वाराणसी। गुप्त नवरात्रि, जिसे ‘शाकंभरी नवरात्रि’ या ‘आषाढ़ गुप्त नवरात्रि’ (आषाढ़ माह में) और ‘माघ गुप्त नवरात्रि’ (माघ माह में) भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखने वाला एक नौ दिवसीय त्यौहार है। यह चैत्र और शारदीय नवरात्रि की तुलना में कम प्रसिद्ध है और मुख्य रूप से साधकों, योगियों और तांत्रिकों द्वारा अत्यंत गोपनीयता के साथ मनाया जाता है।
मुख्य बिंदु – महत्व : यह समय गुप्त सिद्धियां प्राप्त करने, कठिन आध्यात्मिक साधना और तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए सर्वोपरि माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान की गई पूजा का फल अत्यंत शीघ्र और शक्तिशाली होता है, बशर्ते उसे पूर्णतः गुप्त रखा जाए।
गोपनीयता : ‘गुप्त’ शब्द का अर्थ ही ‘छिपा हुआ’ है। इस नवरात्रि का मूल सिद्धांत ही गोपनीयता है। साधक अपनी पूजा, मंत्र, मनोकामना और यहां तक कि साधना के समय को भी किसी के साथ साझा नहीं करते। माना जाता है कि गोपनीयता भंग होने पर साधना का फल नष्ट हो सकता है।
पूजा : जहां सामान्य नवरात्रि में माता दुर्गा के नौ सौम्य रूपों की सार्वजनिक पूजा होती है, वहीं गुप्त नवरात्रि में भगवती के दस उग्र और शक्तिशाली स्वरूपों – ‘दस महाविद्याओं’ – की गुप्त साधना की जाती है।
समय : यह साल में दो बार आती है।
माघ गुप्त नवरात्रि : माघ मास के शुक्ल पक्ष (जनवरी-फरवरी) में।
आषाढ़ गुप्त नवरात्रि : आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष (जून-जुलाई) में।
दस महाविद्याएं : गुप्त नवरात्रि में साधक इन दस महाशक्तियों की साधना करते हैं, जिनमें से प्रत्येक एक विशेष सिद्धि और ज्ञान का प्रतीक है।
1- माता काली : (समय और परिवर्तन की देवी)
2- माता तारा : (सुरक्षा और मार्गदर्शन की देवी)
3- माता त्रिपुर सुंदरी/ षोडशी :(सौंदर्य और पूर्णता की देवी)
4- माता भुवनेश्वरी : (विश्व की माता, अंतरिक्ष की देवी)
5- माता छिन्नमस्ता : (आत्म-बलिदान और निर्भीकता की देवी)
6- माता भैरवी : (भय और विनाश की देवी, उग्र रूप)
7- माता धूमावती : (कष्ट, अभाव और विधवा रूप की देवी)
8- माता बगलामुखी : (शत्रु नाशिनी, वाक्-शक्ति की देवी)
9- माता मातंगी : (कला, ज्ञान और संगीत की देवी)
10- माता कमला : (धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी)
नियम और विधि : गुप्त नवरात्रि की पूजा विधि अत्यंत कठिन और नियमबद्ध होती है।
गुप्त स्थान : पूजा पूरी तरह से एकांत और गुप्त स्थान पर की जाती है, जैसे कोई गुफा, निर्जन मंदिर या घर का कोई ऐसा कोना जहां कोई न आता हो।
निशीथ काल : इस नवरात्रि में मध्यरात्रि (रात 11 बजे से 1 बजे के बीच) की पूजा का विशेष महत्व है, जिसे ‘निशीथ काल’ कहते हैं।
सात्विकता : साधक को पूर्ण ब्रह्मचर्य, मानसिक और शारीरिक शुद्धता, और सात्विक भोजन का पालन करना होता है।
मानसिक जप : मंत्रों का जप अक्सर मानसिक रूप से किया जाता है, ताकि उसकी ध्वनि भी किसी अन्य को सुनाई न दे।
विशेष अनुष्ठान : साधक अपनी मनोकामना के अनुसार विशेष स्तोत्रों (जैसे सिद्ध कुंजिका स्तोत्र, दुर्गा सप्तशती) का पाठ और तांत्रिक मंत्रों का जप करते हैं।
महत्व : साधारण भक्तों के लिए गुप्त नवरात्रि आत्म-संयम, मानसिक शांति और आंतरिक शक्ति को जागृत करने का समय है। यह याद दिलाता है कि आध्यात्मिक उन्नति केवल बाहरी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि शांत चित्त और गुप्त साधना से भी प्राप्त की जा सकती है।
ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848
ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च कर, फॉलो करें।


