अशोक वर्मा ‘हमदर्द’, कोलकाता। भारत का लोकतंत्र तीन स्वतंत्र एवं परस्पर पूरक स्तंभों – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका – पर आधारित है। संविधान निर्माताओं ने इन तीनों के बीच संतुलन की परिकल्पना की थी ताकि कोई भी संस्था निरंकुश न हो पाए और देश में न्याय, स्वतंत्रता और समानता की भावना बनी रहे। परंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में न्यायपालिका की कुछ प्रवृत्तियाँ लोकतांत्रिक संतुलन के लिए चिंता का कारण बनती जा रही है।
उपराष्ट्रपति का वक्तव्य और न्यायिक शक्ति का केंद्रीकरण आत्म चिंतन करने लायक है।
हाल ही में भारत के उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और साहसिक वक्तव्य दिया – “अगर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को सारी शक्ति दे देंगे तो यह खतरनाक साबित हो सकता है।” यह वक्तव्य मात्र एक संवैधानिक पदाधिकारी का निजी विचार नहीं, बल्कि उस गहरे असंतुलन की ओर संकेत है, जो भारतीय लोकतंत्र की संरचना में धीरे-धीरे पनप रहा है।
वर्तमान व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास न्यायिक नियुक्तियों से लेकर संवैधानिक पीठों के गठन तक की पूर्ण सत्ता है। Collegium System, जो स्वयं न्यायपालिका द्वारा विकसित एक आंतरिक प्रक्रिया है, उसने कार्यपालिका और विधायिका को न्यायिक नियुक्तियों से लगभग बाहर कर दिया है। यह प्रक्रिया पारदर्शिता और जवाबदेही से कोसों दूर है। न्यायपालिका स्वयं को “मूलभूत ढांचे” का संरक्षक मानते हुए संसद द्वारा पारित कानूनों तक को रोक देती है, जिससे विधायिका की गरिमा को आघात पहुँचता है।
कोर्ट के आदेश और संसद की मर्यादा का होना भी जरूरी है। यह देखना अत्यंत विडंबनात्मक है कि देश की संसद, जहाँ जनता के प्रतिनिधि बैठते हैं, वहां से पारित एक कानून को भी कोई एक जज एक अंतरिम याचिका पर रोक सकता है। यह प्रवृत्ति केवल विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संप्रभुता पर आघात है। न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) तब तक स्वागत योग्य है जब तक वह न्याय के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हो, परंतु जब वह नीति-निर्धारण की सीमा लांघने लगे, तब यह “न्यायिक अतिक्रमण” (Judicial Overreach) बन जाता है और इसी बिंदु पर प्रश्न उठता है – क्या न्यायपालिका उत्तरदायी है? और यदि नहीं, तो उसे उत्तरदायी कैसे बनाया जाए?
भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी के कारण भी विधि व्यवस्था बिगड़ती है।सबसे दुखद स्थिति तब उत्पन्न होती है जब न्यायपालिका की छवि स्वयं कलंकित होती है। हाल ही में एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के घर से करोड़ों की नकदी बरामद होने की खबर सामने आई। यह न केवल उस न्यायिक अधिकारी की व्यक्तिगत गिरावट को दर्शाता है, बल्कि उस पूरी प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगाता है, जो ऐसे भ्रष्टाचार पर मौन साधे बैठी है।
जब न्याय करने वाला स्वयं संदेह के घेरे में हो, तब आम नागरिक के मन में न्यायपालिका के प्रति विश्वास डगमगाने लगता है और जब इस व्यवस्था पर कोई नियंत्रण नहीं हो, न कोई जांच एजेंसी, न ही कोई निगरानी तंत्र – तब यह ‘निरंकुश न्यायपालिका’ की अवधारणा को जन्म देता है, जो लोकतंत्र की आत्मा के सर्वथा विपरीत है।
CJI को वीटो पावर – एक लोकतांत्रिक खतरा को जन्म देता है।
