निशान्त, Climate कहानी, कोलकाता: कई सालों तक जलवायु परिवर्तन को भविष्य का संकट माना जाता रहा, लेकिन अब वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि वह भविष्य हमारे वर्तमान में आ चुका है।
Indicators of Global Climate Change (IGCC) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में मानव गतिविधियों की वजह से वैश्विक तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में 1.37 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर मौजूदा उत्सर्जन की दर जारी रही, तो दुनिया लगभग चार साल के भीतर 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार कर सकती है — यही वह सीमा है जिसे दुनिया ने जलवायु परिवर्तन के सबसे खतरनाक प्रभावों से बचने के लिए महत्वपूर्ण लक्ष्य माना था।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
रिपोर्ट 17 देशों की 56 संस्थाओं से जुड़े 70 से अधिक वैज्ञानिकों (जिनमें IPCC से जुड़े प्रमुख विशेषज्ञ भी शामिल हैं) द्वारा तैयार की गई है। इसके मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:
- वैश्विक तापमान में तेज बढ़ोतरी 2025 में मानव-जनित गर्मी बढ़ने की दर लगभग 0.27 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक बनी हुई है। पिछले दशक की लगभग पूरी गर्मी इंसानी गतिविधियों की वजह से हुई है।
- अर्थ एनर्जी इम्बैलेंस (पृथ्वी का ऊर्जा असंतुलन) पृथ्वी जितनी ऊर्जा अंतरिक्ष में वापस भेजती है, उससे कहीं अधिक ऊर्जा अब अपने भीतर रोक रही है। यह अतिरिक्त गर्मी महासागरों, वायुमंडल, बर्फ की चादर और जमीन में जमा हो रही है। प्रोफेसर पियर्स फॉर्स्टर (लीड्स विश्वविद्यालय, Priestley Centre for Climate Futures) कहते हैं:
“यह सूचकांक जलवायु परिवर्तन की रफ्तार बताता है। पृथ्वी का ऊर्जा असंतुलन अब रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है और हाल के दशकों में यह लगभग दोगुना हो गया है।”
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का रिकॉर्ड स्तर 2024 में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 56.8 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य तक पहुंच गया — अब तक का सबसे ऊंचा स्तर। इसका सबसे बड़ा कारण जीवाश्म ईंधनों (कोयला, तेल, गैस) का लगातार इस्तेमाल है।
- समुद्र स्तर में बढ़ोतरी 2025 तक वैश्विक समुद्र स्तर 1901 की तुलना में 23 सेंटीमीटर बढ़ चुका है। समुद्र स्तर बढ़ने की रफ्तार भी तेज हो रही है। डॉ. एमी स्लांगेन (Royal Netherlands Institute for Sea Research) कहती हैं:
“यह बदलाव छोटा लग सकता है, लेकिन इससे दुनिया के निचले तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है और लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है।”
- समुद्री ऊष्मा लहरें (Marine Heatwaves) रिपोर्ट में पहली बार समुद्री ऊष्मा लहरों को शामिल किया गया है। 2025 में दुनिया ने 65 दिन ऐसे देखे जब समुद्र में अत्यधिक गर्मी की स्थिति बनी रही। 1991 के बाद से समुद्री ऊष्मा लहरों वाले दिनों की संख्या तीन गुना से अधिक बढ़ चुकी है। प्रोफेसर जून-यी ली (पुसान नेशनल यूनिवर्सिटी) कहती हैं:
“इसका असर समुद्री जीवन, मत्स्य उत्पादन, तटीय अर्थव्यवस्थाओं और मौसम प्रणालियों पर पड़ रहा है।”
- शेष कार्बन बजट 1.5 डिग्री सीमा के भीतर रहने के लिए शेष कार्बन बजट केवल 130 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड रह गया है, जो मौजूदा उत्सर्जन दर पर लगभग तीन वर्षों में समाप्त हो सकता है।
विशेषज्ञों की चिंता
डॉ. सामंथा बर्गेस (Copernicus Climate Change Service) कहती हैं:
“पिछले दशक की लगभग पूरी गर्मी इंसानों द्वारा पैदा की गई है। इसके असर दुनिया भर में लोगों की आजीविका और पारिस्थितिक तंत्र पर दिखाई देने लगे हैं और तापमान बढ़ने के साथ ये प्रभाव और तेज होंगे।”
डॉ. मैट पामर (ब्रिटेन के मौसम विभाग) कहते हैं:
“मामला बेहद सीधा है। हम पहले से कहीं ज़्यादा ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में छोड़ रहे हैं। इससे वातावरण अधिक गर्मी रोक रहा है और पृथ्वी का संतुलन बिगड़ रहा है।”
भारत और वैश्विक संदर्भ
भारत जैसे विकासशील देशों में यह संकट और गंभीर है, जहां बढ़ती गर्मी, अनियमित मानसून, समुद्र स्तर बढ़ोतरी और समुद्री ऊष्मा लहरें कृषि, जल सुरक्षा और तटीय इलाकों को प्रभावित कर रही हैं।
रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि अगर उत्सर्जन कम नहीं किया गया, तो 1.5 डिग्री सीमा पार होने के बाद अपरिवर्तनीय जलवायु परिवर्तन की स्थिति बन सकती है।
निष्कर्ष
यह रिपोर्ट सिर्फ तापमान के आंकड़ों की नहीं, बल्कि पृथ्वी की तेजी से बदलती स्थिति की है। अब सवाल यह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन होगा या नहीं — सवाल यह है कि हम इसे कितनी तेजी से नियंत्रित कर पाएंगे।
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