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श्राद्ध कैसे निकाले

वाराणसी। वैसे श्राद्ध करने की मुख्य रूप से दो प्रक्रियाएं हैं : 1. एक पिंडदान और 2. दूसरा ब्राह्मण भोजन। यदि एक से अधिक पुत्र हो और अलग-अलग रहते हैं तो उन सब को श्राद्ध कर्म करना चाहिए। गरुड़ पुराण के अनुसार पित्रों को प्रसन्न करने के लिए पंचबलि का विधान बताया गया है। जिसका विशेष महत्व है।

पंचबलि का मतलब शास्त्रों में पांच तरह की बलि बताई गई हैं, जिसका श्राद्ध में विशेष महत्व है। गौ बलि, श्वान बलि, काक बलि, देवादि बलि, पिपीलिका बलि। यहां बल‍ि से तात्पर्य किसी पशु या पक्षी की हत्या से नहीं है, बल्कि श्राद्ध के दिन इन सब को भोजन खिलाना चाहिए। इसे ही बलि कहा जाता है।

प्रतिदिन या श्राद्ध वाले दिन खीर या चावल में शक्कर डालकर सामग्री बनाकर तैयार कर लें। उसके बाद गाय के गोबर के कंडे को जलाकर पूर्ण प्रज्वलित कर लें। उक्त प्रज्वलित कंडे को शुद्ध स्थान में किसी बर्तन में रखकर बने हुए भोजन का भोग पितरों के निमित लगाए। इसके नजदीक (पास में ही) जल का भरा हुआ एक गिलास रख दें अथवा लोटा रख दें।

भोग पकने के बाद इस जल से प्रज्वलित कंडे के चारों और 3 बार जल को घुमाकर छिड़े दें। भोजन में से सर्वप्रथम गाय, काले कुत्ते, चींटियों और कौए के लिए ग्रास अलग से निकालकर उन्हें खिला दें। इसके पश्चात ब्राह्मण को भोजन कराएं पश्चात ब्राह्मणों को यथायोग्य दक्षिणा दें।फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें।

पिंडदान या श्राद्ध करते समय सफेद या पीले वस्त्र ही धारण करें। जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं, वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं।

श्राद्ध कर्म करते समय दिया हुआ मंत्र 3 बार पढ़ना चाहिए यह मंत्र ब्रह्मा जी द्वारा रचित आयु, आरोग्य, धन, लक्ष्मी प्रदान करने वाला अमृत मंत्र है : मंत्र:
“देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत।।” ऊं पितृ देवताभ्यो नमः

श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। या सम्भंव नही है तो सूर्योदय से लेकर दिन के 12 बजकर 24 मिनट की अवधि के मध्य ही श्राद्ध करें। प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। हमारे धर्म-ग्रंथों में पितरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है।

‘सिद्धांत शिरोमणि’ ग्रंथ के अनुसार चंद्रमा की ऊर्ध्व कक्षा में पितर लोक है जहां पितर रहते हैं। श्राद्ध की संपूर्ण प्रक्रिया दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके की जाये तो अच्छा है, क्योंकि पितर-लोक को दक्षिण दिशा में बताया गया है।

इस अवसर पर तुलसी दल का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। गया, पुष्कर, प्रयाग, हरिद्वार आदि तीर्थों में करने का विशेष महत्व है। जिस दिन श्राद्ध है उस दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। श्राद्ध के दिन क्रोध, चिड़चिड़ापन और कलह से दूर रहें।

सच्चे मन, विश्वास, श्रद्धा के साथ किए गए संकल्प की पूर्ति होने पर पितरों को आत्मिक शांति मिलती है। तभी वे हम पर आशीर्वाद रूपी अमृत की वर्षा करते हैं।

पितृ दोष वाले व्यक्तियों को श्राद्ध पक्ष में क्या-क्या करना चाहिए :
पित्र दोष होने पर पितृपक्ष मे अपने पितरों की याद मे पीपल या बरगद का वृक्ष लगाकर, उसकी पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने से भी पितृदोष समाप्त हो जाते है। श्राद्ध में पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक शाम को एक तेल का दीपक दक्षिण मुखी लौ करके जलाये।

पितरों के निमित्त तर्पण करे :
पितृ पक्ष में प्रतिदिन पितृ सूक्त के पाठ करें। प्रतिदिन स्नान कर तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें सफेद आंकड़े के फूल डालें और उदय होते सूर्य को अघ्र्य दें। अघ्र्य देते समय नीचे लिखे मंत्र का 21 बार जप करें: ऊँ सूर्याय नम:।

पितृ पक्ष में प्रतिदिन गायत्री मंत्र का अधिक से अधिक जाप करे। श्राद्ध वाले दिन यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराये और दक्षिणा आदि प्रदान करे और आशीर्वाद ग्रहण करे। प्रत्येक श्राद्ध वाले दिन गाय को कुत्ते को चीटियों को और काक (कौआ) को भी भोजन प्रदान करना चाहिए। पितृ पक्ष में पितरों की अनुकूलता पाने हेतु श्रीमद्भगवद गीता का पाठ करना चाहिए।

पितृ पक्ष में पितरों की प्रसन्नता के लिए घर के देवालय में दीपक, अगरबत्ती जलाएं। पूजा के समय 21 बार जप करें : ॐ पितराय नम:।
पितृ पक्ष में पितरो की अनुकूलता पाने हेतु गायत्री मंत्र का भी जाप करें
सर्व पितृ आमावस्या को कम से कम 5 या 11 ब्राह्मणों को भोजन अवश्य कराना चाहिए जिससे की पितृ पक्ष में भूलवश कोई श्राद्ध करने से छूट गया हो तो उसकी पूर्ति अमावस्या को हो जाती है। प्रत्येक महीने की अमावस्या को तेल का दीपक भी दक्षिण मुखी शाम को अवश्य लगाये। गरुड़ पुराण के अनुसार गया,हरिद्वार, आदि तीर्थ स्थलों पर अपने पित्रों के निमित त्रिपिंडी श्राद्ध अवश्य करावे।

ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848

पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री

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