यदि देश में CJI को किसी भी न्यायिक निर्णय, नियुक्ति, या व्यवस्था पर अंतिम और अस्वीकार्य (non-reviewable) अधिकार मिल जाता है, तो यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए घातक होगी। न्यायपालिका को स्वतंत्र अवश्य होना चाहिए, परंतु ऐसी स्वतंत्रता जिसमें जवाबदेही का अभाव हो, अंततः तानाशाही में बदल सकती है।
भारतीय संविधान का आधार ही यह है कि सभी संस्थाएँ परस्पर संतुलन और संयम के साथ काम करें। किसी एक संस्था को ‘वीटो शक्ति’ देकर बाकी दो संस्थाओं को पंगु बना देना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आत्मघाती हो सकता है।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या समाधान है? न्यायपालिका को पूर्ण स्वतंत्रता देना आवश्यक है, परंतु उसके कार्यों को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाना उससे भी अधिक आवश्यक है। इस दिशा में निम्नलिखित सुझाव उपयोगी हो सकते हैं :
1) न्यायिक जवाबदेही विधेयक (Judicial Accountability Bill) : एक प्रभावी कानून की आवश्यकता है जो न्यायाधीशों की जवाबदेही सुनिश्चित करे। इसमें न्यायिक भ्रष्टाचार, निर्णयों में पक्षपात, अनुचित विलंब आदि की जांच हेतु स्वतंत्र निकाय का गठन हो।
2) राष्ट्रीय न्यायिक सेवा आयोग (NJSC) : कोलेजियम प्रणाली के स्थान पर एक ऐसी समिति बनाई जाए जिसमें न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को सम्मिलित किया जाए। इससे न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता आएगी।
3) निर्णयों की समीक्षा प्रणाली : एकल पीठ के आदेशों से संसद के कानूनों पर रोक लगाने की प्रक्रिया पर पुनर्विचार किया जाए। केवल संविधान पीठ ही ऐसे मामलों में सुनवाई करे और वह भी समयबद्ध हो।
4) सुप्रीम कोर्ट में लोकपाल जैसी निगरानी इकाई : कार्यपालिका की तरह न्यायपालिका में भी एक आंतरिक निगरानी संस्था होनी चाहिए जो न्यायाधीशों के आचरण की गोपनीय और निष्पक्ष जांच कर सके।
5) संसदीय समिति और न्यायपालिका के बीच संवाद : एक स्थायी संयुक्त समिति बनाई जाए जो न्यायपालिका और विधायिका के बीच समन्वय बनाए, जिससे नीतिगत मतभेद संवाद द्वारा सुलझ सकें।
6) निर्णयों की सार्वजनिक समीक्षा : महत्वपूर्ण संवैधानिक फैसलों के विस्तृत सारांश हिंदी व अन्य भाषाओं में आम जनता के लिए प्रकाशित किए जाएँ, जिससे न्याय व्यवस्था अधिक पारदर्शी बने।
7) न्यायिक प्रक्रिया में तकनीकी सुधार : ई-कोर्ट, डिजिटल फाइलिंग, वीडियो सुनवाई और ऑटोमेशन जैसी प्रक्रियाएँ तेजी से लागू की जाएँ ताकि निर्णयों में अनावश्यक देरी कम हो। लोकतंत्र तभी बचेगा जब न्यायपालिका संतुलन में रहेगी।
संविधान हमें यह अधिकार देता है कि हम अपनी संस्थाओं पर सवाल उठा सकें, उन्हें मजबूत बना सकें, और सुधार की दिशा में कदम बढ़ा सकें। न्यायपालिका को भगवान न समझा जाए, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे का एक उत्तरदायी स्तंभ माना जाए। उसे आलोचना से ऊपर न माना जाए, बल्कि सुधारों के लिए खुला और पारदर्शी बनाया जाए।
आज समय आ गया है कि हम न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा करते हुए उसकी जवाबदेही तय करें। यदि न्यायपालिका निरंकुश हो गई, तो न विधायिका बचेगी, न कार्यपालिका, और न ही जनता की संप्रभुता।
जनता का विश्वास, संसद की संप्रभुता और संविधान की गरिमा – यही भारत के लोकतंत्र की असली पहचान है। इसे बनाए रखने के लिए न्यायिक सुधार अब केवल विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है।

(स्पष्टीकरण : उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। यह जरूरी नहीं है कि कोलकाता हिंदी न्यूज डॉट कॉम इससे सहमत हो। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।)
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