतम वेतन: नेशनल फ्लोर वेज, राज्यों द्वारा तय।
विशेषज्ञों का कहना है कि इससे रोजगार सृजन बढ़ेगा और उत्पादकता में सुधार होगा, हालांकि छोटे उद्योगों पर शुरुआती बोझ पड़ सकता है।
विरोध और चुनौतियां
- AITUC और अन्य ट्रेड यूनियंस का कहना है कि ये कोड्स स्थायी रोजगार को कमजोर करेंगे।
- कांग्रेस ने इसे “श्रमिक-विरोधी” बताया।
- सरकार का दावा है कि सभी स्टेकहोल्डर्स से परामर्श के बाद ही इन्हें लागू किया गया है।
- राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी क्योंकि नियमों का नोटिफिकेशन वहीं से होगा।
भविष्य का प्रभाव: आंकड़ों में
- सोशल सिक्योरिटी कवरेज: 2015 में 19% से 2025 में 64%, लक्ष्य 80%+।
- कंप्लायंस: 2,000+ पेज के पुराने कानून अब 4 कोड्स में सिमट गए।
- रोजगार: अर्थशास्त्रियों के अनुसार, लंबे समय में 1–2 करोड़ नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं।
निष्कर्ष
ये रिफॉर्म्स आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत 2047 के विजन का हिस्सा हैं। लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नए नियमों का जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन कितना प्रभावी होता है।
क्या ये सुधार श्रमिकों को मजबूत बनाएंगे या उद्योगों को? समय ही इसका उत्तर देगा।
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