कोलकाता। साहित्य अकादेमी ने ‘वंदे मातरम्’ के 150वें वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित समारोहों के अंतर्गत भारतीय संग्रहालय, कोलकाता; पूर्वी क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र (ईज़ेडसीसी), कोलकाता; द संस्कृत कॉलेज एंड यूनिवर्सिटी, कोलकाता; शांतिनिकेतन साहित्यपथ, कोलकाता तथा अखिल भारतीय साहित्य परिषद के सहयोग से ‘भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में वंदे मातरम् की पहचान’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया।
संगोष्ठी में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में ‘वंदे मातरम्’ की पहचान, उसके ऐतिहासिक विकास तथा उसकी निरंतर सांस्कृतिक और राष्ट्रीय प्रासंगिकता पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया।
उद्घाटन सत्र में साहित्य अकादेमी के सचिव वरुण गुलाटी ने अपने स्वागत वक्तव्य में संगोष्ठी की पृष्ठभूमि और उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ केवल एक साहित्यिक रचना के स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय योगदान को नए संदर्भों में समझने का अवसर भी है।
उन्होंने कहा कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की 1875 में रचित यह कविता कालांतर में एक साहित्यिक कृति से विकसित होकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक सशक्त और प्रेरक उद्घोष बन गई। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देश के विविध समूहों और विचारधाराओं को एक साझा राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने में ‘वंदे मातरम्’ की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया तथा इसे भारतीय साहित्य, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक चेतना को जोड़ने वाली एक सशक्त कड़ी बताया।
मुख्य अतिथि नंदिनी साहू के संबोधन ने उद्घाटन सत्र को विशेष आयाम प्रदान किया। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ के 150वें वर्ष के इस स्मरणोत्सव को व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन तथा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अनुगूंज से जोड़ते हुए इस अवसर के व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व पर प्रकाश डाला।
विशिष्ट अतिथि, भारतीय संग्रहालय के निदेशक सयान भट्टाचार्य ने भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और उसकी समुचित व्याख्या के महत्व पर बल देते हुए ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक यात्रा पर विचार व्यक्त किए।
उन्होंने साहित्य, इतिहास और सार्वजनिक स्मृति को जोड़ने में भारतीय संग्रहालय की भूमिका का उल्लेख किया तथा ऐसे विद्वत्तापूर्ण संवादों का स्वागत किया, जो समकालीन संदर्भों में इस गीत के राष्ट्रीय और सांस्कृतिक महत्व को समझने में सहायक हों।
उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय पहल ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ प्रत्यक्ष रूप से ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दर्शन को प्रतिबिंबित करती है और आधुनिक भारत में उसकी भावना के संरचनात्मक विस्तार के रूप में देखी जा सकती है।
विशिष्ट अतिथि, पूर्वी क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक आशीष गिरी ने भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को सार्थक संवाद के माध्यम से एक-दूसरे के निकट लाने में सांस्कृतिक संस्थाओं की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ को साहित्यिक और ऐतिहासिक चिंतन का एक महत्वपूर्ण विषय बताते हुए संगोष्ठी में विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों से आए प्रतिभागियों की उपस्थिति का स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ उस गहन राष्ट्रभावना का प्रतीक है, जिस पर बंगाल को विशेष गर्व है। यह एक ऐसी कालजयी सांस्कृतिक धरोहर है, जो हम सभी को एकता के सूत्र में बांधती है और राष्ट्र के ऐतिहासिक गौरव को पुनर्स्मरण तथा प्रतिष्ठित करने की प्रेरणा देती है।
साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में ‘वंदे मातरम्’ को साहित्यिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टियों से समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यह रचना भारत की सांस्कृतिक स्मृति और राष्ट्रीय चेतना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके साथ निरंतर एवं गंभीर विद्वत्तापूर्ण संवाद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ एक कालजयी कृति है, जो कविता की सीमाओं से आगे बढ़कर हमारे राष्ट्र का एक सजीव और प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत करती है।
भारतीय भाषाओं में अनूदित यह रचना जितनी अधिक पढ़ी और समझी जाती है, उतनी ही उसकी गहराई उद्घाटित होती जाती है। आज यह हमारे सांस्कृतिक संस्कारों और चेतना में गहराई से रची-बसी है और एकता के प्रतीक के रूप में इसे सदैव अपने हृदय में संजोकर रखना चाहिए।
शांतिनिकेतन साहित्यपथ के सुदीप बसु ने कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन किया। उद्घाटन समारोह में कोलकाता के शिंजन नृत्यालय द्वारा ‘वंदे मातरम्’ पर आधारित ओडिसी नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति भी दी गई, जिसने आयोजन को भारतीय शास्त्रीय प्रदर्शन कला का एक विशिष्ट आयाम प्रदान किया।
संगोष्ठी के पहले तीन सत्रों की अध्यक्षता क्रमशः वरुण गुलाटी, नीलम राठी और नारायण नायक ने की। इन सत्रों में हितेश शंकर, पवन पुत्र बादल, अखिलेश कुमार शर्मा (मिजोरम), बीना देबबर्मा (त्रिपुरा), चुके भूटिया (सिक्किम), दिनेश कुमार चौबे (मेघालय), सोमा बंद्योपाध्याय (पश्चिम बंगाल) तथा तारो सिंडिक (अरुणाचल प्रदेश) ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने साहित्यिक, ऐतिहासिक और क्षेत्रीय दृष्टिकोणों से ‘वंदे मातरम्’ पर विचार व्यक्त करते हुए भारत के राष्ट्रीय आंदोलन और सांस्कृतिक चेतना में इसके स्थान और महत्व का विश्लेषण किया।
चौथे और पांचवें सत्र की अध्यक्षता क्रमशः साधना बलवटे और शशांक शर्मा ने की। इन सत्रों में प्रभात कुमार करन (झारखंड), प्रेम शंकर त्रिपाठी (पश्चिम बंगाल), संजय कुमार सिंह ‘सागर’ (बिहार), अखिलेश कुमार शंखधर (मणिपुर), प्रणति तालुकदार (असम), सोनम वांग्मू (अरुणाचल प्रदेश) तथा सौरव कुमार महांता (ओडिशा) ने अपने विचार और शोधपत्र प्रस्तुत किए।
इन प्रस्तुतियों ने ‘वंदे मातरम्’ संबंधी विमर्श को भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से और अधिक व्यापक बनाया तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अनुभवों के माध्यम से संगोष्ठी के राष्ट्रीय स्वरूप को सुदृढ़ किया।
दिन का समापन बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ पर आधारित एक विशेष नाट्य प्रस्तुति से हुआ। इस प्रस्तुति का आयोजन पूर्व पश्चिम, कोलकाता तथा पूर्वाश्री, ईज़ेडसीसी, कोलकाता द्वारा किया गया।
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