पलता, बैरकपुर। पलता स्थित पी.एन.दास कॉलेज में खादी और ग्रामोद्योग आयोग (भारत सरकार) के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘हिंदी पखवाड़ा’ बड़े ही उत्साह और गरिमामय माहौल में मनाया गया। इस पूरे आयोजन का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों और आम जनमानस के बीच हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाना और रोजमर्रा के कामकाज व बातचीत में इसके सहज इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कॉलेज की प्राचार्या डॉ. शर्मिला दे ने की, जबकि मंच की पूरी रूपरेखा और संचालन का जिम्मा हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अजय चौधरी ने अपने चिर-परिचित अंदाज में बखूबी संभाला।
समारोह के मुख्य वक्ता, बैरकपुर राष्ट्रगुरु सुरेन्द्रनाथ कॉलेज के सहायक प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. बिक्रम कुमार साव ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने वाली मजबूत कड़ी है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि हिंदी का विकास देश की तमाम क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों को पूरा आदर व सम्मान देकर ही मुमकिन हो सकता है। जब सभी भाषाएँ साथ बढ़ेंगी, तभी हिंदी भी समृद्ध होगी।
हिंदी केवल 140 करोड़ लोगों की भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता का जीवंत प्रतीक है। जब कश्मीर, गुजरात का व्यापारी कन्याकुमारी के ग्राहक से बात करता है, जब बंगाल का छात्र देश के विविध प्रान्तों में पढ़ने जाता है, जब सेना के जवान अलग-अलग राज्यों से आकर एक साथ देश की रक्षा करते हैं, तब उनके बीच संवाद का जो सहज सेतु बनता है, उस भाषा का नाम है – हिंदी और भारत जैसे बहुभाषा भाषी राष्ट्र में एक प्रांत से दूसरे प्रांत के बीच संपर्क सूत्र स्थापित करने के लिए ही हिंदी को गढ़ा गया था।
हिंदी सिर्फ हिंदी की बालियां बोलने वालों की भाषा नहीं है बल्कि इसके इतर तमाम भारतीय भाषाओं के बोलने वालों की भी भाषा है। लेकिन इस कड़ी को मजबूत करने के लिए हमें एक बहुत बड़ी भूल से बचना होगा। हमें यह समझना होगा कि हिंदी का विकास देश की तमाम क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों को दबाकर नहीं, बल्कि उन्हें पूरा आदर व सम्मान देकर ही मुमकिन हो सकता है। यह हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ी संभावना भी।
अक्सर यह भ्रम फैलाया जाता है कि हिंदी अन्य भाषाओं की विरोधी है। यह पूरी तरह असत्य है। सच्चाई तो यह है कि बांग्ला, तमिल, तेलुगु, मराठी, मलयालम, असमिया, मैथिली, राजस्थानी जैसी सभी क्षेत्रीय भाषाएँ हमारी भाषाई गंगा की अविरल धाराएँ हैं। यदि इनमें से एक भी धारा सूखती है, तो हिंदी रूपी गंगा भी कमजोर होगी। इसलिए हमारा मंत्र होना चाहिए – प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयात्रा।
जब सभी भाषाएँ साथ बढ़ेंगी, तभी हिंदी भी समृद्ध होगी। हमें हिंदी को किसी पर थोपना नहीं है, बल्कि अपनी सहजता, सरलता और समावेशिता और भाषिक समरसता से सबके हृदय में स्थापित करना है। संपर्क भाषा वही बन सकती है जो सबको साथ लेकर चले और हिंदी में यह क्षमता है।
विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद खादी और ग्रामोद्योग आयोग के अधिकारी प्रभु प्रसाद यादव ने सरकारी और गैर सरकारी दफ़्तरों में हिंदी के प्रयोग पर बात रखी। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक कार्यों में कठिन और दुरूह शब्दों के बजाय आम बोलचाल की सरल हिंदी अपनाई जानी चाहिए, ताकि आम आदमी तक अपनी बात आसानी से पहुँच सके।
इसी क्रम में कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर सुमन रंजन बंद्योपाध्याय ने भाषा और बोलियों के गहरे रिश्ते को रेखांकित करते हुए कहा कि अगर किसी भाषा को लंबे समय तक जिंदा रखना है, तो उसकी स्थानीय बोलियों का संरक्षण सबसे पहले जरूरी है, क्योंकि बोलियाँ ही किसी भी समृद्ध भाषा की जड़ और जीवन-रस होती हैं।
साथ ही अंग्रेजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर काकोली सेन बनर्जी ने कहा कि पश्चिम बंगाल जैसे गैर-हिंदी भाषी क्षेत्र में रहने के बावजूद हम कभी हिंदी से कटे हुए नहीं रहे। हमारे खान-पान, बाज़ार और रोजमर्रा के संपर्कों में हिंदी इतने स्वाभाविक रूप से घुली-मिली है कि हमें इसके इस्तेमाल में कोई बनावटीपन महसूस नहीं होता।
वहीं, गणित विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. बाबलू विश्वास ने मंच पर आकर सभी को सुखद आश्चर्य में डाल दिया। बांग्लाभाषी पृष्ठभूमि से होने के बावजूद उन्होंने अपना पूरा वक्तव्य बड़ी ही सहज और प्रवाहपूर्ण हिंदी में दिया, जिसे सुनकर सभागार तालियों से गूँज उठा। उन्होंने साबित किया कि भाषा दिलों को जोड़ती है, दीवारों को नहीं।
इस कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं की भाषाई समझ और सामान्य ज्ञान को परखने के लिए एक वस्तुनिष्ठ हिंदी प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता कराई गई। विद्यार्थियों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और कड़े मुकाबले के बाद निशा चौधरी ने पहला, लक्खी धारिकर ने दूसरा और बिट्टू साव ने तीसरा स्थान प्राप्त किया।
क्विज के तुरंत बाद काव्य-पाठ का सत्र शुरू हुआ, जिसमें युवा रचनाकारों ने अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया। सुमित लोहार, आकृति गुप्ता और निशा चौधरी ने अपनी लिखी कविताओं का भावपूर्ण पाठ कर माहौल को साहित्यिक रंग में रंग दिया।
इस पूरे आयोजन को जमीनी स्तर पर सफल और व्यवस्थित बनाने में कॉलेज के हिंदी विभाग के छात्र-छात्राओं की सक्रिय भागीदारी रही। कबीर प्रसाद, मुक्ति चौधरी, निधि भगत, साबनाज आफरीन, श्रेया साव, सिमरन वर्मा, रीति सिंह, राकेश कुमार वर्मा, तुलसी चौधरी और खुशबू साहनी ने पूरे समर्पण और उत्साह के साथ मंच व्यवस्था से लेकर हर जिम्मेदारी को संभाला।
कार्यक्रम में प्राचार्या डॉ. शर्मिला दे ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि कॉलेज का निरंतर प्रयास रहता है कि विद्यार्थी किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर ऐसे भाषाई और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए उनकी रचनात्मक सोच और अभिव्यक्ति की क्षमता निखरे। उन्होंने सफल आयोजन के लिए हिंदी विभाग और सभी प्रतिभागियों की सराहना की। अंत में औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
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