नई दिल्ली | 12 नवंबर 2025 — भारत की सीमेंट इंडस्ट्री अगले तीन वित्त वर्षों में 160–170 मिलियन टन की क्षमता वृद्धि की ओर बढ़ रही है, जो कि FY23–FY25 में हुई 95 मिलियन टन वृद्धि से कहीं अधिक है।
यह जानकारी क्रिसिल रेटिंग्स द्वारा बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में दी गई, जिसमें उच्च मांग, बेहतर क्षमता उपयोग और ब्राउनफील्ड विस्तार को इस वृद्धि के प्रमुख कारण बताया गया है।
📊 प्रमुख आंकड़े और अनुमान
| पैरामीटर | विवरण |
|---|---|
| अनुमानित क्षमता वृद्धि | 160–170 मिलियन टन (FY26–FY28) |
| पिछली क्षमता वृद्धि | 95 मिलियन टन (FY23–FY25) |
| पूंजीगत व्यय अनुमान | ₹1.2 लाख करोड़ (50% अधिक) |
| क्षमता उपयोग | 70% (FY25), दशकीय औसत: 65% |
| उत्पादन वृद्धि दर | 9.5% CAGR (पिछले 3 वर्षों में) |
| ब्राउनफील्ड विस्तार का हिस्सा | 65% |
रिपोर्ट में बताया गया कि तेज विस्तार के कारण अगले तीन वर्षों में इस क्षेत्र में पूंजीगत व्यय 1.2 लाख करोड़ रुपए रहने का अनुमान है, जो कि पिछले तीन वित्त वर्ष में किए गए पूंजीगत व्यय की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक है।
ज्यादातर हिस्सा ब्राउनफिल्ड के कारण विस्तार में जोखिम कम है और इसमें से ज्यादातर हिस्से को अच्छे ऑपरेटिंग कैश फ्लो से फंड किया जाएगा।
🧱 विस्तार के पीछे की वजहें
- बुनियादी ढांचा और आवास क्षेत्र की मांग
- ब्राउनफील्ड परियोजनाओं से
- निर्माण समय कम
- भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता सीमित
- पूंजी लागत और जोखिम कम
- अच्छा ऑपरेटिंग कैश फ्लो से फंडिंग संभव
💰 वित्तीय स्थिरता और क्रेडिट प्रोफाइल
- नेट डेट टू EBITDA अनुपात स्थिर रहने की उम्मीद
- क्रेडिट प्रोफाइल पर सकारात्मक प्रभाव
- 17 प्रमुख सीमेंट निर्माताओं के विश्लेषण पर आधारित रिपोर्ट
- जिनकी 668 मिलियन टन स्थापित क्षमता में 85% हिस्सेदारी है
यह रिपोर्ट 17 सीमेंट निर्माताओं के विश्लेषण पर आधारित है, जिनकी देश में 31 मार्च, 2025 तक स्थापित 668 मीट्रिक टन क्षमता में लगभग 85 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

- 📈 उद्योग विशेषज्ञ की राय
“FY26–FY28 में सीमेंट निर्माताओं को सालाना 30–40 मिलियन टन की वृद्धिशील मांग की उम्मीद है।” — आनंद कुलकर्णी, निदेशक, क्रिसिल रेटिंग्स
रिपोर्ट के अनुसार, क्षमता वृद्धि तो पर्याप्त है, लेकिन इससे जुड़े जोखिम इस कारण से आंशिक रूप से कम हो जाते हैं कि लगभग 65 प्रतिशत क्षमता वृद्धि ब्राउनफील्ड परियोजनाओं के माध्यम से की जाएगी,
जिनमें निर्माण अवधि कम होती है और भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता सीमित होती है, जिसके परिणामस्वरूप पूंजी लागत कम होती है और कार्यान्वयन चुनौतियां भी कम होती हैं।
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