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हूल दिवस : संथाल हूल (विद्रोह) के 170 सालों पर विशेष

सामाजिक न्याय और समानता के लिए संथाल हूल को सैल्यूट

केशव भट्टड़। संथाल विद्रोह, जिसे संथाल हूल के नाम से भी जाना जाता है, 1855-1856 में भारत के पूर्वी क्षेत्रों, विशेष रूप से वर्तमान झारखंड और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में हुआ था। यह विद्रोह संथाल जनजाति द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ किया गया था। इसके प्रमुख नेता सिदो के साथ उनके भाई कान्हू, चाँद और भैरव थे और साथ थी दोनों बहनें फूलों और झानू। इस विद्रोह में फूलो और झानो ने अपने भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी और सांथाल समुदाय की महिलाओं को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। हूल में जंगल-नदी-पहाड़ों के पार सूचनाओं का आदान-प्रदान, भोजन और हथियारों की पूर्ति के साथ गुप्तचरी के लिए इन्होंने टोली का नेतृत्व किया। इस विद्रोह का नारा था – ‘संथाल राज करेगा, अंग्रेज भागेगा।’

यह ऐतिहासिक घटना न केवल संथाल समुदाय के संघर्ष को दर्शाती है, बल्कि आज के संदर्भ में भी सामाजिक न्याय और समानता के मुद्दों पर प्रकाश डालती है। ब्रिटिश शासन ने संथालों पर भारी भूमि कर लगाया, जिससे वे आर्थिक रूप से दबाव में आ गए। उनकी पारंपरिक आजीविका पर संकट मंडराने लगा। संथालों को उनकी पुश्तैनी जमीनों से बेदखल किया गया और जमींदारों व साहूकारों के शोषण का शिकार बनाया गया।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने व्यापारिक मुनाफे के लिए जंगल की जमीन का दोहन करना शुरू किया, उसके लिए नई नीतियां लागू की। ब्रिटिश नीतियों से संथाल अपनी जमीन से बेदखल होकर विस्थापित होने को मजबूर होने लगे। इन नई नीतियों से उनकी पारंपरिक जीवनशैली और संस्कृति पर, उनके आस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया। आर्थिक शोषण, सामाजिक और सांस्कृतिक दमन, प्रशासनिक अत्याचार से त्रस्त संथालों के लिए बगावत, संघर्ष, हूल जरूरी हो चुका था।

ये कारण आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि कई समुदाय अब भी भूमि अधिकारों और आर्थिक शोषण के खिलाफ लड़ रहे हैं। सांस्कृतिक विविधता पर हमले हो रहे हैं और अन्यान्य जीवन शैलियों को लेकर नाकारात्मक धारणाओं को राजनीतिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है। संथाल विद्रोह की शुरुआत 30 जून 1855 को हुई, जब सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू ने विद्रोह का आह्वान किया। संथालों ने हथियार उठाए और ब्रिटिश शासन के खिलाफ बगावत की।

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सिदो, कान्हू, चांद और भैरव चारो मुर्मू भाइयों ने संथाल समुदाय को एकजुट किया और विद्रोह की नींव रखी। पिरपैंती और बरहेट की लड़ाइयाँ इस विद्रोह के प्रमुख संघर्ष थे। विश्व के सबसे ताकतवर साम्राज्य के विरुद्ध भारत के आदिवासियों ने बगावत का बिगुल फूंका। यह कोई छोटी बात नहीं थी, लड़ाई दीये और तूफान की थी। संथालों ने जंगलों और पहाड़ियों का उपयोग करते हुए गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई, जिससे ब्रिटिश सेना को उन्हें दबाने में कठिनाई हुई। कई स्थानों पर ब्रिटिश शासन को खदेड़ दिया गया और संथाली जनसमुदाय ने अपनी व्यवस्था कायम की।

यह विद्रोह आदिवासी समुदायों के संगठित प्रतिरोध का पहला बड़ा उदाहरण था। इसने अन्य आदिवासी आंदोलनों को प्रेरित किया। इसने ब्रिटिश शासन की शोषणकारी नीतियों को उजागर किया और उनके खिलाफ व्यापक असंतोष को सामने लाने में सफल रहा। हूल विद्रोह ने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जनाक्रोश को बढ़ाया।

