नई दिल्ली | 3 सितंबर 2025 — पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा है कि राज्यपाल को विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों की विधायी क्षमता की जांच करने का अधिकार नहीं है। यह दलील वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने संविधान पीठ के समक्ष पेश की।
राष्ट्रपति को विधेयक भेजे जाने (प्रेसीडेंशियल रेफरेंस) और इस बारे में सुनवाई का सातवां दिन है कि क्या न्यायालय राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपालों और राष्ट्रपति के विचार करने के लिए समय-सीमा निर्धारित कर सकता है।
पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर भी शामिल हैं।
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🏛️ मुख्य बिंदु:
- संविधान पीठ में यह मामला राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर विचार करने की समय-सीमा तय करने से जुड़ा है
- सिब्बल ने कहा कि किसी विधेयक की वैधता का परीक्षण न्यायालयों में होना चाहिए, न कि राज्यपाल द्वारा
- उन्होंने यह भी कहा कि राज्य विधानमंडल की संप्रभुता संसद जितनी ही महत्वपूर्ण है
- राज्यपाल का कार्य केवल विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजना है, न कि उसकी संवैधानिकता पर निर्णय देना
🗣️ कपिल सिब्बल का तर्क:
“यह अत्यंत दुर्लभ मामला है कि राज्यपाल यह कहें कि मैं विधेयक को मंजूरी नहीं दे सकता। विधायी क्षमता का परीक्षण अदालतों में होना चाहिए, न कि राज्यपाल के विवेक पर।”
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📌 सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी:
- न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि राज्यपाल को यह देखने के लिए विवेक का प्रयोग करना पड़ सकता है कि विधेयक केंद्रीय कानून से विरोधाभासी तो नहीं है
- लेकिन उन्होंने यह भी माना कि राज्यपाल सुपर विधायी निकाय नहीं हो सकते
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