नई दिल्ली | 27 नवंबर 2025 : भारत की स्टील यात्रा एक अहम मोड़ पर खड़ी है। सरकार का लक्ष्य है कि देश की स्टील क्षमता को 300 मिलियन टन तक पहुँचाया जाए। लेकिन नई रिपोर्टें संकेत दे रही हैं कि आज लिए गए फैसले अगले 30–40 साल के उत्सर्जन को तय करेंगे। सवाल बड़ा है: क्या भारत बिना मजबूत सार्वजनिक फंडिंग के ग्रीन स्टील की राह पर चल पाएगा?
🌟 IEEFA रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
- 92% नई स्टील क्षमता अभी बनी नहीं है — यानी तकनीक चुनने का सही समय।
- अगर कोयला आधारित ब्लास्ट फर्नेस चुने गए तो 2060–70 तक भारी कार्बन लॉक-इन होगा।
- ग्रीन स्टील की लागत वैश्विक स्तर पर बहुत विविध है:
- एक टन CO₂ कम करने में 110 डॉलर से 1168 डॉलर तक खर्च।
- सिर्फ कार्बन प्राइसिंग पर भरोसा करना संक्रमण के लिए पर्याप्त नहीं।
IEEFA की नई रिपोर्ट में सामने आई है. रिपोर्ट साफ कहती है कि भारत के सामने अवसर भी है और चुनौती भी. अवसर यह कि देश की 92% नई स्टील क्षमता अभी बनी ही नहीं है.
चुनौती यह कि अगर ये सारी क्षमता पुराने, कोयला आधारित ब्लास्ट फर्नेस पर चली गई तो 2060–70 तक भारी कार्बन लॉक इन हो जाएगा.

⚖️ विशेषज्ञों की चेतावनी
- सौरभ त्रिवेदी (IEEFA): “एक बार स्टील प्लांट बन जाए तो वह तीन–चार दशक चलता है। तकनीक की गलती आने वाली पीढ़ियों पर भारी पड़ेगी।”
- मीनाक्षी विश्वनाथन (IEEFA): “बाज़ार अब सिर्फ दिखावे वाला ‘ग्रीन’ नहीं खरीदता। असली मांग उसी स्टील की है जिसकी पूरी वैल्यू चेन स्वच्छ हो।”
IEEFA के सस्टेनेबल फाइनेंस स्पेशलिस्ट सौरभ त्रिवेदी कहते हैं कि एक बार स्टील प्लांट बन जाए, तो वह तीन चार दशक चलता है. इसलिए तकनीक की गलती आने वाली पीढ़ियों पर भारी पड़ेगी.
यह चेतावनी हल्की नहीं है क्योंकि भारत की स्टील खपत लगातार बढ़ रही है और साथ में ऑस्ट्रेलिया से आयात होने वाला मेट कोल भी.
🌍 भारत सरकार की पहलें
- नेशनल मिशन फॉर सस्टेनेबल स्टील: 5000 करोड़ रुपये का संभावित आउटले।
- प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव
- कन्सेशनल लोन
- रिस्क गारंटी
- ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट: 25–37% स्टील की खरीद कम कार्बन वाली होगी।
- कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (2026): उत्सर्जन की सख्त सीमाएँ तय होंगी।
💡 रिपोर्ट के सुझाव
- क्रेडिट गारंटी सुविधा: हर एक रुपये पर ढाई रुपये तक निजी पूंजी जुट सकती है।
- नीलामी आधारित कॉन्ट्रैक्ट्स फॉर डिफरेंस: खरीदार ग्रीन स्टील के लिए कितनी प्रीमियम कीमत देंगे, यह तय होगा।
- MSME स्टील यूनिट्स के लिए प्रोजेक्ट प्रिपरेशन सुविधा: ताकि छोटे उद्योग पीछे न रह जाएँ।
IEEFA की सह-लेखिका मीनाक्षी विश्वनाथन कहती हैं कि बाज़ार अब सिर्फ दिखावे वाला “ग्रीन” नहीं खरीदता. असली डिमांड केवल उसी स्टील की है जिसकी पूरी वैल्यू चेन स्वच्छ हो. ऊर्जा से लेकर हाइड्रोजन और फिर स्टील तक.
भारत सरकार अपने स्तर पर नेशनल मिशन फॉर सस्टेनेबल स्टील तैयार कर रही है, जिसका 5000 करोड़ रुपये का आउटले हो सकता है. उम्मीद है कि इसमें प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव, कन्सेशनल लोन और रिस्क गारंटी जैसे उपकरण होंगे.
सरकार ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट पर भी काम कर रही है जिसमें 25–37% स्टील की खरीद कम कार्बन वाली होगी. हालांकि 2024 में वित्त मंत्रालय ने ग्रीन स्टील की केंद्रीकृत खरीद एजेंसी बनाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था.
🟥 निष्कर्ष
भारत की ग्रीन स्टील यात्रा सिर्फ पैसे की नहीं, समय की भी बात है। दुनिया तेजी से बदल रही है, खरीदार बदल रहे हैं और तकनीक रफ्तार पकड़ रही है। अगर भारत अभी फैसले ले ले, तो वह भविष्य की स्टील अर्थव्यवस्था का नेता बन सकता है। नहीं तो अगले 40 साल की भारी कार्बन लागत देश को पीछे धकेल देगी।
रिपोर्ट का सबसे अहम संदेश यह है कि निजी क्षेत्र अभी भी ग्रीन स्टील में भारी निवेश करने से हिचक रहा है. तकनीक जटिल है, प्लांट बड़े हैं, लागत भारी है और रिटर्न आने में समय लगता है. ऐसे में सार्वजनिक पूंजी के बिना शुरुआत आगे बढ़ ही नहीं सकती.
IEEFA का सुझाव साफ है. अगर भारत को अपने स्टील सेक्टर को भविष्य के लिए तैयार करना है तो उसे तीन बड़े कदम तुरंत उठाने होंगे.
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