नई दिल्ली। जीवन अनिश्चित है, इसलिए प्रेम, सम्मान और सेवा को कल पर न छोड़ें। 12 जून 2025 को अहमदाबाद से लंदन जा रहा विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। कुछ ही क्षणों में कई परिवारों की दुनिया बदल गई। जो लोग अपनों से विदा लेकर निकले थे, उन्हें शायद पता भी नहीं था कि वह उनकी अंतिम यात्रा होगी। लेकिन ऐसी घटनाएँ केवल एक दिन या एक स्थान की कहानी नहीं हैं।
दुर्घटनाएँ, प्राकृतिक आपदाएँ और अचानक घटने वाली घटनाएँ हमें बार-बार सचेत करती हैं कि मनुष्य इस संसार में हमेशा के लिए नहीं आया है। प्रकृति भी अपनी भाषा में याद दिलाती रहती है जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए जब तक साँस है, प्रेम, करुणा और सद्भाव के साथ जीना चाहिए।
एक बुज़ुर्ग ने अपने बेटे से कहा था “मेरी मृत्यु के बाद मुझे कंधा देने के लिए बहुत लोग आ जाएंगे, लेकिन मेरी असली जरूरत उस दिन नहीं, आज है। जब मैं ज़िंदा हूँ, तब मेरा हाथ पकड़ना।” यह बात पूरे समाज के लिए एक बड़ा संदेश है।
हम किसी के जाने के बाद श्रद्धांजलि देते हैं, उसके गुणों को याद करते हैं; लेकिन सवाल यह है कि जब वह हमारे बीच था, तब हमने उसे कितना अपनापन, सम्मान और सहारा दिया? मुर्दे को कंधा देने के लिए भीड़ जुट जाती है, लेकिन ज़िंदा इंसान की कठिन घड़ी में उसके साथ खड़े होने वाले कितने लोग होते हैं?
गिरते हुए को धक्का नहीं, सहारा चाहिए। टूटते हुए को उपहास नहीं, संवेदना चाहिए। संघर्षरत व्यक्ति को आलोचना नहीं, हौसला चाहिए। वंचित को दया नहीं, सम्मान, अवसर और न्याय चाहिए।
किसी को पीछे खींचकर कोई बड़ा नहीं बनता; किसी को आगे बढ़ने में मदद करना ही सच्ची महानता है। हमें ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ जाति, वर्ग, धन और पद से ऊपर इंसान की पहचान इंसान के रूप में हो। गरीब बच्चे की पढ़ाई में सहयोग मिले, बुज़ुर्ग को सहारा मिले, असहाय की आवाज सुनी जाए और वंचितों के अधिकारों के लिए समाज आगे आए।
जहाँ अन्याय हो, वहाँ आवाज उठे। जहाँ शोषण हो, वहाँ प्रतिरोध हो। जहाँ भेदभाव हो, वहाँ समता की आवाज बुलंद हो। जहाँ कोई पीछे छूट जाए, वहाँ उसे आगे बढ़ाने वाला हाथ हो। यही सकारात्मक क्रांति है। क्रांति केवल नारे लगाने का नाम नहीं; अपनी सोच और व्यवहार बदलना भी क्रांति है।
दूसरे की सफलता हमारी प्रेरणा बने, उसकी पीड़ा हमारी संवेदना और उसका संघर्ष हमारा सहयोग पाए।हमें ईर्ष्या, छल-कपट और स्वार्थ से ऊपर उठकर प्रेम, करुणा, बंधुत्व, समता और सहयोग को जीवन का संस्कार बनाना होगा।
क्योंकि अंततः पद, पैसा और प्रतिष्ठा सब यहीं रह जाएंगे। हमारे साथ यदि कुछ जाएगा तो हमारे कर्म और इंसानियत की स्मृति। इसलिए प्रेम को कल पर मत छोड़िए। सम्मान को कल पर मत छोड़िए। माफी को कल पर मत छोड़िए।
किसी की मदद के लिए भी कल का इंतजार मत कीजिए। न जाने कब आखिरी मुलाकात हो, न जाने कब आखिरी बातचीत हो। आइए, संकल्प लें किसी को गिराने के बजाय उठाएँगे, किसी की मजबूरी का लाभ नहीं उठाएँगे और अपनी क्षमता के अनुसार निस्वार्थ सहयोग करेंगे।
क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि हमारे जाने के बाद कितने लोग हमें कंधा देने आएँगे; बल्कि यह है कि हमारे रहते हमने कितनों को गिरने से बचाया, कितनों को आगे बढ़ाया और कितनों के जीवन में उम्मीद जगाई।
हमारा धर्म इंसानियत हो, हमारा संस्कार करुणा हो, हमारा व्यवहार समता हो, हमारा संकल्प सेवा हो और हमारी चेतना में राष्ट्र सेवा व मानवता सर्वोपरि जब तक साँस है, किसी के काम आए क्योंकि मुर्दे को कंधा देने वाले तो बहुत मिल जाते हैं, लेकिन ज़िंदा इंसान का हाथ थामकर उसे उठाने वाले ही समाज को सचमुच बदलते हैं।
चिंतक/ मेंटर/ एक्टिविस्ट
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