ब्रिटिश सेना ने कठोर कदम उठाए और 1856 में विद्रोह कुचल दिया गया। लेकिन इस विद्रोह ने आज़ादी की लौ को भारतीयों के हृदय में प्रज्ज्वलित कर दिया। इसके ठीक अगले साल ही 1857 में अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह भड़क उठा। परिणाम स्वरूप कंपनी राज्य का अंत हुआ और भारत का नियंत्रण सीधे ब्रिटिश राज ने अपने अधीन कर लिया। तब तक जनता सामूहिक संघर्ष की ताकत से परिचित हो उठी थी। आजादी का रास्ता, बदलाव का रास्ता संथाल विद्रोह ने दिखा दिया था। सिदो और कान्हू द्वारा प्रकाशित डगर आज भी दिलों में शासकीय अन्याय के विरुद्ध हिम्मत देती हुई सामूहिक प्रतिरोध की ताकत का पहला कदम बनकर एक आदर्श के रूप में दिलोदिमाग को प्रेरित करती है।

सिदो और कान्हू ने अपने संदेश को फैलाने के लिए “साल के पत्तों” का उपयोग किया, जो संथाल समुदाय में संदेश भेजने का पारंपरिक तरीका था। वीर मुर्मू-बहनों फूलों और झानो के नेतृत्व में संदेश वाहकों ने इसे अंजाम दिया। इस विद्रोह में फूलो और झानो ने अपने भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी और सांथाल समुदाय की महिलाओं को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। सहायक की भूमिका से आगे बढ़कर इन्होंने युद्ध में पूरी सक्रियता दिखाई और अंधेरी रात को हुई एक झड़प में 21 ब्रिटिश सैनिको को इन्होंने मार गिराया।

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यह सब कुछ असाधारण था, और संथाल समुदाय आज भी उन्हें गौरव के साथ याद करता है। फूलों और झानो ने इस विद्रोह में पुरुषों के साथ महिलाओं की भागीदारी का नया अध्याय जोड़ा। उन्होंने कर दिखाया कि महिलाएं भी स्वतंत्रता और न्याय की लड़ाई में बराबर का हिस्सा ले सकती हैं। भारतीय इतिहास में यह एक अनोखा उदाहरण है।

हूल विद्रोह को भारत में पहला “किसान विद्रोह” भी माना जाता है, क्योंकि यह मुख्य रूप से भूमि और आर्थिक शोषण के खिलाफ था। संथाल विद्रोह के कई दूरगामी परिणाम हुए। विद्रोह के दमन में कई संथाल मारे गए और उनके गाँव नष्ट हो गए। इस विद्रोह ने ब्रिटिश शासन को संथालों की समस्याओं पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया। संथाल परगना जिला बनाया गया और उन्हें कुछ अधिकार प्रदान किए गए। संथाल परगना टेनेंसी एक्ट (SPT Act) लागू किया गया, जो संथालों की जमीनों की रक्षा करता था। संथाल विद्रोह ने एक मिसाल कायम की।

संथाल विद्रोह भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है। यह विद्रोह न केवल संथाल समुदाय के लिए, बल्कि पूरे भारत के लिए प्रेरणास्रोत बना। इस विद्रोह को 1857 की क्रांति की पूर्व पीठिका कह सकते हैं। मुर्मू भाइयों को भारत के पहले शहीदों में सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिए। संथाल हूल के नेता मुर्मू भाइयों – 30 वर्षीय सिदो मुर्मू और 25 वर्षीय कान्हू मुर्मू – को 26 जुलाई 1855 को अंग्रेजो ने भोगनाडीह में फांसी दे दी। भोगनाडीह वर्तमान समय में झारखंड राज्य में स्थित है। इससे पहले 10 जुलाई 1855 को बरहेट की भीषण लड़ाई में ब्रिटिश सेना से लड़ते हुए 20 वर्षीय जुड़वा भाई चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू ब्रिटिश सेना की गोलियों से शहीद हुए थे।

आज भी हर साल 30 जून को हूल दिवस के रूप में मनाकर इस ऐतिहासिक हूल को झारखंड और संथाल समुदाय में गर्व के साथ याद किया जाता है। यह विद्रोह आज के समय में हमें सामाजिक न्याय, भूमि-अधिकार और समानता के लिए संघर्ष की याद दिलाता है। संथाल विद्रोह यह भी सिखाता है कि एकता और सामूहिक प्रयास से बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। इतिहास से सीखकर हम वर्तमान और भविष्य को बेहतर बना सकते हैं।

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संथाल हूल (विद्रोह) भारतीय इतिहास में एक ऐसी घटना है जो हमें शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की ताकत देती है। संथाल हूल सिखाता है कि सामूहिक संघर्ष नीतिगत बदलाव ला सकते हैं। वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में संथाल विद्रोह ज्यादा प्रासंगिक हो उठता है।
जयहिंद!

केशव भट्टड़
लेखक

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